poetry

कल भी मरी थी कल भी मरेगी

आखिर वो कितनी बार जलेगी ।

पहले तो तन को भेड़िया बन नोच डाला

शरीर से आत्मा तक जगह-जगह छेद डाला ।

लाश बच रही थी न जीएगी और न मरेगी

आखिर वो कितनी बार जलेगी ।।

घर से बाहर तक हर की याद दिलाता है

दर्द बांटना तो दूर दर्द को खरोंच-खरोंच नासूर बनाता है ।

क्या घर में भी वो इसी तरह लुटेगी ।

आखिर वो कितनी बार जलेगी ।

उसकी आंखों में सहमे आंसुओं के कतरे

टूट–टूटकर गिरते एक–एक कर सपने ।

कब तक ये मानसिक रोगियों की शिकार बनेगी ।

आखिर वो कितनी बार जलेगी ।।

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