लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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imagesबधाई हो! झाड़ू-हाथ हुए अब एक साथ! ढेर सारे तमाशे करने के बाद अंततः झाड़ू
और हाथ के अवैध प्रेम संबंधों को नई ऊँचाई मिल ही गई. लंबी जुदाई और
लुका-छुपी के बाद दोनों ने अब खुल्लमखुल्ला प्यार का इजहार कर दिया है
जिसके उपहार स्वरूप दिल्ली में जन समर्थन न होने के बाद भी सरकार बन गई.
वैसे भी समलैंगिक संबंधों को लेकर जबसे दोनों ने एक राय बनाई है, ऐसे
गठबंधन बनने की संभावनाएं मजबूत हो गई थी. बस मुहर लगनी बाकी थी, जिसे
आआपाई अंदाज में धमाकेदार नौटंकी करके मुहर लगा दी गई. अब दोनों नई पारी
खेलने को तैयार है. जो कट्टर लेकिन सीधे-साधे कांग्रेसी लोग भ्रमवश आआपा
को कांग्रेस विरोधी मान विधवा विलाप किया करते थे, अब वे हाथ को मिले
झाड़ू के साथ से बहुत खुश दिखाई दे रहे है. ख़ुश हो भी क्यूँ न! लगातार
सत्ता सुख भोगने का मौका जो मिल रहा है.

वैसे आआपा वाले भी बड़े खुश है. फेसबुक-ट्विटर पर खुशियाँ मनाते अपने
“आआपा” वाले परसों ऐसे झूम रहे थे, मानो केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री
नही, बल्कि अमेरिका को पछाड़ के तृतीय विश्व युद्ध जित विश्व नायक का
ख़िताब पा गए हो!

लोगों को मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाकर दिल्ली को आंठवी, दसवीं और
बारहवी पास विधायक दिलाने वाली उच्च शिक्षित पार्टी आआपा आनेवालें दिनों
में क्या करेगी, यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन फिलहाल कांग्रेस का
मोदिविरोधी “मिशन आआपा” सफल दिखाई दे रहा है. जबसे आआपा आई है, कांग्रेस
के भ्रष्टाचार की काली धुआं छटती दिखाई दे रही है. जाहिर है, झाड़ू और हाथ
के इस खुल्लमखुल्ला मिलन से भाजपा, विशेषकर मोदी विरोधी खेमें में भी
अत्यधिक प्रसन्नता महसूस की जा रही है. दिल्ली में कांग्रेस-नक्सल
समर्थकों की सरकार बनने से कई बुद्धिजीवी तो कुछ ज्यादा ही खुश है और इस
ख़ुशी में कुछ ज्यादा ही लाल दिखाई दे रहे है. जो काम सांप-छछुंदर के नाम
पर रखे खोजी वेबसाईटों ने नही किया, उसे साल भर में पोल पर चढ़कर तार
काटने और जोड़ने वाले लोगों ने कर दिखाया. यह अलग बात है कि किसी ने आजतक
पूछने की जहमत नही उठाई कि आखिर सरकारी कामों में अनावश्यक हस्तक्षेप
करनेवाले महाशय के खिलाफ़ किस मज़बूरी में कांग्रेस ने कोई कड़ी कारवाई नही
की?

सत्यवादी कलयुगी हरिश्चन्द्र और उन्हीं के शब्दों में महाभ्रष्ट कांग्रेस
की मिलीजुली सरकार- क्या अद्भुत दृश्य है दिल्ली में सरकार का.कांग्रेस 8
सिट जीतकर कर भी 70 सदस्यीय विधानमंडल में सरकार बनाने की स्थिति में आ
जाएगी, इसका भरोसा आम दिल्लीवाशियों को कभी नही था. आमतौर पर राजनीति से
चुनाव में वोट गिराने तक का संबंध रखनेवाले लोग ठगे से महसूस कर रहे है.
कांग्रेस के कुशासन से आजिज जनता ने जिस भरोसे के साथ आआपा को समर्थन
किया था, वह तार-तार हो गया. सत्ता पाने की भूखी आआपा लाख कुतर्कों और
नौटंकियों से भ्रष्ट कांग्रेस से किए अपने गठजोड़ को उचित ठहराए, लेकिन
उसने जन-भावनाओं को नकार कर येन-केन-प्रकारेण सत्ता सत्ता हथियाई है,
इससे कोई इनकार नही कर सकता. कांग्रेस-भाजपा से समर्थन “न लेंगे, न
देंगे” और अपने बेटे की कसम खाकर कांग्रस से गठबंधन न करने की बात कहकर
वोट लेने वालो की असलियत अब बेनकाब हो गई है! जनता देख रही है कि कैसे
टोपीधारी कार्यकर्ताओं को जुटाकर तथाकथित जनसभाएं की गई और अपने ही लोगों
की राय को जनता की राय मानकर सरकार बना ली गई. आआपा के किसी भी जनसभा की
विडियो उठाकर देख लीजिए, अगर गौर से उस जनसभा में बैठे लोगों को देखने की
कोशिश करे तो मालूम चलेगा कि अधिकांश लोग आआपा के समर्थक थे, न की वे आम
लोग, जिन्होंने कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया था.

