गजल:दीपक-श्यामल सुमन

जिन्दगी में इश्क का इक सिलसिला चलता रहा

लोग कहते रोग है फिर दिल में क्यों पलता रहा

 

आँधियाँ थीं तेज उस पर तेल भी था कम यहाँ

बन के दीपक इस जहाँ में अनवरत जलता रहा

 

इस तरह पानी हुआ कम दुनियाँ में, इन्सान में

दोपहर के बाद सूरज जिस तरह ढ़लता रहा

 

जिन्दगी घुट घुट के जीना मौत से बेहतर नहीं

जिन्दगी से मौत डरती वक्त यूँ टलता रहा

 

बेवफाई जिसकी फितरत वो वफा सिखलाते हैं

आजतक ऐसे जमाने को वही छलता रहा

 

बन गया लगभग बसूला कहते हैं अपना जिसे

दर्द अपनापन का दिल में अबतलक खलता रहा

 

जिन्दगी तो बस मुहब्बत और मुहब्बत जिन्दगी

तब सुमन दहशत में जीकर हाथ क्यों मलता रहा

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