सुरेश हिंदुस्तानी
विश्व व्यवस्था एक नए मोड़ पर खड़ी है। राजनीति के समीकरण बदल रहे हैं, अर्थव्यवस्था के नए केंद्र उभर रहे हैं, तकनीक मानव जीवन की दिशा निर्धारित कर रही है और सामरिक शक्ति के साथ कूटनीतिक प्रभाव का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत का बढ़ता वैश्विक प्रभाव उसके पुनरुत्थान का संकेत है, जिसकी शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था और सामरिक क्षमता के साथ-साथ उसकी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और जीवन-दृष्टि में भी निहित है।
भारत आज विश्व के सामने एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उपस्थित है, जो अपनी राष्ट्रीय आकांक्षाओं को वैश्विक उत्तरदायित्व के साथ जोड़कर देखता है। उसकी बढ़ती शक्ति का अर्थ यह है कि विश्व के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर भारत की आवाज को गंभीरता से सुना जा रहा है। भारत की कूटनीति ने इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भारत अनेक शक्ति-केंद्रों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखते हुए राष्ट्रीय हितों की स्पष्टता के साथ आगे बढ़ रहा है। बदलती परिस्थितियों में भारत ने संवाद के द्वार खुले रखे हैं और अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को भी बनाए रखा है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारतीय कूटनीति की विशेष पहचान बन रही है।
भारत की विदेश नीति का प्रभाव तब और स्पष्ट दिखाई देता है, जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तनाव और संघर्ष की परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। भारत संवाद और कूटनीति को समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम मानता है। उसका दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि किसी भी संकट का स्थायी समाधान शक्ति-प्रदर्शन से अधिक संवाद, परस्पर सम्मान और सहयोग में निहित है। भारत की इस भूमिका के पीछे उसकी हजारों वर्षों की सभ्यता का अनुभव है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना भारत को विश्व को देखने की एक विशिष्ट दृष्टि प्रदान करती है। भारत के लिए विश्व केवल अलग-अलग देशों का समूह नहीं, बल्कि एक व्यापक मानव परिवार है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन में राष्ट्रहित और विश्वकल्याण एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं। भारत की आर्थिक शक्ति इस वैश्विक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण आधार है। विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन, विनिर्माण की बढ़ती क्षमता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना का विस्तार और नवाचार की नई संस्कृति भारत को विश्व अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान कर रहे हैं। डिजिटल तकनीक से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक भारत ने अपनी क्षमता का विस्तार किया है। यह क्षमता भारत को समाधान देने वाली शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है। जहाँ विश्व के अनेक देश भारत को केवल बाजार के रूप में देखते हैं, वहीं यह देश भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति को देखकर चौंक रहे हैं। यह भारत की कूटनीति को ही दर्शाता है। आज भारत की शक्ति को सभी स्वीकार कर रहे हैं। खास बात यह है कि भारत को इसका अहंकार भी नहीं है और न ही भारत इस शक्ति का उपयोग किसी को दबाने या डराने के लिए ही करता है। जहाँ आवश्यक हुआ, वहां भारत ने भरपूर सहयोग किया। यही भारत की विशेषता है और इसी विशेषता के कारण महाशक्ति मानने वाले देश भी भारत का विरोध करने का सामर्थ्य नहीं जुटा पा रहे।
