राहुल गांधी द्वारा अंग्रेजी का महिमा मंडन व महात्मा गांधी के विचारों की हत्या

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समन्वय नंद

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के 125वीं जयंती के अवसर पर कांग्रेस की ओर से आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अंग्रेजी की वकालत करने के साथ साथ इसका महिमा मंडन  किया। उन्होंने कहा कि यदि अंग्रेजी की पढाई जारी न रखा गया होता को विदेशों में जाकर भारतीय काम नहीं कर पाते । राहुल गांधी का यह बयान उनके अपरिपक्वता का दर्शाता है । कुछ लोगों को विदेशों में नौकरी हासिल करने के लिए संपूर्ण भारत वर्ष पर अंग्रेजी की दासता को लाद देने को वह अपरिहार्य बता रहे हैं । इस बयान से उनकी दूरदृष्टि व सोच भी प्रकट होती है ।

अंग्रेजी न केवल एक विदेशी भाषा है बल्कि यह देश के लोगों का शोषण करने का एक औजार भी है । डा राम मनोहर लोहिया अंग्रेजी को जादुगरों की भाषा बताते थे । जादुगर जैसे अपने जादु के माध्यम से लोगों को आतंकित करता है वैसे ही कुछ अंग्रेजी जानने वाले लोग देश के करोडों  आम लोगों को आतंकित करने के लिए अंग्रेजी का इस्तमाल करते हैं ।

राहुल गांधी के इस बयान के पृष्ठभूमि को समझना पडेगा । पंडित नेहरु भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, यह तो सच है लेकिन वह भारतीयता, भारतीय संस्कृति व भारतीय भाषाओं के समर्थक नहीं थे । पाश्चात्य विचारों से काफी मात्रा में प्रभावित पंडित नेहरु अपने आप को अंग्रेजों के नजदीक पाते थे न कि भारतीयों के । भारतीयता व भारतीय भाषाओं के संरक्षण व संवर्धन के बजाए उनको अंग्रेजी संस्कृति व भाषा की ज्यादा फिक्र था । वर्तमान कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी उसी परंपरा को आगे बढा रहे हैं । वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी इस मिट्टी से जुड़े हुए नेता थे । वह कहते थे अंग्रेज भले ही भारत में रह जाएं लेकिन अंग्रेजीयत को भारत से भगाना पडेगा ।

जिस महात्मा गांधी के नाम को लेकर राहुल गांधी अपनी राजनीति चमका रहे हैं उस महात्मा गांधी की अंग्रेजी के प्रति क्या विचार था और राहुल गांधी का विचार उनसे कितना मेल खाता है उसका विश्लेषण करने का वक्त आ गया है ।

महात्मा गांधी कहते थे “  मेरा सुविचारित मत है कि अंग्रेजी की शिक्षा  जिस रुप से हमारे यहां दी गई है, उसने अंग्रेजी पढे लिखे भारतीयों को दुर्वलीकरण किया है, भारतीय विद्यार्थियों की स्नायविक ऊर्जा पर जबरदस्त दबाव डाला है , और हमें नकलची बना दिया है ….. अनुवादकों की जमात पैदा कर कोई देश राष्ट्र नहीं बन सकता । ”  (यंग इंडिया 27.04.2014)

 

गांधी जी ने कहा कि “  आज अंग्रेजी निर्विवादित रुप से विश्व भाषा है । इसलिए मैं इसे विद्यालय के स्तर पर तो नहीं विश्वविद्यालय पाठ्य़क्रम में वैकल्पिक भाषा के रुप में द्वितीय स्थान पर रखुंगा । वह कुछ चुने हुए लोगों के लिए तो हो सकती है , लाखों के लिए नहीं ….. यह हमारी मानसिक दासता है जो हम समझते हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा काम नहीं चल सकता । मैं इस पराजयवाद का समर्थन कभी नहीं कर सकता । ”  ( हरिजन 25.08.1946)

वर्तमान में अंग्रेजी के समर्थन में राहुल गांधी जो तर्क दे रहे हैं उस समय भी पंडित नेहेरु जैसे अंग्रेजी के समर्थक उस प्रकार का तर्क देकर अंग्रेजी की वकालत करते थे ।

