संदीप सृजन
सिनेमा को भी समाज का आईना कहा जाता है लेकिन कई बार आईना वही दिखाता है जो उसके सामने रखा जाता है। पिछले कुछ वर्षों में मुख्यधारा के सिनेमा में गाली-गलौज, अश्लीलता, अत्यधिक हिंसा और आक्रामकता को मनोरंजन का पर्याय बनाने की कोशिश दिखाई दी है मानो दर्शक को सिनेमाघर तक खींचने के लिए कहानी से ज्यादा उत्तेजना जरूरी हो। ऐसे समय में ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म का असाधारण प्रदर्शन इस धारणा पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
करीब दो करोड़ रुपये की लागत से बनी इस फिल्म का 122 करोड़ रुपये से अधिक की शुद्ध कमाई तक पहुंचना महज व्यावसायिक सफलता नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार फिल्म का सकल कारोबार करीब 144.40 करोड़ रुपये तक पहुंचा है और 31वें दिन रविवार को भी लगभग 22.75 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया गया। किसी छोटी लागत वाली फिल्म का इतने लंबे समय तक दर्शकों को सिनेमाघर तक खींचते रहना इस बात का संकेत है कि बाजार में केवल बड़े बजट का राज नहीं है।
‘हनुमान अंश’ को शुरुआत में कोई असाधारण मंच नहीं मिला। सीमित प्रदर्शन और करीब 25 शो से शुरू हुई फिल्म धीरे-धीरे दर्शकों की पसंद बनती गई। जिस फिल्म को प्रारंभिक स्तर पर सीमित अवसर मिले, उसके प्रदर्शन बाद में बढ़ाने पड़े। चौथे सप्ताह में प्रमुख सिनेमाघर श्रृंखला पीवीआर आईनॉक्स द्वारा शो बढ़ाया जाना इस बात का प्रमाण है कि अंततः सिनेमाघरों को वही करना पड़ा जिसकी मांग दर्शक कर रहा था।
यह घटना फिल्म उद्योग के लिए सामान्य सूचना नहीं, बल्कि चेतावनी है। किसी फिल्म की सफलता का निर्णय आज भी विज्ञापन एजेंसियां, बड़े निर्माता या सितारों की लोकप्रियता अकेले नहीं करते। अंतिम निर्णय दर्शक करता है। वह टिकट खरीदता है, सिनेमाघर जाता है और यदि फिल्म उसे पसंद आती है तो उसके बारे में दूसरों को बताता है। ‘हनुमान अंश’ के मामले में यही हुआ। फिल्म का प्रचार उसके दर्शकों ने किया और यही प्रचार सबसे प्रभावी साबित हुआ।
सिनेमा का यह नया समीकरण समझना जरूरी है कि दर्शक मनोरंजन से विमुख नहीं हुआ है। वह आज भी भव्य दृश्य देखना चाहता है, अच्छी हास्य फिल्म देखना चाहता है, प्रभावशाली एक्शन देखना चाहता है। लेकिन उसे यह मान लेना कि हर फिल्म में गाली, अश्लीलता और हिंसा की मात्रा बढ़ाकर ही दर्शक जुटाया जा सकता है, दर्शक की समझ को कम आंकना है। दर्शक के पास अब विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं। वह तय करता है कि अपना पैसा और समय किस कहानी पर खर्च करना है। ‘हनुमान अंश’ ने इसी विकल्प की ताकत दिखाई है।
नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक व्यक्तित्व से प्रेरित इस फिल्म का विषय आस्था और आध्यात्मिकता से जुड़ा है। ऐसे विषयों को अक्सर व्यावसायिक दृष्टि से सीमित दर्शक वर्ग वाला मान लिया जाता है लेकिन बॉक्स ऑफिस ने इस अनुमान को भी चुनौती दी है। फिल्म ने यह साबित किया कि भारतीय दर्शक अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ी कहानी को भी बड़े पैमाने पर स्वीकार कर सकता है, यदि उसे ईमानदारी और संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया जाए।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या परिवार के साथ देखे जा सकने वाले सिनेमा की मांग कम हो गई है? ‘हनुमान अंश’ का प्रदर्शन इसका उत्तर ‘नहीं’ में देता है। देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जो बच्चों और बुजुर्गों के साथ बैठकर फिल्म देखना चाहते हैं। वे मनोरंजन के विरोधी नहीं हैं लेकिन ऐसा मनोरंजन नहीं चाहते जिसके कारण परिवार के साथ बैठना असहज हो। निर्माताओं के लिए यह बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है। जरूरत केवल इसे पहचानने की है।