आआपा का गठन सही मायनों में कांग्रेस के उसी सदियों पुरानी “बांटों और
राज करो” नीति का नया रूप है, जहाँ पंजा अपने पाप से पीड़ित जनता के वोटो
का बटवारा कर देश पर राज करती रही है. वैसे तो दर्जनों उदाहरण गिनाए जा
सकते है, लेकिन ताज़ा उदाहरण महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(MNS) का है. शिव
सेना के उग्र हिंदुत्ववादी छवि और मराठी मानुष के नाम पर जमाए प्रभुत्व
को कम करने के लिए कांग्रेस ने मनसे की गुंडागर्दी को संरक्षण दिया.
खुलेआम उत्तर भारतीय पिटते रहे और कांग्रेस चुपचाप मुहं देखती रही.
परिणाम यह हुआ कि शहरी मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी और कांग्रेस
विरोधी वोट शिव सेना और मनसे में बंट गई और कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ
गई. मनसे और आआपा की राजनीति में कुछ खास फर्क नही है. एक खुलेआम लोगों
को पिटती है, दूसरी भारतीय लोकतंत्र में जनमत की भावनाओं को.

वैसे दिल्ली वासियों को थोड़ी देर के लिए ख़ुशी मिली है दिल्ली की सत्ता अब
ज्यादा देर तक अनाथ नही रहेगी. लेकिन भारी चिंता भी सता रही है कि
आनेवाले दिनों में दिल्ली का नाम बदलकर ड्रामा प्रदेश न कही हो जाए, जहाँ
नित्य नए नौटंकियाँ देखने को मिलेगी. लोगों को यह भी डर है कि ड्रामा
प्रदेश में ड्रामा सिखने के लिए नही, ड्रामा देखने-समझने वाला एक कोर्स
करना पड़ेगा. फिलहाल शहरी मतदाताओं के अन्दर कांग्रेसी विरोधी वोटो का
बंटवारा होता देख सोनिया दरबार में ख़ुशी की लहर है. अब वे उम्मीद लगाए
बैठे है कि कुछ ऐसा ही लोकसभा चुनावों के समय हो जाए और सेक्युलर गिरोह
बनाकर फिर से सरकार बनाने में कामयाब हो जाए.

22 Responses to ““बांटों और राज करों” की नीति और झाड़ू-पंजा प्रेम संबंध”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    आदरणीय सिंह साहब, नमस्कार।
    आप ने मुझे गलत अर्थ में लिया।
    (१) मैं जब सूर्योदय शब्दका प्रयोग करता हूँ, वह, “राष्ट्र-भारत” के सूर्योदय के अर्थवाला है।
    जिस के लिए मोदी को आज के दिनांकमें, मै, सक्षम, समर्थ, और उचित निर्णय लेनेवाला पाता हूँ।
    (२) आप के केजरीवाल की एक समय की सहकारिणी किरण बेदी भी ऐसा ही बोल रही है।
    (३)मोदी से अमरिका भी निश्चित विचलित है।
    इस लिए, फ़ोर्ड फाउण्डेशन,-सी आय ए, इत्यादि मोदी को सहायता कभी नहीं करेंगे।
    उलटा मोदी को, वीसा भी ना देकर, रोडे अटकाने के, प्रयास करेंगे।
    (४) अटलजी का पोखरण विस्फोट अमरिका भूला नहीं है।इसलिए, मोदी को सत्तासे दूर रखकर भारत को प्रबल बनने से रोकनेका पांसा फेंका जा रहा है– सुधी पाठकों समझ जाओ। यह स्वच्छ पारदर्शक सत्य है।
    (५)इस खेल का शिकार है, केजरीवाल, एक,जो एक मोहरा बन कर रह गया है। कारण सरल है।
    मोदी प्रधान मन्त्री हुआ, तो भारत विश्व की महासत्ता बनने के निकट पहुंच जाएगा।
    (६)केवल इस दृष्टि से ही, येन केन प्रकारेण -मोदी को सत्तासे दूर रखने में यह “अमरिका” कोई पत्थर उलटे बिना नहीं रहेगा। ’मॉरगन थाउ’ का यही भाष्य मुझे सही लगता है।
    (७)आप तो विचारक है, इन बातों पर सोचिए।
    और भारत की भलाई की दृष्टि से विचार कीजिए। यह अनुरोध।
    चर्चा के लिए, धन्यवाद। अन्यथा न लें। अनादर भी अभिप्रेत न माने।
    (८) भारत ऐसा अवसर न गँवाएँ। करो या मरो का अवसर है।

    Reply
  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    कुछ गड़बड़ियों के कारण मेरी कुछ टिप्पणियां दोबार आ गयी हैं. यह जान बूझ कर नहीं किया गया है. फिर भी मुझे इनके लिए खेद है.

