हेडली की गवाही: अमेरिकी चकमा

hedlieडॉ. वेदप्रताप वैदिक

डेविड कोलमेन हेडली की गवाही का कोई ठोस नतीजा निकले या नहीं निकले लेकिन एक बात तय है कि भारत-पाक संबंधों पर उसका गहरा और लंबा असर पड़ेगा। हेडली कोई जन्म-जात अमेरिकी नहीं है। वह मूलतः पाकिस्तानी है। उसका असली नाम दाउद गिलानी है। पहला सवाल तो यही उठता है कि गिलानी कैसे हेडली बन गया? उसे नाम बदलने की जरुरत क्यों पड़ी? यदि उसे सिर्फ तस्करी ही करनी थी और पाक-अफगान सीमांत पर करनी थी तो ‘गिलानी’ नाम ‘हेडली’ से कहीं बेहतर रहता लेकिन उसने यह अमेरिकी नाम इसलिए रख लिया, क्योंकि उसे भारत में काम करना था। वह तो भारत आया था एक व्यवसायी के तौर पर लेकिन उसका काम था,अमेरिका के लिए जासूसी करना। अमेरिका के मादक-द्रव्य विभाग का जासूस बनकर वह भारत आया लेकिन उसका असली काम था,पाकिस्तान की फौज और गुप्तचर संस्था के लिए जासूसी करना। उसने इस दोहरी जासूसी के काम को बखूबी अंजाम दिया। अगर अपनी सात भारत-यात्राओं के दौरान वह मुंबई की ताज़ होटल और अन्य ठिकानों के बारे में सचित्र जानकारी नहीं पहुंचाता, मुंबई में घुसने और भागने के सुराग नहीं देता और 2008 के मुंबई हमले की साजिश में सक्रिय सहयोग नहीं करता तो 160 बेकसूर लोगों की जान क्यों जाती?

 

अब जबकि हेडली उर्फ गिलानी अमेरिकी जेल में सड़ रहा है, खुद को सजा-ए-मौत से बचाने के लिए वह सरकारी मुखबिर बन गया है। उसने पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था, आईएसआईएस के और लश्करे-तय्यबा सरगनाओं के नाम लेकर सारी साजिश की पोल खोल दी है। उसने जितने भी तथ्य अपनी गवाही में उजागर किए हैं, वे सब दुनिया को पहले से पता हैं। उनका महत्व यही है कि उन्हें हेडली ने अपने मुंह से दोहरा दिया है। इन तथ्यों पर हेडली की मुहर लग गई है। यह असंभव है कि अमेरिकियों ने हेडली को यह पट्टी पढ़ाई हो। इन तथ्यों का प्रचार सारे विश्व के खबरतंत्रों पर हो रहा है, क्योंकि सारा विश्व आतंकवाद से कुपित है। पाकिस्तान के लिए आज हेडली सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है। पाकिस्तानी सरकार, फौज, मीडिया और रक्षा-विशेषज्ञ चाहे हेडली की बातों को सिरे से रद्द कर दें और उसे इस्राइली एजेंट घोषित कर दें, इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी बदनामी को रोक नहीं सकता। हेडली ने पाकिस्तान को ‘हेड’ के बल खड़ा कर दिया है। मियां नवाज़ शरीफ के लिए जबर्दस्त सिरदर्द पैदा कर दिया है।

 

यदि मियां नवाज़ लश्करे-तय्यबा और जमात-दावा के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते हैं और आईएसआईएस को दड़बे में बंद नहीं करते हैं तो सारी दुनिया में यह बात फैल जाएगी कि वे नकली प्रधानमंत्री हैं, पाकिस्तान की सरकार मिट्ठी की माधव है और फौज के आगे पाकिस्तानी नेता कोरे गोबर-गणेश हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का दावा, जैसा कि प्रधानमंत्री शरीफ और सेनापति शरीफ भी करते हैं, अधूरा और लंगड़ा दावा माना जाएगा। वे सिर्फ उन आतंकवादियों के खिलाफ लड़ते हैं, जो पाकिस्तान में आतंक फैलाते हैं लेकिन वे उन आतंकवादियों की पीठ ठोकते हैं, जो भारत और अफगानिस्तान पर हमला करते हैं। दूसरे शब्दों में कुछ पाकिस्तानी आतंकवादी अच्छे हैं और कुछ बुरे हैं। जो आतंकवादी अच्छे हैं याने जो पाकिस्तानी विदेश नीति की अदृश्य भुजा बने हुए हैं, भला उनके विरुद्ध सरकार और फौज कुछ भी क्यों करे? इसीलिए यह संदेह पक्का होता है कि जैसे मुंबई हमले के अपराधी छुट्टे घूम रहे हैं, वैसे ही पठानकोट हमले के षडयंत्रकारी भी घूमते रहेंगे। यदि सभी हमलों में कुछ न कुछ आतंकवादी जिंदा पकड़ लिए जाएं तो वे हेडली याने दाउद गिलानी से भी बड़े ‘विश्वासघाती’ साबित होंगे। वे पाकिस्तानी फौज, आईएसआईएस और सारे आतंकी गिरोहों को निर्वस्त्र कर देंगे। वे मूलत: कायर होते हैं। निहत्थों पर वार करते हैं। बेकसूरों को मौत के घाट उतारते हैं। और जब वे पुलिस के शिकंजे में फंसते हैं तो पता चलता है कि वे किसी के भी सगे नहीं होते। वे अपने-पराए, सभी की पोल खोल देते हैं। वे पाकिस्तानी सरकार की तरह अच्छे और बुरे तथा अपने और पराए का भेद-भाव नहीं करते। दाउद गिलानी ने यही किया है।

