रिकॉर्ड, राजनीति और विरासत :
डॉ० घनश्याम बादल
भारतीय राजनीति में प्रतीकों का महत्व हमेशा से वास्तविकताओं जितना ही रहा है। कभी किसी नेता की टोपी पहचान बन जाती है, कभी किसी का चश्मा और कभी किसी का रिकॉर्ड। 10 जून 2026 को भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के उस पड़ाव का उत्सव मनाया जा रहा है, जब वे स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री पद पर बने रहने वाले नेता के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को पार करने का दावा कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है।
सवाल यह है कि क्या वास्तव में मोदी का कार्यकाल नेहरू से लंबा माना जाना चाहिए? यदि हाँ, तो किस आधार पर? और यदि नहीं, तो क्यों? उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में ऐसी तुलनाएँ उपयोगी हैं या फिर वे इतिहास को राजनीतिक हथियार में बदलने का प्रयास हैं?
सबसे पहले तथ्य। नेहरू 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक लगभग 16 वर्ष 9 माह तक प्रधानमंत्री रहे। मोदी 26 मई 2014 से लगातार प्रधानमंत्री हैं और 10 जून को हुए 12 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर रहे हैं लेकिन जवाहरलाल नेहरू 1947 से 1952 तक अंतरिम प्रधानमंत्री रहे क्योंकि भारत में लोकसभा का पहला चुनाव 1952 में हुआ यदि केवल लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल की गणना की जाए तो मोदी का रिकॉर्ड पंडित नेहरू के कार्यकाल से लंबा हो जाता है लेकिन यदि पद पर रहने की कुल अवधि को नापा जाएगा तो फिर नेहरू से अभी भी मोदी लगभग पौने पांच साल पीछे हैं । भाजपा इसी आधार पर इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है।
लेकिन यहीं से बहस शुरू होती है। नेहरू का कार्यकाल उस दौर का था जब देश विभाजन के घावों से जूझ रहा था, करोड़ों शरणार्थियों का पुनर्वास करना था, रियासतों का एकीकरण पूरा करना था, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना करनी थी और एक नए राष्ट्र-राज्य की बुनियाद रखनी थी। दूसरी ओर मोदी उस भारत के प्रधानमंत्री बने जो पहले से स्थापित लोकतांत्रिक ढाँचे, मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था और अपेक्षाकृत स्थिर अर्थव्यवस्था के साथ आगे बढ़ रहा था। इसलिए केवल दिनों की संख्या के आधार पर दोनों की तुलना करना वैसा ही है जैसे किसी इमारत की छत बनाने वाले की तुलना उसकी नींव डालने वाले से करना।
फिर भी यह भी सच है कि लोकतंत्र में चुनाव जीतना आसान नहीं होता। मोदी ने लगातार तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुँचाया है। यह उपलब्धि छोटी नहीं है। भारतीय राजनीति में लंबे समय तक जनसमर्थन बनाए रखना अपने आप में एक बड़ी राजनीतिक सफलता है। इसलिए यदि भाजपा इसे जनादेश की निरंतरता का उत्सव कहती है तो उसमें कोई अस्वाभाविकता नहीं है।
अब दोनों प्रधानमंत्रियों की उपलब्धियों पर दृष्टि डालें। नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की, पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की, सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योग स्थापित किए, वैज्ञानिक संस्थानों और उच्च शिक्षा केंद्रों की स्थापना की। आज के अनेक प्रतिष्ठित संस्थान, बाँध, इस्पात संयंत्र और अनुसंधान केंद्र उसी दौर की देन हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने भारत को एक स्वतंत्र पहचान दी।
