काजल कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों के लिए कभी अपना पक्का मकान होना किसी सपने से कम नहीं था। खेतों में दिन-रात मेहनत करने वाले गरीब परिवारों के लिए यह सपना अक्सर कई पीढ़ियों तक अधूरा रह जाता है। इसी सपने को पूरा करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) शुरू की, ताकि कच्चे या जर्जर घरों में रहने वाले परिवारों को पक्का आवास मिल सके। फिर भी देश के कई गांवों में ऐसे लोग आज भी हैं जिनके लिए यह सपना अभी तक अधूरा है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी ब्लॉक स्थित सितुआरा गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां बहुत से परिवार आज भी एक पक्के घर की उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं।
इस गांव में लगभग 400 से अधिक घर हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी अधिक है। गांव के अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी, खेतिहर काम या छोटे-मोटे श्रम से अपना जीवन चलाते हैं। रोज कमाने और खाने वाले इन परिवारों के लिए पक्का घर बनाना आसान नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना ही उनके लिए एक उम्मीद बनकर सामने आई है, क्योंकि इसी के सहारे उन्हें लगता है कि एक दिन उनका भी अपना सुरक्षित घर होगा। लेकिन उनकी यही उम्मीद अभी तक पूरी नहीं हो रही है।
गांव की 55 वर्षीय शीला देवी इसका एक उदाहरण हैं। लगभग दस वर्ष पहले उन्हें आवास योजना के तहत पहली किश्त मिली थी। उस समय उनके परिवार में यह खबर किसी त्योहार से कम नहीं थी। उन्होंने उम्मीद के साथ घर की नींव डलवाई और दीवारें खड़ी करानी शुरू की, लेकिन इसके बाद आगे की किस्त उन्हें नहीं मिल सकी। धीरे-धीरे समय बीतता गया और उनका घर आधा बनकर ही रह गया। इसी गांव की 30 वर्षीय माला देवी की कहानी भी अलग नहीं है। उन्होंने चार वर्ष पहले प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए आवेदन किया था। उस समय उन्हें विश्वास था कि कुछ समय बाद उन्हें भी इस योजना का लाभ मिलेगा और उनका परिवार कच्चे घर से निकलकर एक पक्के घर में रहने लगेगा। लेकिन कई वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें अभी तक इस योजना का लाभ नहीं मिल सका है।
गांव की एक अन्य महिला, जिन्होंने अपना नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बात की, बताती हैं कि उन्हें योजना के तहत 1 लाख 20 हजार रुपये की सहायता मिली थी। लेकिन इस राशि में से करीब 20 हजार रुपये उन्हें घूस के रूप में देने पड़े, जिसके बाद उन्होंने आगे की किश्त लेने से ही मना कर दिया। उनका कहना है कि उन्होंने जितना पैसा मिला था उसी से किसी तरह घर की दीवारें खड़ी कराईं, लेकिन पूरा घर बन पाना संभव नहीं हो सका। गांव के कई परिवार आज भी मिट्टी या फूस के घरों में रहते हैं। बरसात में दीवारों के गिरने और छत के टपकने का डर हमेशा बना रहता है। खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए यह स्थिति और कठिन हो जाती है, क्योंकि घर ही वह जगह है जहां उन्हें सबसे अधिक सुरक्षा और आराम मिलना चाहिए।
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) की शुरुआत साल 2016 को “सबके लिए आवास” के लक्ष्य के साथ की गई थी। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बेघर परिवारों या कच्चे और जर्जर घरों में रहने वाले लोगों को मूलभूत सुविधाओं के साथ पक्का घर उपलब्ध कराना है। योजना के तहत सामान्य क्षेत्रों में एक घर के निर्माण के लिए लगभग 1.20 लाख रुपये की सहायता दी जाती है, जबकि पहाड़ी और कठिन क्षेत्रों में यह राशि 1.30 लाख रुपये तक होती है। लाभार्थियों का चयन सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना, ग्राम सभा की स्वीकृति और तकनीकी सत्यापन की प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है, तथा राशि सीधा लाभार्थियों के बैंक खाते में किश्तों के रूप में भेजी जाती है।
राष्ट्रीय स्तर पर इस योजना का दायरा काफी व्यापक है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश भर में इस योजना के तहत लगभग 3.86 करोड़ घरों को स्वीकृति दी जा चुकी थी, जिनमें से करीब 2.92 करोड़ घरों का निर्माण पूरा हो चुका है। सरकार ने 2024 से 2029 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त दो करोड़ घर बनाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है ताकि ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित और स्थायी आवास उपलब्ध कराया जा सके। बिहार भी उन राज्यों में शामिल है जहां इस योजना का बड़ा दायरा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में योजना शुरू होने के बाद से बिहार में लगभग 39 लाख से अधिक घरों को स्वीकृति दी जा चुकी है और इनमें से करीब 36 लाख से अधिक घरों का निर्माण पूरा हो चुका है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि राज्य में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों को पक्का घर मिला है और लाखों लोगों के जीवन में स्थायित्व आया है।
मुजफ्फरपुर जिला भी इस योजना के दायरे में आने वाले प्रमुख जिलों में है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में हजारों परिवारों को आवास योजना के तहत घर स्वीकृत किए गए हैं। विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार मुजफ्फरपुर में हजारों घरों को मंजूरी मिली है और कई घरों का निर्माण पूरा हो चुका है, जिससे बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों को पक्का आवास मिला है। इन सबके बीच प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण भारत में गरीब परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आई है। यह योजना केवल घर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ स्वच्छ शौचालय, बिजली, पानी और स्वच्छ ऊर्जा जैसी सुविधाओं को भी जोड़ने की कोशिश की गई है ताकि ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सके। सरकार ने इस योजना को आगे बढ़ाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में आवास निर्माण को प्राथमिकता देने की बात भी कही है।
केंद्रीय बजट 2026–27 में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के लिए लगभग 54,917 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। यह आवंटन ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के मकानों के निर्माण और बुनियादी सुविधाओं के साथ ग्रामीण आवास को बढ़ावा देने के लिए किया गया है, जो ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा है। जो गांव के विकास के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लेकिन सितुआरा गांव के कई परिवार आज भी उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब इस योजना के माध्यम से उनके पक्के घरों का सपना पूरा होगा।