आशा और विश्वास का नूतन पर्व

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ऐसा कहते हैं कि शेर छलांग लगाने के बाद क्षण भर के लिए पीछे मुड़कर देखता है कि वह कितनी दूर कूदा है। इसे ही ‘सिंहावलोकन’  कहते हैं। प्राचीन भारतीय युद्धशास्त्र में इसी आधार पर ‘सिंहध्वज’ नामक एक प्रयोग है। इसमें योद्धा शस्त्र चलाते हुए एक बार, और फिर पीछे देखकर दूसरी बार आगे कूदता है। जिन अखाड़ों में लाठी, पटा, बनैटी आदि सिखाये जाते हैं, वहां यह प्रयोग आज भी देखा जा सकता है। वर्तमान युग में सेनाएं भले ही इसे भूल गयी हों, पर हर युद्ध में पिछले काम की समीक्षा करते हुए, उसके आधार पर ही आगे की रणनीति तय की जाती है।

पिछले दिनों विधानसभा के चुनाव यद्यपि पांच राज्यों में हुए हैं; पर चर्चा केवल चार की ही है। क्योंकि इनके आधार पर ही 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों के परिदृश्य का आकलन किया जा सकता है। एक दूसरा तथ्य यह भी है कि इन चारों राज्यों में कांग्रेस और उसके सर्वेसर्वा मां-बेटे की बुरी तरह पराजय हुई है।

छत्तीसगढ़ में भा.ज.पा. की जीत डा. रमनसिंह के विनम्र स्वभाव, जनहितैषी नीतियों तथा कुशल प्रबंधन की जीत है। बस्तर में कांग्रेसी काफिले पर हुए हमले से कांग्रेस को भरपूर सहानुभूति मिली। इससे वहां कांग्रेस की सीटें भी बढ़ीं। यद्यपि बाकी राज्य में भा.ज.पा. ने इतनी बढ़त ले ली, कि उसे बहुमत मिल गया। कई लोगों का मत है कि यह हमला, यात्रा में अनुपस्थित किसी कांग्रेसी नेता ने ही कराया, जो अधिकांश नेताओं को मरवा कर उस सहानुभूति के बल पर स्वयं मुख्यमंत्री बनना चाहता था। इस कांड के पीछे नक्सली कम्यूनिस्टों के साथ विदेशी शक्तियां भी हो सकती हैं। नयी सरकार को अब इसकी पूरी जांच कर षड्यंत्र का पर्दाफाश करना चाहिए।

डा. रमनसिंह बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस कांड के बाद भी धैर्य नहीं खोया। उन्हें विश्वास था कि उनकी जनहितैषी योजनाओं और पारदर्शी प्रशासन शैली को जनता का प्यार अवश्य मिलेगा। और यही हुआ भी। इससे उनका प्रभामंडल देशव्यापी हो गया है। राज्य में भाजपा का संगठन कौशल भी हर कसौटी पर खरा उतरा है।

म.प्र. में भा.ज.पा. ने पहले से भी बड़ी जीत पाई है। वहां दिग्विजय सिंह जैसे पुराने महारथियों से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नये सेनापति ठुकरा दिये गये। 10 वर्ष के शासन के बाद लोगों में नेताओं और नीतियों के प्रति प्रायः कुछ नाराजगी हो जाती है; पर यह शिवराज सिंह चैहान के सौम्य और सर्वसुलभ व्यक्तित्व, जनहितकारी नीतियों और कठोर प्रशासनिक क्षमता की सफलता है कि उन्होंने राज्य के हर हिस्से में पहले से अधिक स्थान प्राप्त किये हैं। इससे उनका कद भी अब नरेन्द्र मोदी जैसा ही प्रभावी हो गया है।

राजस्थान में पिछली बार कांग्रेस की जीत वस्तुतः उसकी अपनी जीत नहीं थी। वसुंधरा राजे के रूढ़ और राजसी स्वभाव से कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी, उसका लाभ कांग्रेस को मिल गया। लोग तब भी भा.ज.पा. से नाराज नहीं थे। इसीलिए उसे कांग्रेस के 95 से कुछ ही कम, अर्थात 78 स्थान मिले थे; पर इस बार जनता जहां राज्य और केन्द्र की कांग्रेस सरकार से नाराज थी, वहां भा.ज.पा. के कार्यकर्ता भी एकजुट हो गये थे। अतः चमत्कार तो होना ही था।

