इतिहास, संस्कृति और गौरव को सहेजे गिरजाघर

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गुड फ्राईडे पर विशेष

लिमटी खरे

गंगा जमुनी तहबीज वाले भारत वर्ष में हर वर्ग हर मजहब, हर संप्रदाय को मानने वालों की कमी नहीं है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक देश में मसीही समाज के इबादत गाह अपने अंदर इतिहास, संस्कृति, प्राचीन नायाब वास्तुशिल्प और निर्माण शैली आदि को सहेजे हुए हैं। मसीही समाज के अलावा अन्य संप्रदाय के लोग भी इन गिरजाघरों में जाकर पूजन अर्चन कर पुण्य लाभ कमाने से नहीं चूकते हैं।

पुर्तगालियों ने देश में गोथिक और बारोक शैली में चर्च निर्मित करवाए। वहीं दूसरी ओर ब्रितानियों ने यूरोपियन और अमरीकी शैली में इनका निर्माण किया। कैथोलिक चर्च के अंदर भव्यता और उन्हें अलंकृत करने का शुमार रहा तो प्रोटेस्टेंट चर्च की बनावट काफी हद तक सादी है। शैली चाहे जो रही हो पर एक बात तो तय है कि आज ये सभी इबादतगाह देश के लिए गौरवशाली धरोहर से कम नहीं हैं।

धर्म निरपेक्ष भारत गणराज्य में आदि अनादि काल से सभी धर्मों का आदर करने की परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है। यही कारण है कि भारत में हर धर्म के तीज त्यौहारों को पूरे उल्लास के साथ मनाने की परंपरा का निर्वहन हो रहा है। देश के अनेक गिरजाघरों की आंतरिक साज सज्जा, नायाब वास्तुकला, इतिहास और एतिहासिकता भारत ही नहीं वरन समूचे विश्व में विख्यात है। आईए देश के कुछ चर्च के बारे में आपको जानकारी से लवरेज करें:-

0 केरल

माना जाता है कि मसीही समाज या ईसाई धर्म का आगमन भारत में केरल से हुआ था। ईसा के शिष्ष्य थॉमस के आने के बाद यहां गिरजाघरों की स्थापना का काम आरंभ हुआ। केरल के चर्च की छटा अपने आप में अनूठी ही है। केरल में त्रिचूर का अवर लेडी ऑफ लोरडस चर्च की चर्चाएं न केवल हिन्दुस्तान वरन् समूचे विश्व में होती हैं। इस विशालतम चर्च की आंतरिक साज सज्जा और वास्तुशिल्प अकल्पनीय ही कहा जा सकता है। इसी तरह यहां कोच्ची के 52 किलोमीटर दूर मयलातूर हिल्स पर स्थापित कैथोलिक चर्च अपने आप में अद्वितीय माना जाता है। धारणा है कि इस चर्च की स्थापना स्वयं सेंट थॉमस द्वारा करवाई गई थी।

0 दिल्ली

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में मसीही समाज के इबादतघरों की कमी नहीं है। यहां अनेक एतिहासिक चर्च मौजूद हैं जो आज भी दमक रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली में चांदनी चौक स्थित सेंट्रल बेपटिस्ट चर्च प्राचीनतम चर्च है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें यूरोपियन और मुगल कालीन शैली का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। दिल्ली का दूसरे नंबर का प्राचीनतम चर्च कश्मीरी गेट पर अंतर्राट्रीय बस अड्डे के पास बना सेंट जेम्स चर्च है। इसके अलावा दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति के आवास के निकट स्थापित कैथेड्रल चर्च जिसे वाईसराय चर्च भी कहते हैं की खूबसूरती देखते ही बनती है। गोल डाकघर के पास कैथेड्रल ऑफ द सेकेंड हार्ट चर्च भी दर्शनीय है। इन सभी चर्चों की शोभा तब निखर जाती है जब ईसामसीह के जन्म दिन क्रिसमस पर इन्हें दिल से सजाया जाता है।

0 हिमाचल प्रदेश

भारत की देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में मसीही समाज के पूजाघरों की छटा अपने आप में अनोखी ही मानी जाती है। पर्वतों पर बसे शिमला के माल रोड़ पर स्थित क्राईस्ट चर्च की चर्चा के बिना देवभूमि के चर्च अधूरे ही हैं। गोरे ब्रितानियों के राज में ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी शिमला। बताते हैं कि इस चर्च का निर्माण 1858 मंे कराया गया था। इसके स्टेंड ग्लास विंडोज की भव्यता और सुंदरता आज भी उसी तरह है जैसी कि निर्माण के वक्त हुआ करती थी। शिमला का सेंट माईकल्स चर्च भी लुभावना ही है। लार्ड डलहौजी द्वारा बसाए गए डलहौजी सुभाष चौक में सेंट फ्रांसिस कैथोलिक चर्च, गांधी चौक पर सेंट जॉन चर्च सहित यहां चार चर्च हैं। कहा जाता है कि सैंट जॉन चर्च की बनावट इंग्लैण्ड के कैथोलिक चर्च ऑफ इंग्लैण्ड की भांति ही है।

