उत्तर प्रदेश में छिड़ी सत्ता हथियाने की जंग

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निर्मल रानी

देश का सबसे घना राज्य उत्तर प्रदेश संभवत: 2012 में विधानसभा के आम चुनावों का सामना करेगा। ज़ाहिर है इन चुनावों में सत्तारुढ़ बहुजन समाज पार्टी जहां अपने आप को सत्ता में कायम रखने के लिए साम-दाम,दंड-भेद सरीखे सारे उपायों को अपनाना चाहेगी वहीं राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टियां कांग्रेस,समाजवादी पार्टी तथा भारतीय जनता पार्टी भी बहुजन समाज पार्टी को सत्ता से बेदखल किए जाने के अपने प्रयासों में कोई कसर बाकी नहीं रहने देना चाहेंगी। बसपा प्रमुख एवं राज्य की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जन्मदिन के अवसर पर तमाम लोकलुभावनी योजनाएं उद्घोषित कर इस बात की ओर इशारा कर दिया है कि स्वयं को सत्ता में वापस लाने के लिए यदि उन्हें राजकीय कोष खाली भी करना पड़ जाए अथवा प्रदेश को भारी कर्ज़ के बोझ तले दबना भी पड़े तो भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। इससे एक बात और भी ज़ाहिर होती है कि चुनाव की घोषणा होने से पूर्व मायावती अभी ऐसी कई घोषणाएं कर सकती हैं जो राज्य में उनकी व उनकी पार्टी की लोकप्रियता को और परवान चढ़ाएं।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों से पूर्व बहुजन समाज पार्टी ने अपना मीडिया हाऊस भी शुरु कर दिया है। पार्टी अब अपना दैनिक समाचार पत्र भी प्रकाशित करने जा रही है। अब यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि इस मीडिया प्रतिष्ठान को स्थापित करने तथा बाद में इसे संचालित करते रहने के लिए धन तथा नियमित विज्ञापन कहां से उपलब्ध होगा। प्रदेश में कानून व्यवस्था की बदतरी एवं अराजकता के वातावरण के आरोपों के बीच ऐसे भी कई समाचार इस राज्य से प्राप्त हो रहे हैं कि मायावती विपक्षी दलों से संबंधित बाहुबलियों तथा दबंगों को तो दबाने या उन्हें कुचलने का प्रयास कर रही है जबकि साथ ही साथ अपने ही दल के विभिन्न आरोपों से घिरे मंत्रियों व नेताओं को क्षमादान देने का भी काम किया जा रहा है। इसी बीच मायावती ने एक बार फिर अपने ‘विशेष मतदाताओं को अपनी ओर लुभाने के लिए 2007 में छोड़ा गया भावनात्मक तीर फिर से एक बार छोड़ा है। एक बार फिर उन्होंने स्वयं को जि़ंदा देवी की संज्ञा देते हुए अपनी पूजा करने तथा अपने ऊपर ‘चढ़ावा चढ़ाने का आह्वान किया है।

परंतु विपक्ष मायावती के विरुद्ध बनाए जाने वाले माहौल के किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाह रहा है। इसी सिलसिले में गत् दिनों कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सुल्तानपुर,कानपुर तथा बांदा के उन बलात्कार पीडि़तों से जाकर मुलाकात की जिन्हें राजनीतिज्ञों एवं क्षेत्रीय दबंगों द्वारा पिछले दिनों बलात्कार का निशाना बनाया गया था। इन बलात्कार पीडि़तों से मुलाकात करने के बाद राहुल गांधी ने कहा कि प्रदेश में इस प्रकार सरेआम होने वाली बलात्कार की घटनाएं अपने आप में इस बात की प्रमाण हैं कि उत्तर प्रदेश में सुरक्षा व कानून व्यवस्था की भी भारी कमी है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में सुरक्षा, उद्योग, स्वास्थय तथा शिक्षा के अभाव के चलते ही यह राज्य पिछड़ा हुआ है। उधर समाजवादी पार्टी व भारतीय जनता पार्टी के विधायक गण इन दिनों राज्य में चल रहे विधान सभा सत्र को बाधित करने में लगे हुए हैं। विधान सभा सत्र शुरू होने से लेकर अब तक कई बार विपक्षी दल विधान सभा में शोर शराबा व हंगामा बरपा कर सदन को बाधित कर चुके हैं। विपक्ष सदन में यह आवाज़ उठा रहा है कि वर्तमान समय में राज्य में महिला उत्पीडऩ तथा अराजकता में भारी इज़ाफा हुआ है। सपा नेता मुलायम सिंह यादव का तो यह आरोप है कि मुख्यमंत्री मायावती के पास नोट गिनने वाली मशीन है तथा वह टीवी देखने व नोट गिनने के अतिरिक्त और कोई काम ही नहीं करतीं। जहां तक राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार का प्रश्र है तो इसमें किसी विपक्षी दल या नेता के आरोपों का क्या हवाला देना स्वयं एक समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री यह स्वीकार कर चुकी हैं कि राज्य में थाने बिक रहे हैं। ऐसा करने वालों को ब ़शा नहीं जाएगा।

