मनुष्य को सत्य धर्म का अनुसंधान कर उसी का पालन करना चाहिये

               हमें मनुष्य का जन्म क्यों प्राप्त हुआ है? इसके पीछे कौन सी अदृश्य सत्ता शक्ति है जिसने निश्चित किया कि हमारी आत्मा को मनुष्य जन्म मिले? इसका उत्तर वैदिक साहित्य को पढ़ने से मिलता है। मनुष्य को मनुष्य जन्म उसकी आत्मा के पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर मिलता है। इन कर्मों को जीवात्मा का प्रारब्ध कहते हैं। हमने पूर्वजन्म में जिन कर्मों को किया परन्तु जिनका यथावत् भोग हम पूर्वजन्म में वृद्धावस्था मृत्यु आदि कारणों से नहीं कर सके थे, उन कर्मों के भोग के लिये सृष्टि के विधाता ने हमारी आत्मा को उसके पाप पुण्य की गणना के आधार पर हमें वर्तमान का मनुष्य जन्म तो दिया ही है अपितु उसी के आधार पर कर्मों के अनुरूप हमारे माता-पिता परिवेश आदि का चयन भी परमात्मा ने किया। यदि इस सिद्धान्त को नहीं मानते तो हमें संसार में अलग अलग परिवेश में जन्म लेने वाले मनुष्यों तथा अन्य प्राणी योनियों में जन्म लेने वाली आत्माओं में अन्तर को जानना सम्भव नहीं होगा। कर्मफल सिद्धान्त तथा आत्मा का जन्म एक विवेकपूर्ण एवं तर्कसंगत सिद्धान्त है।

               ईश्वरीय ज्ञान वेदों के अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, कर्मफलप्रदाता, जीवों को उनके पाप-पुण्यों के अनुसार जन्म सुख-दुःख प्रदाता, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वव्यापक, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। वही संसार के सब मनुष्यों का वरण करने योग्य, ध्यान करने योग्य तथा उपासनीय है। मनुष्य योनि में हम अपने पूर्वजन्म के कर्मों का सुख दुःख रूपी फल भोगने आये हैं और हमें इस जन्म में कर्मों को करने की स्वतन्त्रता है। हम इस जन्म में जो भी शुभ व अशुभ अथवा पाप व पुण्य कर्म करेंगे उसी के आधार पर हमें कुछ इस जन्म में व शेष आगामी जन्मों में सुख व दुःख रूपी फल प्राप्त होंगे। नास्तिक लोग ईश्वर व कर्मफल सिद्धान्त को नहीं मानते परन्तु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि यह संसार कैसे बना? इस संसार को किसने बनाया? किस वस्तु से बनाया? यदि बनाया तो वह चेतन व सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है और यदि उसने नहीं बनाया तो अपने आप तो आटे की एक साधारण रोटी भी बन नहीं सकती भले ही रोटी बनने-बनाने के सभी पदार्थ व आवश्यक उपकरण एक स्थान पर रख दिये जायें। इस आधार पर यह सिद्ध होता है कि इतनी विशाल सृष्टि स्वयं अपने आप बिना किसी चेतन व बुद्धि से युक्त सर्वशक्तिमान व अपौरुषेय सत्ता के कदापि नहीं बन सकती। संसार में दो प्रकार के नास्तिक हैं। एक असम्भव को सम्भव मानने वाले और दूसरे सम्भव को अविवेकपूर्ण रीति से विश्वास करने वाले। कुछ मनुष्य व मत ईश्वर को तो मानते हैं परन्तु उन्होंने ईश्वर का एक काल्पनिक स्वरूप बना रखा है जैसा कि ईश्वर का स्वरूप है ही नहीं। ऐसे बन्धु नास्तिक व अर्ध नास्तिक कहे जा सकते हैं। ईश्वर का सत्य स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभावों का ज्ञान चार वेद एवं ऋषियों के बनाये आर्ष साहित्य उपनिषद एवं दर्शन आदि ग्रन्थों से होता हैं जो पूर्णतया वेदानुकूल बुद्धियुक्त सत्य सिद्धान्तों के अनुरूप हैं। यह इस सिद्धान्त के अन्तर्गत आता है कि वेद स्वतः प्रमाण हैं और अन्य वैदिक साहित्य एवं इतर ग्रन्थ परतः प्रमाण हैं यदि वह वेदानुकूल हों।