लेकिन नेहरू की असफलताएँ भी कम नहीं थीं। चीन के प्रति उनकी नीति और 1962 का युद्ध आज भी उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी के रूप में याद किया जाता है। कश्मीर प्रश्न का स्थायी समाधान न कर पाना और अत्यधिक समाजवादी आर्थिक मॉडल के कारण निजी उद्यमों पर नियंत्रण भी आलोचना के विषय रहे।
मोदी की उपलब्धियों की सूची भी लंबी है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), डिजिटल भुगतान क्रांति, आधार आधारित सेवा वितरण का विस्तार, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति, कोविड महामारी के दौरान बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान, बुनियादी ढाँचे का तीव्र विस्तार तथा भारत की वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता उनके समर्थकों द्वारा प्रमुख उपलब्धियों के रूप में गिनाई जाती हैं। भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और रणनीतिक प्रभाव भी पिछले दशक में बढ़ा है।
लेकिन मोदी सरकार भी आलोचनाओं से मुक्त नहीं रही। बेरोजगारी, कृषि संकट, बढ़ती आर्थिक असमानता, नोटबंदी के प्रभाव, सामाजिक ध्रुवीकरण के आरोप, संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर उठते प्रश्न और मणिपुर जैसे संकट विपक्ष के प्रमुख आरोपों में शामिल रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि मजबूत नेतृत्व के साथ-साथ सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण भी बढ़ा है।
नेहरू और मोदी की तुलना केवल उपलब्धियों या असफलताओं की सूची बनाकर नहीं की जा सकती। दोनों अलग-अलग युगों के नेता हैं। नेहरू ने राष्ट्र निर्माण का दौर देखा, मोदी राष्ट्र पुनर्परिभाषा के दौर का नेतृत्व कर रहे हैं। नेहरू की चुनौती भारत को खड़ा करना थी, मोदी की चुनौती भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना है।
अब प्रश्न आता है कि भाजपा इस रिकॉर्ड का उत्सव क्यों मना रही है? इसका उत्तर राजनीति के स्वभाव में छिपा है। राजनीति केवल वर्तमान का प्रबंधन नहीं, इतिहास की व्याख्या का संघर्ष भी है। लंबे समय तक भारतीय राजनीति में नेहरू परिवार और कांग्रेस की विरासत प्रमुख रही। मोदी युग में भाजपा उस ऐतिहासिक विमर्श को बदलने का प्रयास कर रही है। नेहरू के रिकॉर्ड को पार करने का उत्सव वस्तुतः एक प्रतीकात्मक घोषणा है कि भारतीय राजनीति का केंद्र अब बदल चुका है।
यह केवल एक रिकॉर्ड का जश्न नहीं, बल्कि एक वैचारिक संदेश है। भाजपा अपने समर्थकों को यह बताना चाहती है कि जिस राजनीतिक धारा को कभी हाशिए पर माना जाता था, वही आज भारतीय राजनीति का मुख्य प्रवाह बन चुकी है। इसलिए यह उत्सव प्रशासनिक से अधिक राजनीतिक महत्व रखता है।
लोकतंत्र में तुलना स्वाभाविक है, लेकिन तुलना का आधार संतुलित होना चाहिए। यदि तुलना केवल कार्यकाल की लंबाई पर होगी तो वह अधूरी होगी। यदि तुलना केवल उपलब्धियों पर होगी तो भी पक्षपात का खतरा रहेगा। इतिहास का मूल्यांकन समय, परिस्थितियों और चुनौतियों के संदर्भ में होना चाहिए। लोकतंत्र में किसी नेता को बड़ा साबित करने के लिए दूसरे को छोटा साबित करना आवश्यक नहीं है।
सारत: इतिहास कोई क्रिकेट स्कोरबोर्ड नहीं है, जहाँ सबसे अधिक रन बनाने वाला ही सबसे महान घोषित कर दिया जाए। नेहरू और मोदी दोनों भारतीय लोकतंत्र के बड़े अध्याय हैं। एक ने भारत की नींव रखी, दूसरे ने उस इमारत को नए रंग और नई ऊँचाई देने का दावा किया। कौन बड़ा है, इसका निर्णय राजनीतिक दलों के उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास और आने वाली पीढ़ियाँ करेंगी। फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि रिकॉर्ड टूटते हैं, लेकिन विरासतें केवल समय की कसौटी पर ही बनती हैं।
डॉ घनश्याम बादल