    Reply
  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    (१) चोरों की टोली पकडने “आप” स्वयं प्रतिज्ञा कर सिपाही बन कर गये, वो उसी टोली के साथ मिल गए?
    और इतना साधारण तर्क, क्या, आप सुधी मित्रों को समझ में नहीं आता ? महदाश्चर्य?
    (२) और आम जनता का बहाना ?
    वाह! वाह!!
    (३)मुख्य मंत्री जी आपकी निर्णय शक्ति कहाँ है?

    (४)अब, दिखावे के लिए, छोटे चिल्लर भ्रष्टाचारी पकडे जाएंगे। और वाह वाही लूटी जाएगी।
    जय हो आशुतोष, भोले भण्डारी, जनता की।
    (५) किसकी चाल में फँस गए? और मानते/जानते भी नहीं।

    ===>यदि २०१४ में सूर्योदय नहीं हुआ तो उसका कारण आ. आ. पा. होगी।
    (६) “निर्णय क्या, = ’लग जाए तो तीर था, नहीं तो तुक्का’ ==ऐसे लिया जाता है?
    धन्यवाद।

    Reply
    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      डाक्टर साहब ,आपकी तड़प मेरे समझमें आती है.एक बात मैं अवश्य कहूंगा कि ऐसी भी अंध भक्ति क्या,जिसके चलते केवल अपने आराध्य के रास्ते के रूकावट दिख पड़े.
      १ और 2.पहले दो बिंदुओं के उत्तर में मैं केवल यहकहना चाहूंगा कि न आदमी पार्टी ने चोरोंको साथ लिया है और न आम जनता का बहाना किया है. आम आदमी पार्टी ने न केवल आम आदमी की इच्छाओं का सम्मान किया बल्कि हर्षवर्द्धन जैसे लोगों को जवाब दिया है कि न हम जिम्मेदारी से भाग रहे हैं और न भ्रष्टों को बख्शेंगे,वह भ्रष्ट चाहे कांग्रेस का हो या बीजेपी या आम आदमी पार्टी का ही क्यों न हो.
      ३ और ४. निर्णय शक्ति तो दिखने लगी हैऔर पकडे जायेंगे धीरे धीरे नीचे से ऊपर तक सभी.अभी तो शुरुआत है.आगे आगे देखते जाइये.
      ५.कौन सा जाल और कौन सा सूर्योदय? नमो भी उसी व्यवस्था के एक अंग हैं,जिसके परिवर्तन के लिए आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है. जिस नमो ने गुजरात में लोकायुक्त को नपुंसक बना दिया और दागियों को अपने मंत्री मंडल में शामिल कर लिया,उससे व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद रखना रेत से तेल निकालने जैसा है.
      ६. निर्णय लेने की शुरुआत तो हो चुकी है और उसका असर दो चार दिनों में दिखने लगेगा.
      एक अन्य बात.मैं मानता हूँ कि अभी तक नमो के लिए टिना फैकटर काम कररहा था.अब उनके लिए चुनौती देने वाला मैदान में आ चुका है.

      Reply
  4. आर. सिंह

    आर.सिंह

    एक बात जो आपने कही है कि उनके निशाने पर हमेशा बीजेपी ही क्यों रहती है,उससे यही लगता है कि आपको किसी अन्य की आलोचना दिखती ही नहीं.आम आदमी पार्टी दिल्ली में कांग्रेस को खा गयी.एक तरह से तो पार्टी ने बीजेपी का पक्ष लिया है?जितना ही मजबूत उम्मीदवार उसने शीला दीक्षित के विरुद्ध खड़ा किया था,उतना ही कमजोर उम्मीदवार उसने डाक्टर हर्षवर्द्धन के विरुद्ध खड़ा किया.आपने लिखा है,”अगर निस्वार्थ काम करने कि ही मंशा होती तो सबका साथ लेकर केवल दिल्ली के महत्वपूर्ण कार्यो के लिए एजेंडा बनाकर भी सरकार बनाई जा सकती थी” तो क्या अरविन्द केजरीवाल ने एक ही तरह का पत्र सोनिया गांधीं और राजनाथ को नहीं दिया था? क्या विश्वास प्रस्ताव के समर्थन में जो भाषण दिया था,उसमे उन्होंने किसी की ओर ईशारा किया था? उन्होंने तो मुद्दों पर सबको साथ लेकर चलने की बात कही थी.बीजेपी के गले यह क्यों नहीं पड़ा? क्यों नहीं उन्होंने उन मुद्दों पर अरविन्द केजरीवाल का साथदिया? यह चित भी मेरी पट्ट भी मेरी वाली आदत आपलोग छोड़िये. वह ज़माना लद गया जब बार बार दुहराने से झूठ भी सत्य दिखाई देने लगता था.जनता अब ज्यादा समझदार हो गयी है .दिल्ली की जनता को तो पिछले सात वर्षों से कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी का भ्रष्टाचार दिखा है,क्योंकि उसका साबका दिल्ली सरकार से ज्यादा एम्.सी.डी से पड़ता है.