               परमात्मा ने हमारा जो शरीर बनाया है उसमें अनेक विशेषतायें हैं। यदि हम मनुष्यों की पशुओं के शरीरों से तुलना करें तो हम मुख्य रूप से दो भेद पाते हैं। प्रथम यह है कि सभी मनुष्यों के पास सत्य असत्य, ज्ञान अज्ञान, उचित अनुचित, कर्तव्य अकर्तव्य का भेद करने वाली बुद्धि होती है। दूसरा भेद यह है कि परमात्मा ने हमें कर्म करने के लिये दो हाथ दिये हैं। हम सीधे खड़े हो सकते हैं। पथ पर चल सकते दौड़ सकते हैं। हाथों से हम लिख सकते हैं, अनेक प्रकार के निमार्ण के कार्य कर सकते हैं। हार्थों से भोजन पका सकते हैं, अनेक प्रकार की आवश्यकता की वस्तुओं का निर्माण कर सकते हैं। हमारी सभी सहायक वस्तुयें यथा भोजन सामग्री, कागज, पेन, पेंसिल, भवन, वस्त्र, पुस्तकें, वाहन, मशीनें आदि सभी बुद्धि का प्रयोग कर हार्थों से निर्मित की गई हैं। मनुष्य को जो यह सुविधायें प्राप्त हैं वह अन्य प्राणियों को प्राप्त नहीं हैं। इतर प्राणी अपनी रक्षा एवं जीवन के लिये मनुष्यों की दया व सहायता पर प्रायः निर्भर करते हैं। इसी आधार पर यह सिद्धान्त पुष्ट होता है कि मनुष्य योनि उभय योनि अर्थात् कर्म व भोग योनि दोनों है जब कि इतर प्राणी योनियां केवल भोग योनियां हैं। परमात्मा ने वेदों का ज्ञान मनुष्यों के उपयोग के लिये ही दिया है। वेदों की सहायता से मनुष्य अपने कर्तव्य व धर्म का चिन्तन व निश्चय कर सकते हैं। वेदों का अध्ययन करने पर यह रहस्य भी विदित होता है कि धर्म किसी पदार्थ के उन गुणों को कहते हैं जो उसमें सदैव विद्यमान रहते हैं। उन स्वाभाविक गुणों के विपरीत गुण उन पदार्थों में प्रविष्ट नहीं हो पाते और वह सदैव उन्हीं गुणों से युक्त रहते हैं। अग्नि का उदाहरण लें तो इसमें रूप व दाह शक्ति शाश्वत गुण है। वायु में स्पर्श व प्राण शक्ति होती है। शब्द आकाश का गुण है। रसना में रस का ज्ञान करने की शक्ति होती है। वाणी व शब्द को मनुष्य की जिह्वा से उच्चारण कर बोला जाता है। शब्द आकाश का गुण होता है। पृथिवी का गुण गन्ध बताया जाता है। पृथिवी पर वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं। पुष्प तथा अनेक प्रकार की ओषधियां उत्पन्न होती हैं। इनमें गन्ध पृथिवी के गुण से उत्पन्न होती हैं। यह इन पदार्थों के शाश्वत गुण हैं। यही इन पदार्थों के धर्म भी कहलाते हैं क्योंकि यह सदा विद्यमान रहते हैं, इनसे कभी छूटते नहीं है।