0 गोवा

पर्याटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण गोवा में अनेक एतिहासिक चर्च मौजूद हैं। इनमें से अनेक चर्च तो आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में पंजीबद्ध हैं। गोवा में ‘से-कैथेड्रल‘ आकार में सबसे बड़ा चर्च है। पुर्तगाली गोथिक शैली में बने इस चर्च की भव्य इमारत गोवा की सबसे बड़ी गिरजाघर घंटी जिसे गोल्डन बेल कहा जाता है स्थापित है। यहां का चर्च ऑफ सैंट फ्रांसिस एसिसी, सैंट फ्रांसिस को पूरी तरह समर्पित है। यहां लकड़ी पर उकेरी गई काष्ठकला और भित्ती चित्र वाकई में दर्शनीय हैं। गोवा का बासिलिका ऑफ बॉम जीसस चर्च तो रोमन कैथोलिक जगत में अपना अहम स्थान रखता है। इसमें सेंट फ्रांसिस स्मारक में उनकी ममी आज भी संरक्षित है। 1605 में निर्मित इस चर्च में उनके जीवन के प्रसंगों को भित्ति चित्रों के माध्यम से जीवंत करने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा गोवा में चर्च ऑफ सेंट मोनिका, चैपल ऑफ सैंट एंथोनी भी नायाब हैं।

0 तमिलनाडू

तमिलनाडू में ईसाई समाज के इबादतघरों की कमी नहीं है। तमिलनाडू के तंजावुर जिले की वेलांकन्नी चर्च को इसाईयों का प्रसिद्ध तीर्थ माना जाता है। यहां ‘वर्जिन मेरी‘ को ‘आरोग्य माता‘ के रूप में माना जाता है। माना जाता है कि यहां आने वाले भक्तों श्रृद्धालुओं के रोग दूर करने की चमत्कारी शक्तियां मौजूद हैं। यहां प्रार्थना करने पर कष्टों का निवारण अपने आप ही हो जाता है। इसका 92 फीट उंचा शिखर दूर से ही लोगों को लुभाता है। चेन्नई में सैंट थॉमस माउंट चर्च का अपना अलग ही महत्व है। इस चर्च का उल्लेख 13वीं शताब्दी में मार्कोपोलो के संस्मरणों में भी मिलता है। इस स्थान पर ईसा मसीह के शिष्य फिलिस्तीनी सेंट थामस ने देह त्यागी थी। इसके बाद 1893 में इस चर्च का पुर्ननिर्माण निओगोथिक शैली में हुआ था।

0 उत्तर प्रदेश

देश को सबसे अधिक वजीरेआजम देने वाले उत्तर प्रदेश सूबा अपने दामन में अनेक चर्च समेटे हुए है। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को अपने आप में सहेजने वाले मेरठ शहर में बेगम समरू द्वारा बनवाए गए चर्च को देखे बिना उत्तर प्रदेश की यात्रा अधूरी ही समझी जा सकती है। सरघना स्थित कैथोलिक चर्च को बेगम समरू का चर्च भी कहा जाता है। 1822 में निर्मित इस चर्च की विशेषता यह है कि एक मुस्लिम महिला बेगम समरू ने इसका निर्माण करवाया था। उनका विवाह वाल्टर रहेंहार्ट से हुआ तब उन्होंने ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया था। इसके अलावा कानपुर और लखनउ का क्राईस्ट चर्च, इलाहाबाद का कैथेड्रल चर्च अपने आप में भव्यता लिए हुए है।

पुड्डुचेरी

पुड्डुचेरी में अनेकानेक चर्च हैं। फ्रेंच इंडो संस्कृति के मिले जुले स्वरूप को देखकर सैलानी आकर्षित हुए बिना नहीं रहते हैं। चर्च ऑफ सेक्रेड हार्ट ऑफ जीसस, चर्च ऑफ अवर लेडी ऑफ इमेक्युलेट कंसेप्शन, चर्च ऑफ द लेडी ऑफ एंजल्स आदि पुमुख चर्च हैं जो यूरोपीय शैली में निर्मित हैं।

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लिमटी खरे
हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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