लेखक परिचय

अमित शर्मा (CA)

अमित शर्मा (CA)

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी। वर्तमान में एक जर्मन एमएनसी में कार्यरत। व्यंग लिखने का शौक.....

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घर की मुर्गी दाल बराबर मानी जाती है लेकिन ये कहावत घरेलू उपचारो के मामले में उबली हुई दाल के बदले दाल-मखनी ही सिद्ध होती है क्योंकि हम हिंदुस्तानी घरेलू उपचारो के मामले सिद्धहस्त माने जाते है। सर दर्द से लेकर दिल के दर्द तक हमारे पास सब दर्द के घरेलू उपाय मौजूद होते है और ये उपाय वो लोग भी बड़े चाव से काम में लाते है जो कहते नहीं थकते कि मर्द को दर्द नहीं होता है। घरेलू वस्तुओ से काम निकलवाने का हुनर भारत के हर नर-नारी के पास होता है और ये लैंगिक समानता का एक अनूठा उदाहरण है।

गुणी इतिहासकार घरेलू नुस्खो के इज़ाद के बारे में ज़्यादा तो कुछ नहीं बताते लेकिन एक अनुमान के अनुसार घरेलू नुस्खो की खोज , “भारत एक खोज” के साथ ही प्रारम्भ हुई होगी। ज़्यादातर इतिहासकार इस बात पर एकमत प्रतीत होते है की वैदिक काल से ही आयुर्वेदिक काल की शुरुवात हुई होगी जो “इस काल काल में हम-तुम करे धमाल” गुज़रने के बाद भी जारी है। घरेलू नुस्खे दादी माँ की कहानियो की तरह ही अपने परिणामों के बारे में अंत तक सस्पेंस बनाए रखते है।

अगर दैनिक उपयोग में आने वाली चीज़ों पर नज़र और दिमाग के घोड़े दौड़ाए तो पता चलता है कि, हल्दी का प्रयोग सर्दी खांसी ठीक करने से लेकर विवाहयोग बनने तक किया जाता है। नमक का अस्तित्व हमने टूथपेस्ट से लेकर अपने खून तक पहुँचा दिया है ताकि स्वादानुसार नमकहलाली या नमकहरामी की जा सके। देश की मिट्टी से हमारा प्यार भी, मुल्तानी मिट्टी के उपयोग द्वारा हमारे चेहरे का कालापन हटाने के आड़े नहीं आता है। “सब मिले हुए” से प्रेरित हो आलू सब सब्ज़ियों में अच्छे से मिक्स हो जाता और ज़रूरत पड़ने पर आलू का प्रयोग जलने पर भी किया जा सकता है, हालाँकि दिलजले इसका प्रयोग करेंगे तो कोई फायदा होने की संभावना नहीं है। अगर ज़्यादा आँख सेकने की वजह से आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए हो तो वहाँ सर्फ-एक्सेल सी सफेदी लाने के लिए आप आलू के गोल टुकड़ो को काले घेरे के नीचे रखकर काले घेरे से मुक्ति पा सकते है। आलू की जगह खीरा ककड़ी का उपयोग ना करे क्योंकि आपकी आँखे बंद होने से खीरा ककड़ी आपकी आँखों के काले घेरे मिटाने के बजाय आपके संपर्क में आने वाले किसी व्यक्ति की पेट की क्षुधा भी मिटा सकती है। प्याज न केवल नीरस खाने में रस भरता है बल्कि प्याज का रस झड़ते बाल रोकता है और इसका घरेलू उपभोग “लू” से भी बचाता है।

घरेलू वस्तुए इंसान का हर उम्र मे साथ निभाती है, जवानी में जो मेहँदी शादी में हाथो पर रचती है वही मेहँदी उम्र बीत जाने पर बालो की सफेदी मिटाकर इंसान की तबियत रंगीन बनाए रखती है।

हर मर्ज़ का इलाज़ हम अपनी मर्ज़ी से करते है। अगर किसी बीमारी का कोई घरेलू इलाज़ हमारे पास उपलब्ध नहीं है तो मतलब वो बीमारी गैरसंवैधानिक है और वो बीमारी सभ्य समाज के लायक नहीं है। घरेलू उपचार अब घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गए है वो रोज़ वाट्सएप और फेसबुक के ज़रिए लोगो के मोबाइल में अपनी जगह और पैठ बना चुके है। सोशल मीडिया पर ये उपचार “फॉरवर्ड” कर करके हम इतने ज़्यादा “फॉरवर्ड” हो चुके है अब बीमारी का आविष्कार होने से पहले ही उपचार की खोज कर लेते है ताकि बीमारी आने पर तुरंत उपचार को “केश” और “पेश” किया जा सके।

अंग्रेजी और एलोपैथिक इलाज़ के समानांतर घरेलू उपचारो को ज़िंदा और चलन में रखकर हमने न केवल इन उपचारो की जिजीविषा को दुनिया से सामने साबित किया है बल्कि इनकी उपयोगिता को भी बिना किसी “साइड-इफेक्ट्स” के “इफेक्टिव” बनाए रखा है।

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