दूसरी ओर चाटुकारिता की सभी हदें पार कर जाने वाले तमाम लोग मायावती के स्वयं को जि़ंदा देवी क हे जाने जैसी बातों से काफी प्रभावित होते प्रतीत हो रहे हैं। अभी देश वह नज़ारा भूल नहीं पाया है जबकि मायावती के एक मंत्रिमंडलीय सहयोगी ने मंत्री पद की शपथ लेने के पश्चात मायावती के चरणों में सिर रखकर साष्टांग दंडवत किया था। इसी प्रकार एक मंत्री मायावती के पैरों को छूने के लिए उनका पांव तलाश कर रहा था तभी मायावती को यह कहते सुना गया था कि “चल बस कर”। मायावती के जन्मदिन पर जब उन्होंने अपना बर्थडे केक काटा उस समय उसी केक की एक सलाईस तत्कालीन डी जी पी विक्रम सिंह अपने हाथों से मुख्यमंत्री को खिलाते देखे गए। और अब इन सभी चाटुकारों से आगे जाते हुए एक वरिष्ठ पुलिस उपाधीक्षक पद्म सिंह जोकि मायावती का विशेष सुरक्षा अधिकारी भी है, ने मायावती की जूती पर पड़ी धूल अपने जेब में रखे रुमाल से साफ कर यह संदेश दे दिया है कि राज्य में मायावती की चाटुकारिता करने वालों में भी भीषण प्रतियोगिता चल रही है। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सिपाही के रूप में भर्ती होकर पुलिस उपाधीक्षक के पद तक पहुंचा पदमसिंह राज्य का राष्ट्रपति पदक प्राप्त कर चुका एक दबंग पुलिस अधिकारी है। गत् कई वर्षों से वह मायावती के एस पी ओ के रूप में तैनात है। बताया जाता है कि पद्म सिंह बसपा के राजनैतिक मामलों में भी गहरी दिलचस्पी व दखल रखता है। यह भी कहा जाता है कि पद्म सिंह की मायावती के प्रति गहन निष्ठा एवं वफादारी के चलते कई मंत्री तथा विधायक पद्म सिंह को सलाम ठोकते हैं। कुछ विश£ेषक एवं राजनैतिक समीक्षक तो यहां तक लिख रहे हैं कि पद्म सिंह के स्तर की चाटुकारिता तथा इसको लेकर मची इस होड़ का कारण दरअसल मायावती सरकार द्वारा घोषित किया गया राज्य का सबसे बड़ा स मान अर्थात् कांशीराम पुरस्कार है।

बहरहाल इसमें कोई दो राय नहीं कि विगत् कुछ महीनों में बहुजन समाज पार्टी को उसके अपने ही कई मंत्रियों व सदस्यों के घृणित कृत्यों के चलते काफी बदनामी का सामना भी उठाना पड़ा है। और इसमें कोई शक नहीं कि विपक्ष ऐसी घटनाओं को अपने लिए एक ‘शुभ अवसर के रूप में स्वीकार कर रहा है। इन्हीं राजनैतिक उठापटक के बीच राज्य में एक नए चुनावी समीकरण के उभरने की भी संभावना व्यक्त की जा रही है। समझा जा रहा है कि बिहार के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह मात खा चुकी कांग्रेस पार्टी अब संभवत: उत्तर प्रदेश में अकेला चलो के अपने संकल्प से पीछे हट सकती है। लोकसभा में केवल उत्तर प्रदेश से 21 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस पार्टी राज्य में अब इस स्थिति में पहुंच चुकी है कि वह समाजवादी पार्टी के साथ एक बड़े जनाधार वाले राजनैतिक दल के रूप में बराबरी से हाथ मिला सके। वैसे भी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राज बब्बर ने मुलायम सिंह यादव की बहु डिंपल यादव को िफरोज़ाबाद लोकसभा सीट से धूल चटाकर कांग्रेस व समाजवादी पार्टी के बीच के अंतर का एहसास बखूबी करा दिया है। पिछले दिनों आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में मुलायम सिंह यादव के प्रति केंद्र सरकार द्वारा अपनाई गई नरमी को भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पूर्व बनने वाले नए संभावित राजनैतिक समीकरण के नज़रिए से देखा जा रहा है। यदि राज्य में कांग्रेस व समाजवादी पार्टी के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन हो जाता है तो मायावती के लिए यह गठबंधन एक बार फिर अच्छी-खासी परेशानी खड़ी कर सकता है। उत्तर प्रदेश के इन ताज़ातरीन राजनैतिक हालात को देखकर यह आसानी से समझा जा सकता है कि प्रदेश में चुनाव घोषणा से पूर्व ही सत्ता हथियाने की जंग छिड़ चुकी है।

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