सरकारी दमन: हिरासती मौतें और फर्जी मुठभेड़

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पूजा शुक्ल

कश्मीर हो या उ० प्र० हिरासती मौतों व् फर्जी मुठभेड़ो का सिलसिला रुक नहीं रहा है , सरकारें चिंतित है पर है पर पुलिसिया दमन बदस्तूर जारी हैपिचले कुछ वर्षो से ऐसी घटनाएं अपवाद से आम हो गयी है, ऐसा नहीं है इन बढ़ रही घटनाओ से संसद चिंतित नहीं है , वहां भी ऐसे मुद्दे कई बार उठे है पर फिर भी इस बाबत हम कोई ठोस और व्यपक फैसला नहीं कर पाएं है . सन २००८ से अंतर्राष्ट्रीय संधि की परिधि में आने हेतु संसद में प्रताड़ना निरोधक कानून नामक बिल सरकार के द्वारा लाने के प्रयास हो रहे है.इन सब चिन्ताओ विमर्श के के बावजूद भी सितम्बर २०१० से ये बिल सांसद अश्विनी कुमार की अध्यक्षता वाली पुनर्विचार कमेटी के पास पड़ा सड़ रहा है.

 

हिरासत में मौत पर जब भी इस देश में बहस छिड़ती है तो वो बहस सार्थक नहीं हो पाती, इन बहसों – गोष्टियो के बहने लोग राजनैतिक मंच तैयार करते है जिससे समस्या सुलझने की जगह और उलझ जाती है. मसलन जुलाई २०११ में मुंबई बम धमाको के लिए एक संदिग्ध फैज उस्मानी को पूछताछ के लिए मुंबई पुलिस द्वारा उठाया गया था. महज़ आधे घंटे की पूछताछ में संदिग्ध की पुलिस हिरासत में उच्च रक्तचाप और मस्तिष्क रक्तस्त्राव के कारण मृत्यु हो जाती है , पुलिसिया कहर उनके दिलो दीमाग पर इस कदर हावी हुआ की वो उनकी जान ले लेता है. इस मौत के परिणामस्वरूप, पुलिस अत्याचार की सर्वत्र निंदा शुरू हो गयी साथ ही विमर्शो में मुंबई पुलिस के कामकाज के तरीको पर सवाल उठाये गए. राज्य सरकार पर बम्ब विस्फोट से ज्यादा दबाव अल्पसंख्यक की प्रताड़ना मृत्यु का पड़ने लगा तब भला ऐसे में अल्पसंख्यक मतों की राजनीति करने वाले क्यों चुप रहते सो इस पूरी समस्या का राजनीतिकरण कर दिया गया .अबू असिम आज़मी जैसे नेताओ ने समस्या को जातीय- मज़हबी रंग देना शुरू कर दिया तो इसके जवाब में शिवसेना जैसी तथाकथित बहुसंख्यक हित रक्षा करने वाली पार्टिया पुलिस की तरफ से लामबंद हो गयी. हिरासती मौतों व् फर्जी मुठभेड़ो पर होने वाली बहस जहाँ एक तरफ सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग है जो पुलिस एनकाउन्टर व् सख्त पुलिसिया कार्यवाही से अतिवाद को कण्ट्रोल करना चाहते है तो वही दुसरी ओर पूर्व पुलिस कमिश्नर जूलियो रिबेरो जैसे पुलिसिया प्रशासक है जो की बम विस्फोट के जैसी घटनाओं से आक्रोशित हो जनता द्वारा अनजाने में समर्थित “क्रूर पुलिसिया तरीको” के अनुमोदन के सख्त खिलाफ है.