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  5. शिवेंद्र मोहन सिंह

    बहुत सुंदर विश्लेषण अभिषेक जी, कुछ लोगों को सत्य को हजम करना कठिन होता है, पेट में मरोड़ उठने लगती है, नतीजा अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं, स्वघोषित सेकुलर जमात और कलयुगी हरिश्चंद्र तथा भेड़ की खाल में घुसे भेड़िये लोगों को (आम आदमी को) मुर्ख बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं की शातिर दिमाग लोग उन्हें किस तरफ ठग रहे हैं. लोक लुभावन नारे देकर अकर्मण्यता को बढ़ावा दे रहे हैं. इसे आआपा के बजाए पलटू पार्टी कहना ज्यादा उचित है: कुछ सन्दर्भ

    २०११- स्व घोषित हरिश्चंद्र ने उत्तराखंड में भाजपा शासित सरकार द्वारा पेश किये गए लोकायुक्त बिल को देख कर कहा था -“उत्तराखंड का लोकायुक्त बिल १०० फीसदी जन लोकपाल बिल से मिलता है, लेकिन उसे पास करने के लिए केंद्र की मंजूरी जरूरी है”

    इसी विषय पर चुनाव से पहले –
    २०१३ – अगर हमारी सरकार बनती है तो हम १५ दिनों में जनलोकपाल बनाएँगे.
    इसी विषय पर चुनाव के बाद –
    २०१३ – मुझे मालूम नहीं था की इसके लिए केंद्र की मंजूरी लेनी पड़ती है.

    वाह स्वनाम धन्य स्वघोषित हरिश्चंद्र जी बहुत खूब कही, आपको भी पता है जनता बेवकूफ है उसे बस लोक लुभावन वादे चाहिए, नए नारे चाहिए, उसने कहाँ आपकी पिछली बातों पर ध्यान दिया.

    => दूसरा उदहारण चुनाव नतीजे आने का बाद –
    हम ना समर्थन लेंगे ना ही देंगे (उसी शाम का स्टेटमेंट)

    कुछ और समय बाद…..नया नाटक…..

    हम जनता की राय लेंगे…..

    ७०% जनता ने हाँ कहा है (ये ७० प्रतिशत जनता कहाँ की है ?)

    जिसके खिलाफ चुनाव लड़ा उसी की गोद में…. वाह जी वाह हरिश्चंद्र जी

    => एक और ….चुनाव से पहले
    शीला दीक्षित चोर है….बिजली कम्पनियों की दलाल है… मेरे पास उसके खिलाफ ३७० पेज का सुबूत है.

    और अब सरकार बनने के बाद …..

    मेरा हर्षवर्धन जी से निवेदन है शीला जी के खिलाफ सबूत भेजें तभी कार्यवाही करूंगा.

    चोर चोर का नारा आपने दिया, फिर अगले के खिलाफ चुनाव आपने लड़ा फिर पलटा भी मार लिया.

    स्वघोषित कलयुगी हरिश्चंद्र जी बहुत खूब…….मोदी को रोकने ले लिए कांग्रेस हर हथकंडे अपना रही है और ये भी उसी की एक कड़ी है.

    सत्ता चीज है ऐसी है अच्छे अच्छे लोगों को थूक कर चाटना सिखा देती है. लोगों को और बड़े बड़े नाटक और सत्ता प्राप्ति के नए नए हथकंडे देखने के लिए तैयार रहना चाहिए.

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      आम आदमी पार्टी को न कांग्रेस से कुछ लेना देनाहै न बीजेपी या नमो से.अगर नमो के भक्त यह सोचते हैं कि पहले तो नमो के लिए टिना फ़ैकटर काम कर रहा था,. अब यह नई चुनौती कहाँ से आ गयी? तो उनका सोचना सही है.अब लक्ष्य उतना आसान नहीं है.बौखलाने से घाटा ही हो रहा है.

