विश्ववार्ता

कभी पर्शिया कहलाने वाला देश ईरान कैसे बना !


 रामस्वरूप रावतसरे


 ईरान एक बार फिर से दुनियाभर में चर्चा में है, जिसके पीछे की वजह से इजरायल-अमेरिका के साथ चल रही इसकी जंग है। राजधानी तेहरान समेत देश के कई प्रमुख शहरों में बमबारी हुई है, जिसमें सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह अली खामेनेई की भी मौत हो गई है। इस युद्ध में अभी तक सैकड़ों लोगों के मारे जाने का समाचार है। यह युद्ध कितना लम्बा चलेगा और इसमें कितने जानमाल का नुकसान होगा कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन जो हालात बने है, उसे लेकर पूरा विश्व सहम सा गया है।
  जानकारों के अनुसार ईरान का इतिहास काफी दिलचस्प है। यहां कई हजार सालों से अलग-अलग राजवंशों का राज रहा है, जिन्होंने यहां वर्चस्व के लिए खूब सारी जंगें लड़ी हैं। सबसे ज्यादा दिलचस्प इतिहास तो इस देश के नाम से जुड़ा हुआ है। कभी ईरान को पर्शिया के तौर पर जाना जाता था, फिर 20वीं सदी में इसका नाम बदल दिया गया। ईरान के इतिहास की शुरुआत इसके दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से से होती है, जहां आज से करीब 5000 साल पहले 3000 ईसा पूर्व में एलामाइट्स ने एक राज्य की स्थापना की। इसके बाद 2000 ईसा पूर्व के अंत तक ’’मीड्स’’ और ’’पर्शियन’’ नामक इंडो-यूरोपीय जनजातियों ने मॉडर्न ईरान की असली नींव रखी। सैकड़ों सालों तक ईरान के बड़े हिस्से पर अलग-अलग जनजातियों का राज रहा। इतिहास के अनुसार फिर 550-330 ई.पू. के बीच हखामनी साम्राज्य का आगमन हुआ है, जिसने पहले फारसी साम्राज्य की नींव रखी। इसे अचमेनिद साम्राज्य के तौर पर जाना जाता है।
हखामनी साम्राज्य के ’’साइरस द ग्रेट’’ (कुरुश महान) ने अपने साम्राज्य को उस वक्त में दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य का रूप दे दिया था। इसका अंदाजा कुछ यूं लगाया जा सकता है कि हखामनी साम्राज्य की सीमाएं भारत से लेकर ग्रीस तक फैली हुई थीं। इसकी सरहदें मिस्र से जाकर भी लगती थीं। बताया जाता है कि इसी दौर में यहां पर ग्रीक लेखकों का आना शुरू हुआ, जो यहां की संस्कृति को समझना चाहते थे। उन्होंने ही पहली बार अपनी किताबों में इस इलाके को पर्शिया कहना शुरू किया। इस तरह इन लेखकों के लौटने के साथ ही पश्चिमी मुल्कों में ये इलाका पर्शिया के तौर पर प्रसिद्ध हो गया।
   इतिहास के अनुसार  सिकंदर महान की जीत के बाद इस इलाके में सेल्युकॉड साम्राज्य का भी राज रहा। फिर सासानियन साम्राज्य आया है, जिसने ईरानी संस्कृति और पहचान को जिंदा किया। ये वही दौर था, जब ’’जरथुस्त्रवाद’’ को राजधर्म बनाया गया। इसके बाद अरबों को 7वीं शताब्दी में इस इलाके में जीत मिली और इस्लाम यहां आया। उसने ’’जरथुस्त्रवाद’’ की जगह ले ली। अरबी का इस्तेमाल बढ़ गया। फिर भी लोग फारसी भाषा और संस्कृति से जुड़े हुए थे। फिर यहां सफवी राजवंश का दौर आया, जिसने शिया इस्लाम को राजधर्म बना दिया। इसके बाद काजर राजवंश और अंत में 20वीं सदी में पहलवी राजवंश सत्ता में आया।
     ईरान के बड़े भू-भाग पर राज करने वाले राजाओं के दौर में ये इलाका पर्शिया ही कहलाता रहा, इसकी वजह ग्रीक लेखकों की किताबें थीं। यहां रहने वाले लोग पर्शियन कहलाते थे। ग्रीक लेखकों ने ये नाम इसलिए दिया था, क्योंकि यहां पार्स नाम का एक इलाका था, जो हखामनी साम्राज्य का केंद्र था। ग्रीक लोगों ने इसी आधार पर अपनी किताब में इस पूरे इलाके को पर्शिया कहा था। हालांकि, फिर 91 साल पहले 1935 में इस देश का इतिहास ही बदल गया, जब इसका नाम पर्शिया से ईरान कर दिया गया।
     जानकारों के अनुसार यहां की बड़ी आबादी अपने देश को ईरान ही कहते आई थी। ईरान शब्द प्राचीन फारसी शब्द ’’आर्यानाम’’ से आया है, जिसका मतलब होता है, ’’आर्यों की भूमि’’। ’’आर्य’’ शब्द का इस्तेमाल इंडो-ईरानी लोग अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के लिए करते थे। 1935 में पहलवी वंश के संस्थापक रजा शाह पहलवी ने तुर्की के कमाल अतार्तुक के पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण से प्रभावित होकर अपने देश का नाम बदलकर पर्शिया से ईरान कर दिया। रजा शाह का मानना था कि नाम बदलने से उनके देश में रहने वाले अलग-अलग जनजातियों के लोग एक झंडे के नीचे आ जाएंगे।
    सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह औपनिवेशिक प्रभाव से आजादी चाहते थे, क्योंकि उनका मानना था कि ये नाम तो पश्चिमी मुल्कों से मिला है। साथ ही रजा शाह का मकसद दुनिया को एक नया, आधुनिक और प्रगतिशील ईरान से परिचय करवाना था। यहां गौर करने वाली बात ये है कि पर्शिया तो सिर्फ यहां के एक प्रांत का नाम था, जबकि ईरान पूरे देश का नाम था। रजा शाह ने ईरान को देश का आधिकारिक नाम बनाने के लिए 1935 में सभी विदेशी दूतावासों को चिट्ठी लिखी। इसमें उनसे कहा गया कि वे अब पर्शिया की जगह ईरान शब्द का इस्तेमाल करें। ईरान आज बारूद के आगोश में खड़ा है और वहां की आवाम सुकून के लिए कल का इंतजार कर रही है।