माना देश में वाम चरमपंथियों की समस्या किसी भी तरह कट्टरपंथ तथा साम्प्रदायिकता से कम नहीं है पर फिर भी किसी प्रकार के संघर्ष जिनमे माओवादियों के संघर्ष, उत्तरपूर्व के संघर्ष और कश्मीर के संघर्षप्रमुख है उसमे राज्य को कोई शोर्टकट नहीं लेना चाहिए. वैसे साउथ एशिया के अलावा इस तरह से अपराध को सुलझाने के लिए ऐसे शॉर्टकट किसी और लोकतान्त्रिक जगह नहीं है. अभी हाल ही में संविधानिक स्वरुप को चुनौती देने वाले ‘सलवा जुडूम’ कार्यक्रम को सर्वोच्च न्यायालय ने रोकने का फैसला दिया था, उसके पीछे भी राज्य व् जनता को रक्तरंजित होने से बचाने की भावना मुख्य थी, पर बावजूद इसके झारखण्ड व् छत्तीसगढ़ की सरकारों ने पूर्व में न केवल शॉर्टकट अपनाएं बल्कि पोटा सरीखें कानून को भी तोड़ा मरोड़ा है . राजनैतिक द्वेष या चुनावी राजनिति के मद्देनजर हिरासत में हुई हिंसाओ को राज्य के द्वारा प्रायोजित कराएं जाना या फिर इस प्रकार की हिंसाओं को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल होना वाकई चिंता का विषय है. सरकारें पूंजीवादी फायदावादी व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिए किसी हद पर भी जा रही है मसलन पुणे में जिस तरह बिल्डरों के हितो को साधने के लए पुलिस ने गोलिया चलाई वो राजनैतिक भ्रस्टाचार के साथ साथ पाशविक वृत्ति के सत्ता व्यवस्था में अंगीकार होने का द्द्योतक है. सरकारें जन मांगो के समर्थन में उठने वाले किसी भी आवाज़ को कुचलने में लगी है फिर चाहें वे हाई प्रोफाइल बाबा हो या बस्तर में बैठा कोई फत्तुराम गावड़े एवं उनकी पुत्री सगुन बाई जैसे आदिवासी हो या फिर इन दोनों की ही जंग कलम से लड़ने वाला पत्रकार हो. इस लोकतान्त्रिक समाज में देश की विभिन्न अदालतों में पत्रकारों के खिलाफ लगभग दो हजार से ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं जिनमें से ज्यादातर फर्जी हैं व् राजनैतिक रिपोर्टिंग से उत्पन्न हुई कुंठा के परिणाम स्वरुप है.

कुछ समय पूर्व ही नक्सली प्रवक्ता आजाद और स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद पांडेय के मुठभेड़ कांड की बुद्धिजीवी समाज ने निंदा की व् माना की हेमचन्द्र को महज़ इस लिए मारा गया क्योंकि वो आज़ाद के पकड़े जाने और उनकी हत्या के गवाह थे, ऐसा ही कुछ कुछ ही सोहराबुद्दीन मामले में उनकी पत्नी व् तुलसी प्रजापति के साथ गुजरात की पुलिस ने किया था . सामाजिक सरोकारों से जुडे स्वामी अग्निवेश और हेमचन्द्र की पत्नी विनीता पांडेय ने इसकी जांच के लिए एक स्वतंत्र मोनिटरिंग संस्था नियुक्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायलय में याचिका भी डाली जिसे अदालत ने स्वीकारते हुए सीबीआई को आदेश दिया कि वह इस मामले की जांच कर छह सप्ताह के अंदर अंतरिम रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करे. ऐसे आदेश, ऐसी अधिकारों की लड़ाइया भारत में कम ही सुनायी पड़ती है अधिकतर मामलो में पुलिस प्रशासन की बात ही सुनी जाती है.