दिल्ली में जो हुआ, राजधानी होनेे के कारण मीडिया में उसकी चर्चा बहुत है। एक नये दल आ.पा. ने कांग्रेस का विपक्ष का स्थान भी छीनकर उसे इकाई (8) बना दिया। भा.ज.पा. को यद्यपि सर्वाधिक 32 स्थान मिले हैं; पर बहुमत न होने से उसने सरकार नहीं बनाई और अब कांग्रेस के सहयोग से आ.पा. सरकार बना रही है। 28 स्थान लेने वाले अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बनेंगे।

अन्ना आंदोलन से उपजी आ.पा. को देखकर शुरू में भा.ज.पा. को लगता था कि यह कांग्रेस विरोधी वोटों को भाजपा की ओर आने से रोकेगी और कांग्रेस फिर जीत जाएगी। इसलिए कांग्रेस वाले बहुत खुश थे। कहते हैं कि शुरू में तो कांग्रेस ने ही उन्हें साधन दिये; पर उसने दुधारी तलवार की तरह दोनों के वोटों में सेंध लगा दी।

अब कांग्रेस ने उनकी सरकार को बाहर से समर्थन दिया है। पहले यह समर्थन ‘बिना शर्त’ था, जो अब ‘सशर्त’ हो गया है। वस्तुतः कांग्रेस किसी तरह कुछ महीने काटना चाहती है, जिससे लोकसभा के चुनाव बीत जाएं। उसे भय है कि यदि यहां राष्ट्रपति शासन लग गया और लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए, तो नरेन्द्र मोदी की आंधी में भा.ज.पा. पूर्ण बहुमत पा लेगी। इसीलिए उसने आ.पा. को बल्ली पर चढ़ाया है। केजरीवाल यह जानते हैं; पर अपने साथियों और विधायकों के दबाव मे उन्हें यह मानना पड़ा है। अब इस सरकार का भविष्य क्या होगा, यह समय ही बताएगा।

आ.पा. को जितने स्थान मिले हैं, वस्तुतः उतनी आशा उन्हें नहीं थी। मीडिया और सर्वेक्षण संस्थानों को भी उनके दहाई तक पहुंचने में संदेह था; पर जो हुआ, वह सामने है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि आ.पा. की जीत वस्तुतः भा.ज.पा. की रणनीतिक विफलता से हुई है। यदि भा.ज.पा. मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी छह महीने पहले घोषित कर देती, तो उसे पूर्ण बहुमत मिलता; पर चुनाव से पहले विजय गोयल और डा. हर्षवर्धन में हुई खींचतान ने वातावरण बिगाड़ दिया। उधर कांग्रेस और आ.पा. के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बहुत पहले से घोषित थे। अतः कांग्रेस से नाराज लोगों ने केजरीवाल के पक्ष में मन बना लिया। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों को आ.पा. प्रत्याशी का नाम भी पता नहीं था। उन्होंने तो केजरीवाल को वोट दिया। इससे स्पष्ट है कि चुनाव में पर्याप्त समय पहले सेनापति घोषित हो जाना चाहिए।

अब आ.पा. की सरकार अनेक आशा, आशंका और संदेहों के बीच बन रही है। आशा इसलिए, चूंकि उसके सभी विधायक आंदोलन से निकले युवा हैं। ऐसे लोग प्रायः अच्छा ही करते हैं; पर इस उत्साह के साथ अनुभवहीनता भी है। अनुभवहीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने श्रीलंका के आंतरिक मामले में टांग देकर न केवल सैकड़ों भारतीय सैनिक मरवाये, अपितु अपनी जान भी गंवाई। ऐसे ही अनुभवहीन अखिलेश भी उ.प्र. का बंटाधार कर रहे हैं। इसलिए आशा के साथ आशंकाएं भी बराबर बनी हुई हैं।

जहां तक संदेह की बात है, तो कांग्रेस के पहले ‘बिना शर्त’ और अब ‘सशर्त’ समर्थन के बीच का सच क्या है, पारदर्शिता के पक्षधर केजरीवाल को यह बताना चाहिए। बाहर से समर्थन देकर सरकार गिराने का कांग्रेस का पुराना इतिहास है। इस सरकार को वह कब तक झेलेगी, यह देखना है।

