गुरु पूर्णिमा : गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते का पर्व

-प्रदीप कुमार वर्मा

गुरु पूर्णिमा यानि आषाढ़ मास की पूर्णिमा। प्रसिद्ध ब्रज तीर्थ गोवर्धन में मुड़िया पूर्णिमा। श्रीमद्भभागवत और अट्ठारह पुराण आदि साहित्यों के रचियता महर्षि वेदव्यास का जन्म। और देश और दुनिया के लिए गुरु पद पूजन एवं वंदन का पर्व। हिंदू धार्मिक ग्रंथो में आषाढ़ मास की पूर्णिमा यानी गुरु पूर्णिमा का यही महात्म है। गुरु पूर्णिमा पर्व पर प्रसिद्ध गोवर्धन की परिक्रमा में करोड़ों भक्त गोवर्धन महाराज की परिक्रमा करेंगे वही, शिष्य अपने गुरुजनों के चरण वंदना कर अपने जीवन को धन्य करेंगे।  इस दिन भगवान विष्‍णु के साथ मां लक्ष्‍मी की पूजा विशेष रूप से की जाती है। साथ ही इस दिन घरों में सत्‍य नारायण भगवान की कथा करने का खास महत्‍व शास्‍त्रों में बताया गया है। इस दिन पवित्र नदी में स्‍नान करने से हर तरह के पाप से मुक्ति मिलती है और महापुण्‍य की प्राप्ति होती है। यह पर्व गुरु व शिष्य के पवित्र रिश्ते का प्रतीक माना जाता है। आज के दिन शिष्य अपनी समर्थ के अनुसार अपने गुरुजनों को भेंट एवं उपहार प्रदान कर उनका आशीष प्राप्त करेंगे।

      सनातन धर्म में गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है। यहां तक की गुरु की महिमा का बखान करते हुए शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा विष्णु और महेश के समकक्ष माना गया है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा और चरण वंदन करना अत्यंत शुभ माना गया है।  गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्यों द्वारा अपने गुरु के प्रति आस्था को प्रकट किया जाता है। शिष्यों द्वारा आध्यात्मिक गुरुओं और अकादमिक शिक्षकों को नमन और धन्यवाद करने के लिए गुरु पूर्णिमा के पर्व को मनाया जाता है। सभी गुरु अपने शिष्यों की भलाई के लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर कर देते है। हमेशा से आध्यात्मिक गुरु संसार में शिष्य और दुखी लोगों की सहायता करते आये हैं और ऐसे ही कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद है जब गुरुओं ने अपने ज्ञान से अनेक दुखी लोगों की समस्याओं का निवारण किया है।  इसके अलावा इस दिन व्रत करने व पूजा-पाठ करने से अक्षय पु्ण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी के साथ भगवान सत्य नारायण की कथा करने का विशेष महत्व है। 

      हिंदू पंचांग के जानकर पंडित श्यामसुंदर शर्मा के अनुसार पूर्णिमा तिथि 10 जुलाई को सुबह 01 बजकर 36 मिनट पर प्रारंभ होगी और 11 जुलाई को सुबह 02 बजकर 06 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए हिंदू धर्म की मान्यता के मुताबिक उदया तिथि होने के कारण गुरु पूर्णिमा 10 जुलाई 2025 को है। गुरु पूर्णिमा पर मिट्टी का घड़ा, जल, अनाज, मौसमी फल, वस्त्र, अन्न, मिठाई व गुड़ आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। हिंदू, बौद्ध और जैन संस्कृतियों में गुरुओं को एक विशेष स्थान प्राप्त है।  इन धर्मों या संस्कृतियों में अनेक शैक्षणिक और आध्यात्मिक गुरु हुए हैं जिन्हें भगवान के तुल्य माना गया है। स्वामी अभेदानंद, आदिशंकराचार्य एवं चैतन्य महाप्रभु आदि प्रसिद्ध हिन्दू गुरु थे। वैदिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में आषाढ़ पूर्णिमा की तिथि पर ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अट्ठारह पुराण आदि साहित्यों के रचियता महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था।

      धार्मिक ग्रंथों में महर्षि वेदव्यास को तीनों कालों के ज्ञाता माना गया है। महर्षि व्यास ने ही महाभारत की रचना की थी। महर्षि व्यास जी को हमारे आदि-गुरु माना जाता हैं। गुरु पूर्णिमा के प्रसिद्ध त्यौहार को व्यास जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इसलिए इस पर्व को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं और इस दिन हमें अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी ब्रजभूमि में स्थित गोवर्धन पर्वत श्रद्धा और आस्था का बड़ा केंद्र है।  हर साल यहां करोड़ों भक्त परिक्रमा लगाने आते हैं। खासतौर पर मुड़िया पूर्णिमा के दिन यहां सबसे ज्यादा भीड़ जुटती है। गोवर्धन धाम में लगने वाले इस मेले में देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। देसी और विदेशी श्रद्धालु पवित्र गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कर पूर्ण लाभ अर्जित करते हैं। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के गोवर्धन में आयोजित होने वाला मुड़िया मेला देश और दुनिया के लक्खी धार्मिक मेलों में शुमार है।

            ऐसी मान्यता है कि मुड़िया पूर्णिमा मेले की शुरुआत सनातन गोस्वामी की याद में हुई थी। कहा जाता है कि जब उनका परलोक गमन हुआ , तब उनके अनुयायियों ने गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की और सिर मुंडवाकर भजन-कीर्तन करते हुए यात्रा निकाली। तभी से यह परंपरा शुरू हुई, जिसे खासतौर पर बंगाली भक्ति संप्रदाय के लोग पूरी श्रद्धा से निभाते आ रहे हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त मुड़िया पूर्णिमा के दिन 21 किलोमीटर की गोवर्धन परिक्रमा करता है, उसे जीवन मेंसुख-शांति और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। यही नहीं, ऐसी मान्यता भी है कि गोवर्धन की परिक्रमा करने के बाद व्यक्ति की दुख-दरिद्रता भी दूर हो जाती है। इसके साथ ही परिक्रमा करने वाले व्यक्ति को भगवान विष्णु का लोक कहे जाने वाले बैकुंठ की भी प्राप्ति भी होती है। इस मेले की परंपरा करीब पांच सौ साल पुरानी है, लेकिन आज भी इसमें लोगों की आस्था उतनी ही मजबूत दिखती है। गुरु पूर्णिमा हमें यह सिखाती है कि गुरु का स्थान जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। गुरु के बिना ज्ञान और मार्गदर्शन के अभाव में जीवन अधूरा है।

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