वैसे अदालतों में हो रही अनावश्यक देरी भी इस प्रकार की हिंसा को अपरोक्ष रूप से बढ़ावा देती है दो वर्ष पूर्व एक विडियो मणिपुर के, चुन्ग्क्हम संजीत सिंह को मणिपुरी अर्धसैनिक बल द्वारा आराम से हिरासत में लेने के बाद एक मणिपुरी राजधानी इम्फाल के व्यस्त जगह के एक दवाई की दूकान में ले जाकर गोली मार दी थी और उसे एन्कोउन्टर करार दिया था उस समय तेहलका के पत्रकार को स्थानीय निवासी द्वारा दिए एक विडियो ने संजीत को सुरक्षा बलो के साथ आराम से जाते हुए फिर उन्ही सुरक्षा कर्मियों के द्वारा घसीट कर संजीत की लाश को बाहर निकलते हुए दिखाया गया था , पिछलें वर्ष लगभग ऐसी ही घटना कराची में पाकिस्तानी इंडस रेंजरो ने द्वारा अंजाम दी गयी जहा एक लड़के को खुले आम कराची के मशहूर क्लिफ्टन एरिया में गोली मार दी गयी थी. उस घटना में संजीत की ही तरह विडियो उपलब्ध था, अलोकतांत्रिक समझे जाने वाले पाकिस्तानी ईस्टाबलिश्मेंट ने तो उन सब हत्यारों को मौत की सजा सुना दी है वही लोकतान्त्रिक भारत में उन ९ पुलिस अधिकारियो पर क़ानूनी फैसले का अभी इंतज़ार है हद तो यह है की संजीत की माँ तारोंताम्बी व् अन्य द्वारा संजीत को श्रद्धांजली देने के कार्यक्रम भी उन्ही सुरक्षा बल से आज्ञा लेकर तय होतें है

ताज़ा विवाद नेशनल कांफ्रेंस कार्यकर्ता और उमर अब्दुल्ला परिवार के राजदार सैयद मुहम्मद यूसुफ की श्रीनगर में अपराध शाखा के कार्यालय में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत से उपजा है. विरोध देखतें हुए प्रशासन ने मौत की न्यायिक जांच देकर , मुख्यमंत्री की सुरक्षा में तैनात दो डीएसपी शब्बीर अहमद व नासिर को स्थानांतरित कर दिया. मृतक ने डीएसपी शब्बीर पर गंभीर आरोप गाए थे जिस पर मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली शिकायत के आधार पर ही ये जानलेवा काण्ड हुआ. ये केस इस लिए अहम् हो जाता है क्योंकि यहाँ सरकार के कहने पर हुई इस कार्यवाही पर ये हिरासती मृत्यु हुई है पर शायद भारतीय मीडिया के एंकर प्रेम या फिर कश्मीर में मेदिअकर्मियो की मुफ्त सैर के चलते ही कोई ना कश्मीर सरकार और वहां के राजपरिवार पर कोई बोल रहा है. वैसे इससे पहले सोहराबुद्दीन , इशरत जहा के मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया ने तथा सुप्रीम कोर्ट ने सक्रियता दिखातें हुए गुजरात पुलिस से सम्बद्ध बड़े अधिकारी अन्दर करवा दिए है.

हिरासती मौतों के उपलब्ध राष्ट्रीय क्राईम ब्यूरो के जुर्म के ब्योरें पर नज़र डालें तो पता चलता है की साल दर साल इनमे इजाफा ही हुआ है जहा सन २०००-०१ में ११४० मौतें हिरासत में हुई वही उनकी संख्या बढ़कर सन २००५ -०६ में १५९१ में हो गयी यानी पूरे ४०ऽ तक ये मौतें बढ़ गयी जो की साल २००७-०८ में बढ़ कर १७८९ हो गयी यानी ५४ऽ की बढ़त, कुल मिला कर स्तिथि भयावह होती जा रही है. ठीक इसी तरह कुछ हाल एनकाउण्टर का है सन २००६ में पूरे देश में १२२ एनकाउन्टर हुए, जिसमे अकेले उ०प्र० में ८२ एनकाउन्टर हुए,इसी तरह २००७ में देश में ९५ एन्कोउन्टर हुए जिसमे उ०प्र० में ४८, सन २००८ में देश में १०३ एन्कोउन्टर हुए जिसमे उ०प्र० में ४१, तथा सन २००९ में उ०प्र० ने फिर बाजी मारते हुए ८३ एन्कोउन्टर हुए.