दुर्भाग्य यह है कि व्यावसायिक सिनेमा में कई बार कहानी की कमजोरी को तेज संवादों, अश्लील दृश्यों या हिंसक दृश्यों से ढकने का प्रयास किया जाता है। कुछ फिल्मों में पात्रों की भाषा इतनी आक्रामक हो जाती है कि वह कहानी का हिस्सा कम और आकर्षण का साधन अधिक लगती है। यह मान लेना कि ऐसी सामग्री ही युवा दर्शकों को पसंद आएगी, एक खतरनाक सरलीकरण है। ‘हनुमान अंश’ का उदाहरण बताता है कि युवा और सामान्य दर्शक भी संवेदना, आस्था और प्रेरणा से जुड़ी कहानी स्वीकार कर सकता है।
फिल्म की चर्चा में क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और अभिनेता वरुण धवन जैसी चर्चित हस्तियों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। लेकिन इन प्रतिक्रियाओं से भी बड़ी बात यह है कि फिल्म को दर्शकों ने लगातार समर्थन दिया। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की प्रशंसा किसी फिल्म की चर्चा बढ़ा सकती है, मगर लंबे समय तक टिकट खिड़की पर दर्शकों को बनाए रखना केवल दर्शक की स्वीकृति से संभव है। यही कारण है कि ‘हनुमान अंश’ को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक फिल्म की सफलता मानना भी पर्याप्त नहीं होगा। यह फिल्म उस बड़े प्रश्न की ओर इशारा करती है कि आखिर दर्शक सिनेमा से चाहता क्या है? उत्तर शायद बहुत सरल है—वह ऐसी कहानी चाहता है जो उसे कुछ महसूस कराए। हंसाए तो सचमुच हंसाए, रुलाए तो भीतर तक छुए, प्रेरित करे तो घर लौटने के बाद भी उसका असर बना रहे। मनोरंजन के साथ कोई विचार दे, कोई अनुभव दे या कम से कम ऐसा समय दे जिसे दर्शक व्यर्थ न माने। सिनेमा की मूल शक्ति यही है और तकनीक, बजट तथा प्रचार इसके सहायक भर हैं।
‘हनुमान अंश’ की आर्थिक सफलता इस बात को आंकड़ों में बदल देती है। दो करोड़ रुपये के आसपास की लागत और 122 करोड़ रुपये से अधिक की शुद्ध कमाई के बीच का अंतर केवल व्यापारिक उपलब्धि नहीं है। यह उस धारणा पर भी सवाल है कि सफलता खरीदने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करना जरूरी है। बड़ा बजट फिल्म को बड़ा बना सकता है लेकिन दर्शक के मन में जगह नहीं बना सकता। बड़े सितारे सिनेमाघर का पहला शो भर सकते हैं, लेकिन फिल्म को कई सप्ताह तक नहीं चला सकते। महंगा प्रचार लोगों को टिकट खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है लेकिन दूसरी बार किसी और को टिकट खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। यह काम केवल कहानी करती है। इसलिए ‘हनुमान अंश’ की सफलता को अश्लीलता, गाली और मारधाड़ वाली फिल्मों के लिए ‘तमाचा’ कहना पूरी तरह अनुचित भी नहीं है, यदि इसे किसी व्यक्ति या फिल्म के विरोध के रूप में नहीं बल्कि एक प्रवृत्ति पर टिप्पणी के रूप में समझा जाए। यह तमाचा उस सोच पर है जो दर्शक को केवल उत्तेजना का उपभोक्ता समझती है।
भारतीय सिनेमा का भविष्य किसी एक शैली में नहीं है। एक्शन भी बनेगा, हास्य भी, प्रेमकथा भी और बड़े बजट का मनोरंजन भी। लेकिन इनके साथ ऐसी फिल्मों के लिए भी जगह बनानी होगी जो संस्कृति, आस्था, परिवार और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखती हैं। दर्शक ने बता दिया है कि वह विकल्प चाहता है। और इस विकल्प की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका फैसला किसी बैठक में नहीं होता। न कोई निर्माता इसे आदेश देता है, न कोई प्रचार अभियान इसे तय करता है। फैसला होता है टिकट खिड़की पर।
‘हनुमान अंश’ की यात्रा हमें यही बताती है कि दर्शक को कम मत आंकिए। उसे केवल शोर मत दीजिए। उसे कहानी दीजिए। उसे संवेदना दीजिए। उसे ऐसा सिनेमा दीजिए जिसे वह अपने परिवार के साथ देख सके और देखने के बाद किसी दूसरे से कह सके—“यह फिल्म देखना सार्थक रहा।” शायद भारतीय सिनेमा को आज इसी संदेश की सबसे ज्यादा जरूरत है क्योंकि अंततः करोड़ों रुपये की चमक नहीं, दर्शक का विश्वास ही किसी फिल्म को बड़ी फिल्म बनाता है।
संदीप सृजन