इसके साथ ही आंदोलन से निकली सरकारों का अनुभव भी अच्छा नहीं है। 1977 में आपातकाल विरोधी आंदोलन से बनी जनता सरकार अपने अंतरविरोधों से ढाई साल में ही गिर गयी। तब जो लोग इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरोध में जेल गये थे, उनमें से जनसंघ की पृष्ठभूमि वालों को छोड़कर बाकी सब (लालू, पासवान, नीतीश, मुलायम, शरद, अजीत.. आदि) अब कांग्रेस के साथ हैं। भ्रष्टाचार और सत्तालोलुपता की आंधी में इनके आदर्श ढह चुके हैं। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ के विरुद्ध हुए आंदोलन से बनी ‘असम गण परिषद’ की सरकार में भी सब अनुभवहीन युवक थे। वह एक भी घुसपैठिये को नहीं निकाल सकी और आपसी टकराव से टूट गयी।

केजरीवाल और उनके साथियों की देशी-विदेशी सहयोग से चलने वाली अपनी निजी स्वयंसेवी संस्थाएं (एन.जी.ओ.) हैं। इन्हें मोटा चंदा देने वालों के प्रायः कुछ निहित स्वार्थ होते हैं। ऐसे में उनके मंत्री, विधायक और कार्यकर्ता कैसे संतुलन बनाएंगे ? कैसा आश्चर्य है कि अन्ना, केजरीवाल और सरकार, तीनों ही इन संस्थाओं को लोकपाल की जांच से बाहर रखने पर सहमत हैं। फिर आ.पा. की अल्पमत सरकार जनता को दिये आश्वासन कैसे पूरे करेगी, यह भी देखना है। फिर भी इस संभावित सरकार को हमारी शुभकामनाएं हैं।

इन परिणामों का साफ संदेश है कि कांग्रेस और उसके सर्वेसर्वा मां-बेटे का पराभव पर्व शुरू हो चुका है। पार्टी के अंदर ही अब ऐसे स्वर उठने लगे हैं। कुछ लोग नाव डूबने की आशंका से पाला बदलने पर भी विचार कर रहे हैं। बेचारे मनमोहन सिंह तो जैसे-तैसे अपने दिन पूरे कर रहे हैं। दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी का जादू पूरे यौवन पर है। लोग उन्हें अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं।

आलोचक चाहे जो कहें; पर छत्तीसगढ़ में सरकार बचाने और दिल्ली में भा.ज.पा. को सबसे आगे रखने में मोदी का बड़ा योगदान है। म.प्र. और राजस्थान की छप्पर फाड़ जीत का श्रेय शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे के साथ मोदी को भी है। चूंकि भा.ज.पा. ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया है, इसलिए कांग्रेस पर भी अब इसका दबाव है। अंदर ही अंदर दबाव यह भी है कि वह प्रत्याशी राहुल के अलावा कोई और हो, तो अधिक अच्छा रहेगा। जो भी हो; पर नरेन्द्र मोदी ने इस दौड़ में निर्णायक बढ़त बना ली है।

चुनाव में कांग्रेस तथा अन्य घरेलू, जातीय या क्षेत्रीय दलों की जीत का समीकरण चाहे कुछ भी हो; पर इनसे अलग होने के कारण भा.ज.पा. की जीत में तीन पहलू काम करते हैं। वे हैं संघ का कार्यकर्ता, भा.ज.पा. का कार्यकर्ता और वातावरण। यदि इनमें से दो साथ आ जाएं, तो भा.ज.पा. जीत जाती है। और यदि तीनों पहलू मिल जाएं, तो वही होता है जो म.प्र. और राजस्थान में हुआ। इसलिए लोकसभा चुनाव के लिए भा.ज.पा. को इन तीनों पहलुओं को साधना होगा।

कुछ दिन बाद नया ईसवी वर्ष 2014 प्रारम्भ हो रहा है। यह वर्ष आशा, आशंका और संदेह के साथ यह विश्वास भी लाया है कि देश अब खानदानी और भ्रष्ट राजनीति से ऊब चुका है; पर तीन माह बाद जब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के अवसर पर नूतन संवत्सर 2071 आयेगा, तब तक आशंका और संदेह के बादल काफी कुछ छंट चुके होंगे। तब होगा केवल आशा और विश्वास। इस वासंतिक शुभ पर्व का नेतृत्व कौन करेगा, यह तो सब जानते ही हैं। नमो नमः।

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