पिछले ५ वर्ष के आँकड़े उठाकर देखे जाएं तो उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र में सबसे अधिक “पुलिस एनकाउण्टर” हुए हैं पर वहाँ कोई इन मौतों के लिए सवाल नहीं उठाता.वही सन २०१० में राष्ट्रीय क्राईम ब्यूरो द्वारा सूचना कार्यकर्ता अफरोज आलम को दिए जवाब से पता चला जहाँ सन १९९३ से २०१० तक हुए २५६० एनकाउन्टर के केसों में राष्ट्रीय मानवअधिकार कमीशन ने १२२४ मुठभेड़ो को फर्जी माना है यानि लगभग आधे एनकाउन्टर फर्जी थे पर पता नहीं कैसे मीडिया इस बात से अनजान रहा है. इससे भी ज्यादा मजे की बात ये है की सन २००८ -०९ के बाद से ब्यूरो ने अपना डाटा सार्वजनिक करना ही छोड़ दिया, सनद रहे ये वो वक़्त था जब गुजरात के पुलिस अफसरों पर मीडिया ट्रायल शुरू हुआ जिसके परिणाम स्वरुप मुसलसल तौर पर डी .बी बंजारा समेत कई गुजरात पुलिस के अधिकारियों पर फर्जी मुठभेड़ के आरोप में गिरफ्तारियां चालू हुई.

वैसे ऐसा नहीं गुजरात में ये पाप ज्यादा होते है या वहा की पुलिस के खिलाफ मामले बहुत ज्यादा है पर गुजरात में मोदी नाम का गर्म- मसाला डलता है तो उससे मीडिया की स्टोरी में रंग, खुश्बू और स्वाद तीनो आ जातें है. इसी मद्देनज़र आचार्य कृपलानी ने कहा था की हम भारतीय विश्व के हिप्पोक्रेट है तो वो अन्यथा नहीं कहा था,अगर ऐसा ना होता तो एनकाउन्टर व् हिरासती मौतों में राष्ट्रीय औसत से काफी कम गुजरात राज्य ही को ही मात्र घेरा जाता, कार्रण नितांत राजनैतिक है समस्या मानवीय है. वैसे देखा जाये तो सन २००८ में तो मध्य प्रदेश पुलिस कर्मियों के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायते मिली, जहा देश भर में उस साल पुलिस कर्मियों के खिलाफ मानव अधिकार उलंघन की कुल जमा ४८,९३९ केसों में से ८,३१५(३७.४ऽ) शिकायतें प्राप्त हुई, दिल्ली व् उत्तर प्रदेश इसके बाद दुसरे स्थान पर है वहां करीब ६००० केसों में, महराष्ट्र ३९२८ केसों के साथ चौथे स्थान पर रहा फिर बाकि के सतह पंजाब केरल के है गुजरात का स्थान कही भी नहीं है पर फिर भी मीडिया में खबर सिर्फ वंजारा व् संजीव भट्ट की ही आती है. इसी मीडिया के ध्यान आकर्षण के चक्कर में हमारी संस्थाओ का ह्वास हो रहा है कश्मीर विधानसभा में हुई मारपीट उसी का एक नमूना है. इन हत्याओं से सबक लेने की जगह हमारें कानून सृजनकर्ता उस पर राजनीति से ही बाज नहीं आ रहे. राज्य द्वारा इस जुल्म की सुनवाई नेताओ द्वारा शासित राज नहीं करेगा तब कौन करेगा क्यूंकि सिविल सोसाइटी के आन्दोलन की क्या परिणिति हो है वो कविता श्रीवास्तव के ऊपर पुलसिया दमन व् अन्ना हजारे के सफल आन्दोलन के बाद भी मिली सिर्फ प्रतीकात्मक सफलता से पता चलता है

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