हे हिन्दी के जननी………..

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hindi-diwasरंजना झा

हे हिन्दी के जननी:

हे हिन्दी के जननी तुमको शत् शत् प्रणाम ।
तुम दिव्य हो,शक्ति हो,प्रखर हो ।
नितान्त मार्ग प्रशस्त करना ही होगा ।
तुम शुद्ध हो,प्रबल हो ,मृदु हो
तुम्हें अविरल आगे आना ही होगा ।
तुम मातृतव हो, यशस्वी हो ,भारती हो ।
तुम्हें गनन तक ले जाना ही होगा ।
हे हिन्दी के सृजन कर्ता तुमको शिखर तक आना ही होगा
हिन्दी अपमानित करनेवाले को अभिशापित करना ही होगा।

 

हिन्दी को राज भाषा का दर्जा प्राप्त है लेकिन वह अधूरी किसी सरकारी दफ्तर में धूल खा रही है, फटे फाइल में हमेशा के लिए समाहित हो गई है, इसे न कोई देखने वाला और न सराहने वाला बस लावारिस की तरह (भाषा) वह लोगों से उपेक्षित हो गयी है।
चौदह सितम्बर समय आ गया है एक और हिन्दी दिवस मनाने का अवसर आया. आज हिन्दी के नाम पर कई सारे पाखंड होगें झूठी घोषणाएँ होगीं सरकारी आयोजन होगा हिन्दी में काम करने की प्रेरणा दी जाएगी हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियालीआँसू बहाए जाएगें हिन्दी में काम करने की झूठी शपथ ली जाएगी।
अगले दिन सब कुछ भूल कर लोग अपने अपने कामों में लगे जाएँगें और हिन्दी वहीं की वहीं सिसकती झुठलाई हुई रह जाएगी।हिन्दी गरीबों और कम पढ़े लिखे लोगों की भाषा समझी जाने लगी जिससे कुछ लोगों को जिन्हें हिन्दी से प्रेम है उनमें हीन भावना जागृत हो रही है वह कुंठित महसूस कर रहे हैं
यहाँ तक की सरकारी काम काज भी अंग्रेजी में ही होता है. सच तो यह है कि ज्यादातर भारतीय अंग्रेजी के मोहपाश में बुरी तरह जकड़े हुए है। स्वाधीन भारत में निजी पारिवारिक पत्र व्यवहार बढ़ता ही जा रहा है। बहुत कुछ सरकारी और गैर सरकारी कामकाज अंग्रजी में होता है। जबकि पूरी दुनिया में जितने भी विकसित देश है सभी जगह वहाँ की अपनी राजा भाषा का वर्चस्व है ,जापान,जर्मनी, फ्रांस, चीन इत्यादि यह सभी भाषा उनकी तरक्की की देन है जब पूरा यूरोप अपनी भाषा का पताका लहरा सकता है तो हमलोग क्यों नहीं अपनी भाषा में आगे बढ़ सकते है ।
आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हमारा समाज भाषा,संस्कृति, वेश -भूषा सभी कुछ भूल चुका है हमारे यहाँ बड़े बड़े नेता ,आधिकारीगण, व्यापारी हिन्दी के नाम पर लम्बे चौड़े भाषण देते है किन्तु अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाते हैं उन स्कूलों को बढ़ावा देते हैं ।अंग्रेजी में बात करना या बीच बीच में अंग्रेजी शब्द प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं।
हिन्दी के उपेक्षित होने के अनेक कारण हैं सरकार उन विद्यालयों की सुधी नहीं लेती जहाँ गरीब बच्चे पढ़ते हैं।
अच्छे शिक्षकों की कमी पढ़ाई के स्तर में सुधार न लाना हिन्दी में पुस्तकालय उपलब्ध न होना अनेक कारण हैं। हमारी न्यायालय की प्रक्रिया में भी सुधार की जरूरत है जहाँ फैसला भी अंग्रेज़ी में सुनाई जाती है पीड़ित को समझ आये या न आये इनसे कोई लेना देना नहीं।
जब तक हम खुद अपने में बदलाव नहीं लायेंगे तब तक हिन्दी को असली मायने में राजा भाषा का दर्जा नहीं दिला पायेंगे।
आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते है खासकर भारत में जहाँ साम्रावादी भाषा जनता को जनतंत्र से अगल कर रही है ।
भाषा के बारे में हमारी सोच और रवैया वही है जो जीवन के बारे में है ।कोई भी मूल्य नष्ट होने से बचा है कि भाषा और स्वाभिमान बचा रहे ? मैं समझती हूँ कि राजनीति,नौकरशाही, पूँजीवाद या साम्राज्यवाद को कोसना बेकार है जब तक खुद ही अपना हित -अहित नहीं देखेगें तब तक कुछ नहीं बदलेगा इसलिए कोई भी समस्या हो वह सीधे जनता के सामने हो ।
हिन्दी भाषा का प्रयोग केवल राष्ट्र के नाम रह गयी। भारत में जितनी भी किताबें हैं हिन्दी भाषा के नाम पर एक चौथाई भी उसके पाठक नहीं दिखते। हिन्दी के बारे कुतर्कों से ऐसे जाल लगातार फैलाए जाते रहे हैं कि उन्हीं का परिणाम है कि हिन्दी आज तक अनिवार्य एतिहासिक स्थान नहीं पा सकी ।