 

यह सही मौका है, जबकि पाकिस्तान की फौज और सरकार को सोचना चाहिए कि वह आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का हथियार बनाए या न बनाए? विदेशों में फैलता हुआ यह आतंकवाद अब पाकिस्तान का घरेलू केंसर बन गया है। जितने बेकसूर लोग आज पाकिस्तान में आतंकवाद के शिकार होते हैं, उतने भारत, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कुल मिलाकर नहीं होते। घरेलू और बाहरी आतंकवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिनकी दाल बाहर नहीं गलती, वे ही लोग देश के अंदर आतंकवाद फैलाते हैं। अब आतंकवाद बाकायदा एक धंधा बन गया है, जिसमें तस्कर, हत्यारे, डाकू, बलात्कारी और बेरोजगार लोग दौड़े चले आते हैं। वह गुंडई का सबसे बड़ा शरण-स्थल बन गया है। इस गुंडई पर मजहब और देशभक्ति का मुखौटा चढ़ा दिया जाता है। यही वजह है कि पाकिस्तान, जिसका मतलब होता है, ‘पवित्र स्थान’, उसे अंतरराष्ट्रीय जगत में ‘गुंडा राज्य’ (रोग स्टेट) कहा जाता है। पाकिस्तान के नीति-निर्माता ज़रा सोचें कि इस आतंकवाद के जरिए क्या वे कश्मीर पर कब्जा कर सकते हैं? चार-चार युद्ध जहां फिजूल सिद्ध हुए, वहां ये आतंकवादी हादसे क्या असर डाल सकते हैं? हां, उल्टा जरुर हो सकता है। यदि कोई सख्त-मिजाज प्रधानमंत्री दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया तो पाकिस्तान को लेने के देने पड़ सकते हैं।

पाकिस्तानी नेताओं, अफसरों और पत्रकारों की मजबूरी मैं खूब समझता हूं। यदि वे दाउद गिलानी की भत्र्सना न करें तो फौज उनकी खाल उधेड़ देगी। आतंकवादी उन्हें ढेर कर देंगे और पाकिस्तान में जूं तक नहीं रेंगेगी। पाकिस्तान फौज इसीलिए सबकी छाती पर सवार है कि उसने पाकिस्तान की जनता पर भारत का हव्वा खड़ा कर रखा है। भारत ने पाकिस्तान के वजूद को कुबूल नहीं किया है और वह उसे खत्म करके ही दम लेगा, यह दहशत फौज ने हर पाकिस्तानी के दिल में बिठा रखी है। भारत-भय की इस गांठ को खोलना भारतीय नेताओं का पहला कर्तव्य है। इसके अलावा अमेरिका अगर पाकिस्तान की फौज में प्राणवायु फूंकना बंद कर दे तो वह जाकर अपने दड़बे में बैठ जाएगी। अभी कल  ही अमेरिका ने पाकिस्तान को अरबों डाॅलर देने की घोषणा की है, जिसका बड़ा हिस्सा फौज जीम जाएगी। पाकिस्तान की फौज अपने आप में निहित स्वार्थ का सबसे बड़ा अड्डा है। यदि पाकिस्तानी फौज की पीठ पर से अमेरिका अपना हाथ हटा ले तो वह नेताओं के आगे घुटने टेक देगीं। पाकिस्तान में सच्चे लोकतंत्र का उदय हो जाएगा। पाकिस्तान के नेता और आम लोग भारत से अच्छे संबंध बनाना चाहते हैं लेकिन अमेरिकियों से बढ़कर कमअक्ल और स्वार्थी नेता कहां मिलेंगे?उन्होंने ही पूरे दक्षिण एशिया को आतंकवाद की आग में झोंका है। उन्होंने ही मुजाहिदीन, तालिबान, उसामा बिन लादेन के अल-क़ायदा और ‘इस्लामी राज्य’ जैसे हिंसक गिरोहों को सरसब्ज किया है। वे हेडली की गवाहियां ‘स्काइप’ पर करवाकर हमारे नौसिखिए नेताओं को बुद्धू बना रहे हैं। इशरत जहान के हवाले से हम गद्गद् हैं लेकिन हम यह क्यों नहीं समझते कि भारत-पाक झगड़े की असली जड़ अमेरिका ही है। क्या अमेरिका की शक्तिशाली एजंसियों को पहले से पता नहीं था कि भारत में उसका जासूस हेडली क्या-क्या करता रहा है? लेकिन अमेरिका को इससे क्या लेना-देना कि भारत कितना परेशान है? यदि भारत-पाक रिश्ते बिगड़े रहें तो उसका क्या नुकसान है? उसका तो फायदा ही है। हथियारों की बिक्री बढ़ेगी। उसने अपने विरुद्ध जो आतंकवाद था, उसकी जड़ों में मट्ठा डाल दिया है लेकिन भारत और पाकिस्तान, दोनों ही आतंकवाद से तबाह हो रहे हैं तो होते रहें। दोनों देशों में चाहे तनाव बना रहे, लेकिन दोनों से अमेरिका के संबंध घनिष्टतर होते जा रहे हैं।

 

1 COMMENT

  1. अमेरिका है हतियारो का व्यापारी, लड़ाएगा तभी तो हथियार बिकेंगे. दक्षिण एशिया में सभी मुलको के द्वन्द के पीछे पश्चिमी शक्तियो का हाथ है. सटीक विश्लेषण है .

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