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  6. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    AAP
    TOOK TWO CRORES TO GIVE PARTY TICKET
    आम आदमी पार्टी ने २ करोड रुपए लिए, पार्टी ट्कट देने के लिए।
    निम्न यु ट्यूब देखें; और अपना मत बनाएं|

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      डाक्टर मधुसूदन, मैं विनम्रता पूर्वक इतना ही कहना चाहता हूँ कि आपने इस लिंक को सामने लाकर और उसको विश्वसनीय मानकर अपनी मर्यादा को ठेस पहुंचाया है. यह इंडिया न्यूज़ का खुलासा है.यह चैनल किसका है और इसकी विश्वसनीयता कितनी है,पहले इसकी जानकारी लेकर आपको यह लिंक प्रस्तुत करना था.मैं आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार चुनाव प्रक्रिया का प्रत्यक्ष दर्शी रहा हूँ और हारे हुए उम्मीदवारों को पार्टी छोड़कर जाते हुए भी देखा है.अतः इस तरह के भड़ास में मुझे कुछ नयापन नहीं दिखा.इसमें नयापन केवल इतना है कि आप जैसे लोगों ने इसपर विश्वास किया.

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  7. mahendra gupta

    अभी आप सब ज्यादाचिन्तित क्यों हो रहें है, यह तो कुछ समय में ही पता चल जायेगा कि कैसे दोनों जूतियों में खीर बांटने व खाने ले लालायित हैं,और फिर वे जुतीआं एक दूजे पर ही फेंकते नजर आयेंगे.

    Reply
    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      अच्छी बात है.मैं भी इन्तजार करूंगा.

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  8. गौतम

    जब कोई व्यक्ति किसी तरणताल के सबसे उचे बोर्ड पर से हवा में कलाबाजी करते हुए पानी में छलांग लगाने की क्षमता ना होते हुए भी महज नीचे खड़े जीवन रक्षको के उपस्थिति और आश्वासन के कारण ही ऐसा करने जा रहा हो तो कलाबाजी के दावेदार और जीवन रक्षको में कोई सम्बन्ध नहीं होता ?

    Reply
  9. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अभिषेक जी ,आपके अनर्गल बकवासों कि श्रृंखला में यह दूसरी कड़ी है.इसमे तो अपने विशेष ज्ञान का कुछ ज्यादा ही परिचय दिया है.क्या आप गठ बंधन सरकार और अल्पमत सरकार का अंतरसमझते हैं या आप इतने मूढ़ हैं कि इतना भी नहीं समझते.अगर नहीं समझते तो ला की पढ़ाई छोड़कर मूंगफली बेचने का धंधा शुरू कर दीजिये ज्यादा लाभ होगा. आपके पहले आलेख की टिपण्णी में लिख चूका हूँ कि चुनाव परिणाम से यह जाहिर है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का वोट काटा है.बीजेपी तो आम आदमी पार्टी के आने के चलते अपनी संख्या बढ़ाने में सफल हुई.इसके बावजूद जब आप यह लिखते हैं कि “फिलहाल शहरी मतदाताओं के अन्दर कांग्रेसी विरोधी वोटो का
    बंटवारा होता देख सोनिया दरबार में ख़ुशी की लहर है.” तो सच पूछिए तो मुझे आपकी बुद्धि पर तरश आता है कि जब आम आदमी पार्टी ने केवल कांग्रेसी वोटो पर कब्ज़ा किया है ,तब भी आप तोता रटंत से बाज नहीं आये.ऐसे सर्वज्ञ के लिए कौन सा विशेषण इस्तेमाल किया किया जाए?
    ऐसे कांग्रेस के उसी पार्टी को जिसने उसकी जड़ खोद दी ,बिना मांगे बाहर के सपोर्ट देने से कांग्रेस और बीजेपी दोनों फंस गए है.कांग्रेस ने तो यह पाशा इसलिए फेंका था कि अगर आम आदमी पार्टी इसको स्वीकार कर लेती है ,तो एक तो आम आदमी पार्टी के झूठे वादे का पोल खुल जाएगा और दूसरी और वह बीजेपी के बढ़ते कदम को रोक सकेगी.अगर नहीं माने तो दोनों पार्टियां अपने अपने ढंग से आम आदमी पार्टी पर जिम्मेदारी से भागने का इल्जाम लगIती.
    अब दो शब्द कसम खाने और तोड़ने की,तो जब गठ बंधन हुआ ही नहीं,तब कसम कहाँ टूटा? ऐसे कांग्रेसी नेता अब चिल्ला रहे हैं कि आम आदमी पार्टी के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम का प्रस्ताव रखना चाहिए था,पर उस हालत में आम आदमी पार्टी उनके पास फटकती भी नहीं.ऐसे आज भी आम आदमी पार्टी उनके तथाकथित सहयोग के बाद भी उनको घास नहीं डाल रही है और न डालेगी.

