लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

बलात्कार : भारतीय समाज का कलंक

Posted On & filed under समाज.

निर्मल रानी हम भारतवासी कभी-कभी तो स्वयं को अत्यंत सांस्कृतिकवादी,राष्ट्रवादी,अति स य,सुशील,ज्ञान-वान,कोमल तथा योग्य बताने की हदें पार करने लग जाते हैं और स्वयं को गौरवान्वित होता हुआ भी महसूस करने लगते हैं। परंतु आडंबर और दिखावा तो लगता है हमारी नस-नस में समा चुका है। अन्यथा क्या वजह है कि जिन स्त्रीरूपी देवियों के… Read more »

वायु प्रदूषण : हम ही हैं कातिल, मकतूल व् मुंसिफ़?

Posted On & filed under विविधा.

निर्मल रानी उत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा इन दिनों प्रदूषण युक्त घने कोहरे से ढका हुआ है। इसके परिणामस्वरूप देश के कई क्षेत्रों से भीषण सडक़ दुर्घटनाओं के समाचार मिल रहे हैं। अनेक रेलगाडिय़ों के अनिश्चितकाल देरी से चलने की खबरें हैं। शहरों में ट्रैिफक जाम के समाचार आ रहे हैं तथा पंजाब के… Read more »



महिला विरोधी सामाजिक कुप्रथा का अंत

Posted On & filed under समाज.

निर्मल रानी देश की सर्वाेच्च अदालत ने पिछले दिनों मुस्लिम पंथ से जुड़े एक वर्ग में प्रचलित तिहरे तलाक से पीडि़त एक महिला सायरा बानो द्वारा अपने तलाक के विरुद्ध दायर की गई याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए इस परंपरा को असंवैधानिक करार दे दिया। चूंकि यह विषय धर्म विशेष से जुड़ा हुआ माना… Read more »

रेल यात्रा और रेल यात्रियों की परेशानियाँ

Posted On & filed under विविधा.

निर्मल रानी भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग देश के लोगों को दिन-रात गुमराह करने में लगा रहता है। चाहे वह देश की अर्थव्यवस्था की बात हो, देश की रक्षा तथा उद्योग से जुड़े विषय हों, रोज़गार या मंहगाई संबंधी बातें हों या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय विदेश नीति से जुड़े मामले हों, हमारे देश… Read more »

सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल: सुविधा केंद्र या लूट के अड्डे?

Posted On & filed under समाज.

निर्मल रानी हमारे देश में इन दिनों मध्यम व उच्च श्रेणी के निजी नर्सिंग होम व निजी अस्पतालों से लेकर बहुआयामी विशेषता रखने वाले मल्टी स्पेशिलिटी हॉस्पिटल्स की बाढ़ सी आई हुई है। दिल्ली,पंजाब,हरियाणा,महाराष्ट् र व गुजरात जैसे आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों से लेकर उड़ीसा,बिहार व बंगाल जैसे राज्यों तक में भी ऐसे बहुसुविधा… Read more »

बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेलती भारतीय रेल

Posted On & filed under विविधा.

निर्मल रानी भारतवासियों को सुनहरे सपने दिखाने में पूरी महारत रखने वाली भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार आए दिन कोई न कोई लोकलुभावनी बातें करती दिखाई देती है। सरकार के रेल मंत्रालय की ओर से भी विभिन्न प्रकार की ऐसी घोषणाएं की जाती हैं जो सुनने में देश के लोगों के कानों को तो… Read more »

अन्धविश्वास : जादू-टोना, तंत्र-मंत्र व ज्योतिष विद्या के नाम पर…

Posted On & filed under समाज.

निर्मल रानी प्रसिद्ध चिंतक एवं विचारक ओशो अपने एक प्रसंग में बयान करते हैं कि-‘एक अंग्रेज़ हमारे देश में फुटपाथ पर पैदल चला जा रहा था कि सड़क के किनारे बैठे एक ‘ज्योतिषि’ ने उस अंग्रेज़ को आवाज़ देते हुए कहा -‘आईए मैं आपको केवल दो रूपये में आपका भविष्य बताऊंगा। अंग्रेज़ ने जवाब दिया… Read more »

पुलिस प्रशासन निष्क्रिय-चोर सक्रिय

Posted On & filed under जन-जागरण, विविधा.

निर्मल रानी वैसे तो किसी भी प्रकार की सामाजिक अच्छाई अथवा बुराई के आंकड़ों का सीधा संबंध बढ़ती हुई जनसंख्या की दर से है। जैसे-जैसे जनसंख्या वृद्धि होती जा रही है उसी के अनुसार समाज में जहां अच्छाईयां बढ़ रही हैं वहीं बुराईयां भी उससे अधिक तेज़ अनुपात से बढ़ती जा रही हैं। गरीबी,बेरोज़गारी,मंहगाई,अशिक्षा,अज्ञानता भी… Read more »

सडक़ों पर बिकता ‘ज़हर’:शासन-प्रशासन मौन?

Posted On & filed under खान-पान, विविधा.

खबरों के मुताबिक चीन से ही आयातित कोई विशेष रासायनिक पाऊडर ऐसा है जिसकी एक छोटी सी पुडिय़ा जिसका वज़न मात्र दस ग्राम ही होता है, उसे किसी भी कच्चे फल की टोकरी मेें रखकर टोकरी को ठीक से ढक दिया जाता है। इसके बाद उस रासायनिक पाऊडर की पुडिय़ा से निकलने वाली तेज़ ज़हरीली गैस चार-पांच घंटों में उस टोकरी में रखे फलों के छिलके का रंग पके हुए फलों के छिलके जैसा बना देती है। और यह पका हुआ रंग ग्राहक को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसी प्रकार एक और रसायन द्रव्य के रूप में बाज़ार में उपलब्ध है।

उपेक्षाओं के मध्य ‘दलित उड़ान’

Posted On & filed under समाज.

दलित समाज को जागृत करने के नाम पर मायावती तथा रामविलास पासवान जैसे और भी कई नेताओं को राजनैतिक रूप से काफी अवसर भी मिले। परंतु इन लोगों ने भी सिवाय अपनी कुर्सी व सत्ता सुरक्षित रखने,धन-संपत्ति संग्रह करने, अपने वारिसों को अपना उत्तराधिकारी बनाने के, और कुछ नहीं किया। हां इतना ज़रूर किया कि यह नेता भी महज़ अपनी राजनैतिक रोटी सेेंकने के लिए दलित समाज को उनके उपेक्षित होने का हमेशा एहसास कराते रहे जबकि इनके अपने रहन-सहन शाही अंदाज़ व शान-ो-शौकत से भरपूर हैं।