महात्मा गांधी ने कहा कि  “ हम यह समझने लगे हैं कि अंग्रेजी जाने बगैर कोई ‘बोस ’ नहीं बन सकता । इससे बडे अंधविश्वास की बात और क्या हो सकती है । जैसी लाचारगी का शीकार हम  हो गये लगते हैं वैसी किसी जपानी को तो महसूस नहीं होती ।”  (हरिजन 9.7.1938)

गांधी जी ने कहा “  शिक्षा के माध्य़म को  तत्काल बदल देना चाहिए और प्रांतीय भाषाओं को हर कीमत पर उनका उचित स्थान दिया जाना चाहिए । हो सकता है इससे उच्चतर शिक्षा में कुछ समय के लिए अव्यवस्था आ जाए, पर आज जो भयंकर बर्बादी हो रही है उसकी अपेक्षा वह अव्यवस्था कम हानिकर होगी । ”

महात्मा गांधी के विचारों को उद्धृत करने के बाद इसकी बहुत अधिक विश्लेषण की  आवश्यकता नहीं रह जाती । गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि देश के बच्चों पर अंग्रेजी लादने से  उनका मानसिक विकास ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है । उनकी पढाई मातृभाषा में यानी भारतीय भाषाओं में होनी चाहिए ।  अंग्रेजी विद्यार्थियों पर लाद देना मानसिक दासता है और भारतीयों को इससे ऊबरना चाहिए ।

जपान व चीन जैसे देश अंग्रेजी को न अपना कर विज्ञान व प्रगति के शीर्ष पर पहुंचे हैं । महात्मा गांधी भाषा को लेकर अंग्रेजी के विरोधी नहीं थे वह इसके भारतीयों पर लादे जाने के विरोधी थे ।

इससे स्पष्ट है कि पंडित नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने महात्मा गांधी के विचारों की जलांजलि दे दिया था । महात्मा गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं है वह एक विचार हैं । व्यक्ति की तो मौत हो सकती है लेकिन विचारों की नहीं । नाथुराम गोडसे ने भले ही महात्मा गांधी की शारीरिक रुप से हत्या की है लेकिन उनकी विचारों की हत्या पंडित जवाहर लाल नेहरु ने की ।  अब उनके बंशज इसी परंपरा को आगे बढा रहे हैं । यह प्रक्रिया निरंतर जारी है ।

2 COMMENTS

  1. आभार सर । आपका मार्गदर्शन मेरा उत्साह बढायेगा ।

  2. अनपढ राहुल और क्या कहेगा?

    (१)
    भारत क्या परदेशों को समृद्ध करने के लिए भारतीयों को अंग्रेज़ी शिक्षा दे
    रहा है?
    (२)
    पढे हुए, विशेषज्ञों को वापस नौकरी भी भारत में, (अधिकारी ) स्पर्धा के डर (?)से, शायद, नहीं देता था। साक्षात्कार के समय भारत न आने का अप्रत्यक्ष परामर्श स्वयं देता था। विज्ञापन भी अपर्याप्त समय देते थे।
    अपने देश की बौद्धिक सम्पत्ति को परदेशों को लुटाने के लिए मूरख राहुल को क्या धन्यवाद दें?
    (३)
    राहुल “इन्दिरा गांधी” के बदले मो. क. गांधी का “हिन्द स्वराज” पढे, तो सही समझ पाएगा।
    (४)
    गांधी जी कहते हैं, अंग्रेज़ी इसी दृष्टि से पढो, कि, पढकर भारत की कुछ सेवा कर पाओ। क्या पढते हो, से अधिक, किस उद्देश्य से पढते हो, इसका मह्त्त्व है। चीनी पढो, हिब्रु पढो, फ्रान्सिसी पढो, रूसी पढो, इत्यादि पढो ….. पर भारत की भलाई के उद्देश्य से पढो।
    गांधी ने, गोलवलकर ने, हेडगेवार ने, तिलक ने, सावरकर ने, सुभाष ने…..कई नेताओने भी अंग्रेज़ी पढी थी, पर वे भारत के हितमें उसका उपयोग करते थे।
    समन्वय नंद जी को धन्यवाद।

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