तकनीक के क्षेत्र में भारत का अनुभव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जिस देश ने कभी विकास की अनेक चुनौतियों के बीच अपनी यात्रा प्रारंभ की थी, वही देश आज डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे और तकनीकी नवाचार के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन को सरल बनाने के प्रयोग कर रहा है। यह परिवर्तन भारत की उस क्षमता को दर्शाता है जिसमें आधुनिक विज्ञान और सामाजिक सरोकार एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। आज का भारत निसंदेह तकनीक के क्षेत्र में आयाम स्थापित कर रहा है। धरती से लेकर आसमान तक भारत की उपलब्धियों के चर्चे हो रहे हैं।
सामरिक क्षेत्र में भी भारत की स्थिति सुदृढ़ हुई है। मजबूत रक्षा क्षमता, स्वदेशी तकनीक, अंतरिक्ष शक्ति और समुद्री सुरक्षा में बढ़ती भूमिका भारत को वैश्विक सुरक्षा विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान देती है। किंतु भारत की विशेषता यह है कि वह शक्ति को केवल प्रभुत्व के साधन के रूप में नहीं देखता। भारतीय परंपरा शक्ति के साथ मर्यादा और उत्तरदायित्व को जोड़ती है। वर्तमान भारत यह जानता है कि विश्व को शान्ति देने का उपाय भारत के पास है। इसी उत्तरदायित्व को भारत निभा रहा है। भारत की बढ़ती हुई शक्ति के बाद भी उसका विनम्र रहना उसकी परंपरा का ही अहम् हिस्सा है।
यही वह बिंदु है जहाँ भारत की बढ़ती शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है, भारत विश्व को शांति का संदेश दे सकता है। आज मानवता के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता ऐसी शक्ति की है, जो सामर्थ्यवान होने के साथ संयमित भी हो, जो अपने हितों की रक्षा करते हुए विश्वहित को भी महत्व दे, जो संघर्ष की स्थिति में संवाद की संभावना तलाशे और विकास को मानव कल्याण से जोड़े।
भारत के पास इस भूमिका के लिए एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। बुद्ध का करुणा संदेश, महावीर की अहिंसा, श्रीकृष्ण का धर्म और कर्तव्य का दर्शन तथा महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा का मार्ग, ये सभी भारतीय चेतना के ऐसे आयाम हैं, जो आज भी विश्व को दिशा दे सकते हैं। आज दुनिया के कई देश शान्ति की तलाश में भारत की ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि युद्ध केवल विनाश का मार्ग तैयार करता है, युद्ध शान्ति नहीं दे सकता। भारत का संदेश यह हो सकता है कि शांति कमजोरी का प्रतीक नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण शक्ति की पहचान है। जो राष्ट्र अपने सामर्थ्य के साथ संयम रखता है, वही दीर्घकालीन विश्वास अर्जित करता है। भारत की बढ़ती शक्ति विश्व को इसी संतुलन की ओर ले जाने का अवसर प्रदान करती है। आज विश्व, भारत की उस दृष्टि को भी समझना चाहती है, जिसमें विकास के साथ प्रकृति, तकनीक के साथ मानवता, शक्ति के साथ मर्यादा और राष्ट्रहित के साथ विश्वकल्याण का भाव जुड़ा हुआ है।
भारत के सामने इसलिए केवल महाशक्ति बनने की आकांक्षा नहीं, बल्कि विश्व के लिए उपयोगी शक्ति बनने का अवसर है। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। महाशक्ति अपनी क्षमता से प्रभाव उत्पन्न करती है, जबकि लोककल्याणकारी शक्ति अपने प्रभाव से विश्वास पैदा करती है।
भारत यदि अपनी आर्थिक ऊर्जा, वैज्ञानिक प्रतिभा, युवा शक्ति, सांस्कृतिक विरासत और दूरदर्शी कूटनीति को एक साथ आगे बढ़ाता है, तो वह आने वाले समय में विश्व व्यवस्था को अधिक संतुलित, सहयोगी और मानवीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
आज विश्व व्यवस्था के बदलते क्षितिज पर भारत का उदय उस भारत के जागरण की कहानी है, जो अपनी जड़ों से शक्ति लेकर आधुनिक विश्व के सामने भविष्य की नई दिशा रखने की क्षमता अर्जित कर रहा है। भारत की बढ़ती शक्ति का अंतिम लक्ष्य यदि विश्वकल्याण से जुड़ता है, तो भारत का उदय केवल भारत की विजय नहीं रहेगा, वह मानवता के लिए आशा का नया अध्याय बन सकता है।