भाषा सहोदरी संगठन :-
भाषा सहोदरी हिन्दी के तत्वावधान में यह संगठन प्रचार -प्रसार और साहित्यकारों के विकास हेतु कटिबद्ध है भाषा सहोदरी हिन्दी विगत हर माह सम्पूर्ण हिन्दी के प्रचार हेतु परिचर्चा का आयोजन देश से हिन्दी प्रेमी ,बुद्धिजीवी,भाषाविद आदि इस कार्यक्रमो का हिस्सा बन कर हिन्दी को नई दशा और दिशा दिलाने का काम कर रही है जिसमें हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त हो सके इसके लिए भाषा सहोदरी 2017 में हिन्दी क्रांति जन -जन तक हिन्दी को पहुँचाने का लक्ष्य है रखा है
भाषा सहोदरी की मांग है कि 1 से 12 तक देश में हर राज्य के विद्यालयों में हिन्दी विषय एंव पूरे देश में सभी पाठ्यक्रम के प्रश्नपत्र हिन्दी में लागू हों! हिन्दी चाहती है कि हिन्दी राष्ट्र भाषा के साथ ज्ञान विज्ञान की भाषा भी बने इसके लिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय में विज्ञान और अनुसंधान की सारी पुस्तकें हिन्दी में उपलब्ध हो सके ।”भाषा सहोदरी हिन्दी” राज्य के मुख्यमंत्री राज्यपाल देश के प्रधान मंत्री सबों से अनुरोध करती है कि हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया जाए जिससे देश के हर बड़े संस्था, संगठन, सरकारी, गैर सरकारी अस्पताल ,अदालत सभी जगह हिन्दी की एक अहम भूमिका हो जहाँ सभी तरह के लोगों का कार्य सुचारू ढंग से चल सके लोगों को अपनी बात कहने और समझाने का अवसर मिले।
सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जिला अदालत न्यायालय में हिन्दी का उपयोग क्यों नहीं करती हमारा देश हमारी न्यायपालिका लेकिन हम अपनी भाषा में ही न्यायालय में सरलता से बात नहीं कह सकते ऐसा क्यों ?देश के संविधान अनुच्छेद 348 के तहत उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी कर दी गयी है।
हमारे देश में 80%जनता गांवों में रहती है जो हिन्दी भी बहुत मुश्किल से पढ़ पाते हैं उनके सामने कृषि या मवेशियों की दवाओं और अन्य सामान पर लगे लेबल अंग्रेजी में लिखे होते हैं जिन्हें वे पढ़ भी नहीं पाते ।जब अपने ही उत्पाद पर चाइना,जापान,फ्रांस, जर्मनी, इटली, कोरिया अपनी भाषा में लिखते हैं तब हिन्दुस्तान में बिकने वाली देशी विदेशी सामान पर हिन्दी के लेबल क्यों नहीं ? राज्य और भारत सरकार की पंजीकरण व लाइसेंस देने वाली एजेंसियां यह सुनिश्चित करे कि जब कोई कम्पनी यह शपथ पत्र देगी कि सामान पर एक तरफ हिन्दी लेबल होगा तभी उसे लाइसेंस दिया जाएगा ।
देश के विकास हेतु यह आवश्यक है कि हम भाषा को लेकर गंभीर हो तभी हम राष्ट्र और समाज में हो रहे भाषा के प्रति दोहरे रवैयापन को समाप्त कर सकते हैं।लोगों में हिन्दी भाषा को लेकर चल रहे कुंठित मन को खत्म करने के लिए “भाषा सहोदरी हिंदी” यह शपथ लेती हैं कि आने वाला कल हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी अवश्य होगी ।
जय हिन्दी जय भारत

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