गजेंद्र सिंह
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा इमामों और मौलवियों को दिए जाने वाले सरकारी मानदेय को बंद करने के बाद भारत में धर्मनिरपेक्षता, सरकारी संसाधनों और मस्जिद और मदरसा संस्थाओं की भूमिका पर एक पुरानी बहस को फिर से जीवित कर दिया है। यह बहस केवल किसी एक विशेष समुदाय या राज्य तक सीमित नहीं है बल्कि भारतीय संविधान की उस मूल भावना से जुड़ी है जिसमें राज्य को सभी धर्मों और मजहबों के प्रति समान दूरी और समान सम्मान बनाए रखने की अपेक्षा की गई है।
आज भारत के राज्यों में इमामों, मौलवियों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिए जाने वाले मानदेय और उनके स्वरुप को देखते है । उदाहरण के तौर पर दिल्ली में इमामों को लगभग 18,000 और मुअज्जिनों को 14,000 रुपये प्रतिमाह तक भुगतान किया जाता है। हरियाणा में लगभग 800 इमाम 14,000 से 16,000 रुपये तक मानदेय प्राप्त करते हैं। तेलंगाना सरकार लगभग 17,000 इमामों और मुअज्जिनों को 5,000 रुपये मासिक सहायता देती है। कर्नाटक में मुख्य इमामों को 10,000 से 20,000 रुपये तक भुगतान होता है जबकि बिहार में साल 2021 से मस्जिदों के इमाम को 15 हजार और मोअज्जिनों को 10 हजार रुपये मानदेय दे रहा है हालांकि, बिहार स्टेट शिया वक्फ बोर्ड मस्जिदों के इमाम को 4000 और मोअज्जिनों को 3000 रुपये मानदेय दे रहा है। बिहार सरकार सालाना 100 करोड़ रुपये का फंड वक्फ बोर्ड को अनुदान के तौर पर देती है । इसके अतिरिक्त तेलंगाना में जुलाई 2022 से इमामों और मुअज्जिनों को हर महीने 5,000 रुपये मानदेय दिया जा रहा है, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड इमाम को 5000 रुपये महीना और मुअज्जिनों को 4500 रुपये महीना देता है । हरियाणा में वक्फ बोर्ड अपनी मस्जिदों के 423 इमामों को प्रतिमाह 15000 रूपए का वेतन देता है।
वहीं अधिकांश राज्यों में मंदिरों के पुजारियों को नियमित सरकारी वेतन नहीं दिया जाता क्योंकि मंदिरों और आश्रमों के निजी ट्रस्ट संचालन को लेकर स्पष्ट नीति का अभाव है । भारत के कई राज्यों में हिंदू मंदिर सीधे सरकारी नियंत्रण वाले धर्मार्थ या एंडोमेंट विभागों के अधीन नियंत्रित होते हैं। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में लगभग 44,000 से अधिक मंदिरों को राज्य सरकार नियंत्रित करती है जबकि आंध्र प्रदेश , कर्नाटक और केरल में भी हजारों मंदिर सरकारी एंडोमेंट बोर्डों के अधीन हैं और इन मंदिरों की आय का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक और सरकारी उपयोगों में चला जाता है । इसी कारण यह बहस लगातार उठती रही है कि यदि राज्य मंदिरों के प्रशासन और आय पर नियंत्रण रखता है तो पुजारियों के लिए समान सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शी वेतन व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए ।
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिकल्पना करता है। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। वहीं अनुच्छेद 27 स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी नागरिक को ऐसे करों के भुगतान के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिनका उपयोग किसी विशेष धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए किया जाए। एक तरफ जहाँ राज्यों में मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेकर उनकी आय, प्रशासन और संपत्तियों पर राज्य सरकारों का प्रभाव बना रहता है, वहीं दूसरी ओर मस्जिदों और मदरसों से जुड़े इमामों, मौलवियों और मुअज्जिनों को राज्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी सहायता और मानदेय दिया जाता है । आलोचकों का तर्क है कि यह व्यवस्था संवैधानिक समानता और राज्य की धार्मिक तटस्थता पर प्रश्न खड़े करती है, क्योंकि एक ओर हिंदू धार्मिक संस्थानों की आय पर सरकारी नियंत्रण है, जबकि दूसरी ओर अन्य धार्मिक पदाधिकारियों को टैक्सपेयर के पैसे से आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। यही असमानता धार्मिक संस्थाओं के प्रति राज्य की नीति और धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या को लेकर राजनीतिक एवं संवैधानिक बहस को जन्म देती है।
हालांकि इस विषय का दूसरा पक्ष भी प्रस्तुत किया जाता है। सरकारें अक्सर यह तर्क देती हैं कि इमाम, पुजारी, ग्रंथी या अन्य धार्मिक सेवक आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं और समाज में सांस्कृतिक व सामुदायिक भूमिका निभाते हैं, इसलिए उन्हें मानदेय देना सामाजिक सहायता का हिस्सा है। लेकिन व्यवहारिक राजनीति में यह तर्क अक्सर संवैधानिक सिद्धांतों से अधिक वोट बैंक की रणनीति के रूप में दिखाई देता है। यदि वास्तव में उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों की सहायता करना है, तो सहायता धर्म-आधारित न होकर आय, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और आजीविका के आधार पर होनी चाहिए। किसी विशेष धार्मिक पहचान के आधार पर सरकारी वेतन देना राज्य की तटस्थता पर प्रश्न खड़े करता है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में राज्य की भूमिका नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण तक सीमित होनी चाहिए, न कि धार्मिक पदाधिकारियों को प्रत्यक्ष सरकारी आश्रय देने तक।
लेकिन वास्तविक समस्या सहायता देने या न देने से अधिक उसके राजनीतिक उपयोग से जुड़ी है। भारत में धार्मिक मानदेय योजनाएं अक्सर चुनावी राजनीति और वोट बैंक के आरोपों से घिर जाती हैं। यही कारण है कि इन योजनाओं पर संवैधानिक निष्पक्षता और राज्य की तटस्थता को लेकर लगातार प्रश्न उठते हैं। बदलते आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में यह आवश्यक हो गया है कि सरकारें धार्मिक मानदेय से जुड़ी नीतियों पर स्पष्ट और समान मानदंड तय करें। यदि धार्मिक पदाधिकारियों को सहायता दी जानी है, तो उसका आधार केवल धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही होना चाहिए। किसी एक समुदाय के लिए विशेष व्यवस्था और दूसरे के लिए अलग नीति अंततः सामाजिक असंतोष और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकती है।
भारत जैसे बहुधार्मिक लोकतंत्र में राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि यह भी है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग संवैधानिक निष्पक्षता के साथ हो। इसलिए असली बहस “इमाम बनाम पुजारी” की नहीं, बल्कि इस प्रश्न की है कि क्या कल्याणकारी राज्य को धार्मिक पदाधिकारियों के वेतन का प्रत्यक्ष वहन करना चाहिए, या फिर उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और सामाजिक सुरक्षा जैसे सार्वभौमिक क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यह मुद्दा केवल वेतन का नहीं है; यह भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र, राज्य की भूमिका और लोकतांत्रिक राजनीति की दिशा से जुड़ा प्रश्न है।
गजेंद्र सिंह