               मनुष्य जन्म लेने वाले प्राणियों में भी कुछ अनिवार्य गुणों की अपेक्षा की जाती है। मनुष्यों में यह गुणों सत्य का पालन तथा ईश्वर को जानना उसकी निर्दोष वैदिक विधि से उपासना करनी ही सिद्ध होती है। उसे मातृ-पितृ भक्त होना चाहिये, विद्वानों, आचार्यों अतिथियों का सम्मान सेवा करनी चाहिये तथा सभी प्राणियों के प्रति दया करूणा का भाव रखना चाहिये। यह गुण ही मनुष्य का धर्म कहलाते हैं। इससे इतर जितने मत, पन्थ व सम्प्रदाय आदि हैं वह धर्म न होकर मात्र मत व सम्प्रदाय हैं जिसमें अविद्या, अज्ञान, अहितकारी नियम व मान्यतायें विद्यमान हैं। इन मतों का वेदानुकूल भाग ही धर्म होता है, शेष अधर्म व अज्ञान से युक्त बातें होती हैं जो सबके लिये त्याज्य होती हैं। उन अविद्यायुक्त बातों का आचरण स्वयं व दूसरों के लिये हानिकारक होता है। इस रहस्य व तथ्य को जो समझता है वही धार्मिक होता है, सत्य व असत्य को मानने वाले सभी धार्मिक नहीं होते। अतः संसार में धर्म एक ही है और वह ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना है। ईश्वर की आज्ञायें वेदों में निहित हैं। इसलिये धर्म पालन के लिये वेदों का अध्ययन करना उनके अनुरूप आचरण करना ही धर्म सिद्ध होता है। आश्चर्य इस बात का है कि आज का संसार इस बात को स्वीकार नहीं करता जिसका कारण उसका अज्ञान, अहंकार, स्वार्थ, मिथ्या अभिमान, अपने व पराये का भेदभाव, अविद्या, हठ व दुराग्रह आदि हैं। ऋषि दयानन्द जी ने वेदों का पूर्ण ज्ञान अर्जित कर धर्म विषयक इन रहस्यों को अपने उपदेशों तथा सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा वेदभाष्य आदि ग्रन्थों के द्वारा समझाया था। मनुष्य ने अपनी दुर्बलताओं, हठ व अविद्या आदि दोषों के कारण इन अमृत के समान सुझावों को स्वीकार नहीं किया जिससे संसार में सर्वत्र दुःख, क्लेष, उत्पीड़न, अन्याय व अत्याचार होते हुए दिखाई देते हैं।

               परमात्मा ने मनुष्य को सत्य असत्य का विचार करने के लिए बुद्धि वेदों का ज्ञान दिया है। यदि हम इन साधनों का सदुपयोग नहीं करते किंवा दुरुपयोग करते हैं तो हम मनुष्य की परिभाषा को चरितार्थ नहीं करते। हमें स्वयं को मनुष्य होने को सार्थक करते हुए वेदों का अध्ययन करना चाहिये, सत्य को जानना चाहिये और सत्य को ग्रहण तथा असत्य का त्याग करना चाहिये। सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग तथा सत्य का आचरण करना ही मनुष्य का धर्म निश्चित होता है। वेद सत्य ज्ञान व विद्याओं के भण्डार है। इस कारण वेद ही सत्यधर्म के ग्रन्थ व कोष हैं। हमें इस तथ्य को समझना है और इसे अपने जीवन में चरितार्थ करना है। हमारा सौभाग्य है कि हमें वेदों पर ऋषियों द्वारा रचित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। हमारे पास उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋषि दयानन्द व आर्य विद्वानों के वेदभाष्य आदि अनेक ग्रन्थ है। महापुरुषों राम, कृष्ण, दयानन्द, चाणक्य आदि के जीवन चरित के रूप में रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ भी उपलब्ध हैं। हमें इन ग्रन्थों का अध्ययन कर इनसे लाभ उठाना चाहिये। राम का जीवन मर्यादाओं से युक्त आदर्श मनुष्य व धर्म का जीता जागता उदाहरण है। हमें राम व कृष्ण जैसा बनने का प्रयत्न करना चाहिये। तभी हम सच्चे मनुष्य व धर्म पारायण मनुष्य कहला सकते हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम मनुष्य के अनुरूप शरीर वाले होकर भी मनुष्य नहीं कहला सकते। मनुष्य हम तभी होंगे जब हम सद्कर्म करेंगे, दूसरों के प्रति दया व करूणा का भाव रखेंगे, ईश्वर को जानकर उसके सत्य गुणों से उपासना करेंगे, परोपकार के कर्म करेंगे, लोभ रहित जीवन जीयेंगे, जिसका देश में जन्में व जिसका अन्न खाते हैं उसके प्रति सच्ची भक्ति रखेंगे तथा दुष्टों की दुष्टता को दूर करने के उपाय करेंगे। यदि हम सब ऐसा नहीं करते तो हम न तो मनुष्य कहला सकते हैं न ही हमें धर्म का ज्ञान होने से हम धार्मिक कहला सकते हैं। ऐसे मनुष्यों को ढोंगी, अर्ध नास्तिक या अर्ध आस्तिक ही कहा जा सकता है। हम मनुष्य हैं अतः हमें ईश्वर व उसके कर्म फल विधान को जानकर सद्कर्मों को करना चाहिये। ईश्वर की उपासना कर ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहिये जिससे हम सभी दुःखों से मुक्त होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकें। ओ३म् शम्।

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