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    • Bharat

      सिंह साहब बिना गले मिले ही सरकार बन गयी क्या? अगर निस्वार्थ काम करने कि ही मंशा होती तो सबका साथ लेकर केवल दिल्ली के महत्वपूर्ण कार्यो के लिए एजेंडा बनाकर भी सरकार बनाई जा सकती थी परन्तु इन साहब को तो बीजेपी में ही दोष दिखाई देते है.देश के नैतिक मूल्यो के पतन के लिए वो जवाबदार है जो १९४७ से आज तक सबसे ज्यादा समय सत्ता में रहे. उन्होंने ने जैसा मूल्यो का आदर्श पेश किया प्रजा ने उन्ही आदर्शो का अनुकरण किया,इसीलिए हमारे यहाँ भारत की कहावत है “यथा राजा तथा प्रजा” कांग्रेस का साथ भले बाहरी ही इनको क्यों पसंद आया.आपको लगता है कि मूल्यो में अवपतन सिर्फ वाजपेयीजी कि छह साल कि मिली जुली सरकार कि वजह से हुआ. ये लोग कांग्रेस और बीजेपी को भाई भाई कहते क्यों नहीं थकते है ? और उनके प्रथम निशाने पर हमेशा बीजेपी ही क्यों रहती है?इसका क्या अर्थ निकाला जाये? मतलब साफ है विचारधारा एक ही है. बाकि सब दिखावा है. इसलिए कहा गया है कि जिसकी जैसी प्रकृति होगी वो वैसी ही प्रकृति के लोगो के साथ रहना पसंद करते है. निश्वार्थ व्यक्तियो को दिखावे एवं टोपी जैसे बाहरी आवरण कि जरुरत नहीं होती. शराबी को मित्र खोजने नहीं पड़ते,उसे सहज रुप से शराबी मित्र मिल जाते है. एक ही प्रकृति के लोग सहज रुप से मित्र बन जाते है.दोनो ही सामान्य आदमी के नाम पर ढोंग करते हैं, दोनो ही टोपी पहनकर दिखावा करते हैं.

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      • आर. सिंह

        आर.सिंह

        भारत जी,आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का पूरी तरह सफाया कर दिया,फिर भी आपको अगर वह कांग्रेस की सहयोगी पार्टी दिखाई पड़ रही है ,तो इस बीमारी का कोई इलाज नहीं.अरविन्द केजरीवाल ने अपने मुद्दे पर सहयोग के लिए दोनों पार्टियों को पत्र लिखा था. डाक्टर हर्षवर्धन ने विश्वास के विरोध में न जाने क्या क्या कहा,फिर भी अरविन्द केजरीवाल ने अपने समापन भाषण में जो कहा ,वह अब इतिहास बन चुका है,क्योंकि वैसा संतुलित भाषण लोगों ने शायद वर्षों से नहीं सुना था.फिर भी बीजेपी ने प्रस्ताव का विरोध किया.अगर कांग्रेस ने समर्थन किया तो यह उसकी विचार धारा है.आम आदमी पार्टी को इससे कोई लेना देना नहीं.कांग्रेस के साथ न कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम है और न शासन में कांग्रेस से कोई समझौता.अगर आम आदमी पार्टी फिर भी सरकार नहीं बनाती तो सबसे पहले बीजेपी जिम्मेदारी से भागने का दोषारोपण करती. यह चित भी मेरी पट्ट भी मेरी वाली नीति कब तक चलेगी?

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      • शिवेंद्र मोहन सिंह

        भारत जी बिलकुल दुरुस्त फरमा रहे हैं आप, इसमें कोई दो राय नहीं कि एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं. अगर इनके चुनाव पूर्व के भाषणो पर गौर किया जाए तो ये बात बिलकुल सही सिद्ध होती है.

