(कल्याण सिंह जी की 94वीं जन्म-जयंती 05 जनवरी 2026 पर विशेष कविता)
माटी से उठकर शिखर बने,
सेवा को सत्ता का अर्थ किया,
जन-जन के मन में राज किया,
ऐसे बाबूजी हमने देखे।
कोमल हृदय, वज्र सा संकल्प,
हिमालय-सा विराट व्यक्तित्व,
राष्ट्रधर्म जिनका पाथेय रहा,
वो युगपुरुष, वो अद्भुत व्यक्तित्व।
अतरौली की साधारण माटी से,
निकले असाधारण पुरुष महान,
किसान कुल की सादगी में,
पला भारत का सच्चा अभिमान।
संघ की शाखा, गाँव-गाँव पदचाप,
जागरण बना जीवन का मंत्र,
अध्यापन से प्रशासन तक,
सीखा संघर्ष, सीखा यंत्र।
आपातकाल की काली रातें,
जेल की दीवारें गवाह बनीं,
लोकतंत्र की रक्षा खातिर,
उनकी दृढ़ता अडिग रही।
जब सत्ता हाथों में आई,
तो सेवा का पथ अपनाया,
कानून-व्यवस्था, सुशासन देकर,
उत्तर प्रदेश को नया आयाम दिलाया।
अयोध्या की पावन धरती पर,
धर्म ने जब पुकार लगाई,
सिंहासन नहीं, सिद्धांत चुना,
इतिहास ने करवट बदलाई।
छह दिसम्बर का त्याग दिवस,
सत्ता छोड़ धर्म निभाया,
रामभक्त ने राजनीति को,
आस्था का अर्थ समझाया।
जनता के नेता, बाबूजी कहलाए,
बच्चा-बूढ़ा, युवा सबने माना,
लोधी-राजपूत, पिछड़ा-सवर्ण,
हर दिल में बसता था उनका ठिकाना।
भटके पथ भी, टूटा साथ भी,
पर लक्ष्य कभी नहीं बदला,
राम, राष्ट्र और जनभावना,
इनसे जीवन का दीपक जला।
राजभवन से भी नजर रही,
माटी की राजनीति पर सदा,
आशीर्वाद में शक्ति भरकर,
लोकतंत्र को दी नई दिशा।
इकहत्तर सीटें, अस्सी में से,
इतिहास ने जयघोष किया,
मोदी युग के शिल्पकारों में,
बाबूजी का नाम लिखा।
आज रामलला का भव्य धाम,
त्याग की अमर निशानी है,
कल्याण सिंह का योगदान,
इतिहास की अमिट कहानी है।
अस्सी-नौ वर्ष की आयु में,
रामनाम संग विदा हुए,
पर विचार, संस्कार, साहस,
युगों तक जीवित रहेंगे।
जब-जब त्याग की चर्चा होगी,
जब-जब धर्म पुकारेगा,
हिन्दू हृदय सम्राट कल्याण सिंह,
हर भारतवासी को याद आएगा।
– ब्रह्मानंद राजपूत