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      • आर. सिंह

        आर.सिंह

        डर रहे हैं दूसरी पार्टी वाले.रूह कांपने लगी है उन लोगों की आम आदमीं पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर. सभी समीकरण बिगड़ते हुए नजर आ रहे है. अतः तरह तरह के इल्जाम लगाये जा रहे हैं. जुम्मा जुम्मा आठ दिन हुए हैं आम आदमी पार्टी द्वारा सत्ता सम्भाले हुए.क्या चाहते हैं आपलोग उससे ? यह कसम तोड़ दी ,वह कसम तोड़ दी.कहाँ बनी है गठ बंधन सरकार ,जिसके लिए अरविन्द केजरीवाल ने कसम खाया था?कहाँ है सरकार में साझा ? कहाँ है न्यूनतम साझा कार्यक्रम? क्या आपलोग सचमुच इतने मूढ़ है कि गठ बंधन सरकार और अल्पमत सरकार का अंतर नहीं समझते या जानबूझ कर यह माया जाल फैला रहे हैं?अरे भाई एक दिन कहते हो कि जब बिना शर्त समर्थन मिल रहा है तो जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हो,दूसरे दिन कहते हो कि भ्रष्टों की गोद में सर छुपा लिया. आखिर आपलोग चाहते क्या हैं?आम आदमी पार्टी जनता को धोखा दे दे? आपलोगों के कहने पर पार्टी तोड़ दे? या आपलोगों के नेता को अपना नेता मान ले? अब आम आदमी पार्टी की चुनौती देश के स्थापित और भ्रष्ट पार्टियों पर भारी पड़ रही है. पर आम आदमी के सामने आशा की एक किरण तो है
        एक बात जो आपने कही है कि उनके निशाने पर हमेशा बीजेपी ही क्यों रहती है,उससे यही लगता है कि आपको किसी अन्य की आलोचना दिखती ही नहीं.आम आदमी पार्टी दिल्ली में कांग्रेस को खा गयी.एक तरह से तो पार्टी ने बीजेपी का पक्ष लिया है?जितना ही मजबूत उम्मीदवार उसने शीला दीक्षित के विरुद्ध खड़ा किया था,उतना ही कमजोर उम्मीदवार उसने डाक्टर हर्षवर्द्धन के विरुद्ध खड़ा किया.आपने लिखा है,”अगर निस्वार्थ काम करने कि ही मंशा होती तो सबका साथ लेकर केवल दिल्ली के महत्वपूर्ण कार्यो के लिए एजेंडा बनाकर भी सरकार बनाई जा सकती थी” तो क्या अरविन्द केजरीवाल ने एक ही तरह का पत्र सोनिया गांधीं और राजनाथ को नहीं दिया था? क्या विश्वास प्रस्ताव के समर्थन में जो भाषण दिया था,उसमे उन्होंने किसी की ओर ईशारा किया था? उन्होंने तो मुद्दों पर सबको साथ लेकर चलने की बात कही थी.बीजेपी के गले यह क्यों नहीं पड़ा? क्यों नहीं उन्होंने उन मुद्दों पर अरविन्द केजरीवाल का साथदिया? यह चित भी मेरी पट्ट भी मेरी वाली आदत आपलोग छोड़िये. वह ज़माना लद गया जब बार बार दुहराने से झूठ भी सत्य दिखाई देने लगता था.जनता अब ज्यादा समझदार हो गयी है .दिल्ली की जनता को तो पिछले सात वर्षों से कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी का भ्रष्टाचार दिखा है,क्योंकि उसका साबका दिल्ली सरकार से ज्यादा एम्.सी.डी से पड़ता है.

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      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ.मधुसूदन

        (१) चोरों की टोली पकडने “आप” स्वयं प्रतिज्ञा कर सिपाही बन कर गये, वो उसी टोली के साथ मिल गए?
        और इतना साधारण तर्क, क्या, आप सुधी मित्रों को समझ में नहीं आता ? महदाश्चर्य?
        (२) और आम जनता का बहाना ?
        वाह! वाह!!
        (३)मुख्य मंत्री जी आपकी निर्णय शक्ति कहाँ है?

        (४)अब, दिखावे के लिए, छोटे चिल्लर भ्रष्टाचारी पकडे जाएंगे। और वाह वाही लूटी जाएगी।
        जय हो आशुतोष, भोले भण्डारी, जनता की।
        (५) किसकी चाल में फँस गए? और मानते/जानते भी नहीं।

        ===>यदि २०१४ में सूर्योदय नहीं हुआ तो उसका कारण आ. आ. पा. होगी।
        (६) “निर्णय क्या, = ’लग जाए तो तीर था, नहीं तो तुक्का’ ==ऐसे लिया जाता है?

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        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          डाक्टर साहब ,आपकी तड़प मेरे समझमें आती है.एक बात मैं अवश्य कहूंगा कि ऐसी भी अंध भक्ति क्या,जिसके चलते केवल अपने आराध्य के रास्ते के रूकावट दिख पड़े.
          १ और 2.पहले दो बिंदुओं के उत्तर में मैं केवल यहकहना चाहूंगा कि न आदमी पार्टी ने चोरों को साथ लिया है और न आम जनता का बहाना किया है. आम आदमी पार्टी ने न केवल आम आदमी की इच्छाओं का सम्मान किया बल्कि हर्षवर्द्धन जैसे लोगों को जवाब दिया है कि न हम जिम्मेदारी से भाग रहे हैं और न भ्रष्टों को बख्शेंगे,वह भ्रष्ट चाहे कांग्रेस का हो या बीजेपी या आम आदमी पार्टी का ही क्यों न हो.
          ३ और ४. निर्णय शक्ति तो दिखने लगी हैऔर पकडे जायेंगे धीरे धीरे नीचे से ऊपर तक सभी.अभी तो शुरुआत है.आगे आगे देखते जाइये.
          ५.कौन सा जाल और कौन सा सूर्योदय? नमो भी उसी व्यवस्था के एक अंग हैं,जिसके परिवर्तन के लिए आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है. जिस नमो ने गुजरात में लोकायुक्त को नपुंसक बना दिया और दागियों को अपने मंत्री मंडल में शामिल कर लिया,उससे व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद रखना रेत से तेल निकालने जैसा है.
          ६. निर्णय लेने की शुरुआत तो हो चुकी है और उसका असर दो चार दिनों में दिखने लगेगा.
          एक अन्य बात.मैं मानता हूँ कि अभी तक नमो के लिए टिना फैकटर काम कररहा था.अब उनके लिए चुनौती देने वाला मैदान में आ चुका है.

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        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          डाक्टर साहब ,आपके उपरोक्त टिपण्णी के उत्तर में मैंने निम्नलिखित टिपण्णी भेजी थी,पर पता नहीं अभी तक वह टिपण्णी प्रकाशित क्यों नहीं हुई?
          “डाक्टर साहब ,आपकी तड़प मेरे समझमें आती है.एक बात मैं अवश्य कहूंगा कि ऐसी भी अंध भक्ति क्या,जिसके चलते केवल अपने आराध्य के रास्ते के रूकावट दिख पड़े.
          १ और 2.पहले दो बिंदुओं के उत्तर में मैं केवल यहकहना चाहूंगा कि न आदमी पार्टी ने चोरोंको साथ लिया है और न आम जनता का बहाना किया है. आम आदमी पार्टी ने न केवल आम आदमी की इच्छाओं का सम्मान किया बल्कि हर्षवर्द्धन जैसे लोगों को जवाब दिया है कि न हम जिम्मेदारी से भाग रहे हैं और न भ्रष्टों को बख्शेंगे,वह भ्रष्ट चाहे कांग्रेस का हो या बीजेपी या आम आदमी पार्टी का ही क्यों न हो.
          ३ और ४. निर्णय शक्ति तो दिखने लगी हैऔर पकडे जायेंगे धीरे धीरे नीचे से ऊपर तक सभी.अभी तो शुरुआत है.आगे आगे देखते जाइये.
          ५.कौन सा जाल और कौन सा सूर्योदय? नमो भी उसी व्यवस्था के एक अंग हैं,जिसके परिवर्तन के लिए आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है. जिस नमो ने गुजरात में लोकायुक्त को नपुंसक बना दिया और दागियों को अपने मंत्री मंडल में शामिल कर लिया,उससे व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद रखना रेत से तेल निकालने जैसा है.
          ६. निर्णय लेने की शुरुआत तो हो चुकी है और उसका असर दो चार दिनों में दिखने लगेगा.
          एक अन्य बात.मैं मानता हूँ कि अभी तक नमो के लिए टिना फैकटर काम कररहा था.अब उनके लिए चुनौती देने वाला मैदान में आ चुका है.”

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          • डॉ. मधुसूदन

            डॉ.मधुसूदन

            आदरणीय सिंह साहब, नमस्कार।
            आप ने मुझे गलत अर्थ में लिया।
            (१) मैं जब सूर्योदय शब्दका प्रयोग करता हूँ, वह, “राष्ट्र-भारत” के सूर्योदय के अर्थवाला है।
            जिस के लिए मोदी को आज के दिनांकमें, मै, सक्षम, समर्थ, और उचित निर्णय लेनेवाला पाता हूँ।
            (२) आप के केजरीवाल की एक समय की सहकारिणी किरण बेदी भी ऐसा ही बोल रही है।
            (३)मोदी से अमरिका भी निश्चित विचलित है।
            इस लिए, फ़ोर्ड फाउण्डेशन,-सी आय ए, इत्यादि मोदी को सहायता कभी नहीं करेंगे।
            उलटा मोदी को, वीसा भी ना देकर, रोडे अटकाने के, प्रयास करेंगे।
            (४) अटलजी का पोखरण विस्फोट अमरिका भूला नहीं है।इसलिए, मोदी को सत्तासे दूर रखकर भारत को प्रबल बनने से रोकनेका पांसा फेंका जा रहा है– सुधी पाठकों समझ जाओ। यह स्वच्छ पारदर्शक सत्य है।
            (५)इस खेल का शिकार है, केजरीवाल, एक,जो एक मोहरा बन कर रह गया है। कारण सरल है।
            मोदी प्रधान मन्त्री हुआ, तो भारत विश्व की महासत्ता बनने के निकट पहुंच जाएगा।
            (६)केवल इस दृष्टि से ही, येन केन प्रकारेण -मोदी को सत्तासे दूर रखने में यह “अमरिका” कोई पत्थर उलटे बिना नहीं रहेगा। ’मॉरगन थाउ’ का यही भाष्य मुझे सही लगता है।
            (७)आप तो विचारक है, इन बातों पर सोचिए।
            और भारत की भलाई की दृष्टि से विचार कीजिए। यह अनुरोध।
            चर्चा के लिए, धन्यवाद। अन्यथा न लें। अनादर भी अभिप्रेत न माने।
            (८) भारत ऐसा अवसर न गँवाएँ। करो या मरो का अवसर है।

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