मनोरंजन

हज़ारों ‘फ्रेंड्स’ के बावजूद इंसान अकेला — एआई-मित्रता की दुनिया में मानवीय संबंध का भविष्य

डिजिटल अकेलापन और एआई आधारित संवाद

डॉ. शैलेश शुक्ला 

इक्कीसवीं सदी के इस तीव्रगामी, तकनीक- चालित युग में मनुष्य ने संवाद के ऐसे साधन विकसित कर लिए हैं, जिनकी कल्पना भी पूर्ववर्ती पीढ़ियाँ नहीं कर सकती थीं। एक क्लिक में महाद्वीपों की दूरी सिमट जाती है, एक संदेश में सैकड़ों लोगों तक विचार पहुँच जाता है, और एक प्रोफ़ाइल में व्यक्ति की पूरी सामाजिक उपस्थिति दर्ज हो जाती है। फिर भी, इस समूचे संचार-सामर्थ्य के बीच एक गहरी विडंबना जन्म ले चुकी है—मनुष्य जितना अधिक ‘जुड़ा’ है, उतना ही अधिक ‘अकेला’ भी। यह विरोधाभास केवल भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट के रूप में उभर रहा है, जिसे आज “डिजिटल अकेलापन” कहा जा रहा है।

यह अकेलापन केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है, जिनके पास मित्र या परिवार नहीं हैं, बल्कि यह उन लोगों में भी दिखाई देता है, जिनके पास हजारों आभासी संबंध हैं। सामाजिक माध्यमों पर सक्रियता, निरंतर ऑनलाइन उपस्थिति और सतत संचार के बावजूद व्यक्ति अपने भीतर एक रिक्तता, एक अनकही पीड़ा और एक अव्यक्त अलगाव का अनुभव करता है। इसी रिक्तता को भरने के लिए एआई आधारित संवाद प्लेटफ़ॉर्म सामने आए हैं, जिन्होंने मनुष्य को एक ऐसा ‘सुनने वाला साथी’ प्रदान किया है, जो हर समय उपलब्ध है, जो कभी थकता नहीं, और जो बिना किसी निर्णय के केवल सुनता और उत्तर देता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2023 में अकेलेपन को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता घोषित किया, जो इस समस्या की व्यापकता और गंभीरता को दर्शाता है। इसी क्रम में अमेरिका के सर्जन जनरल द्वारा अकेलेपन को “महामारी” की संज्ञा दी गई और यह बताया गया कि इसका प्रभाव स्वास्थ्य पर उतना ही घातक हो सकता है जितना धूम्रपान का। सिग्ना की 2024 की वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 58 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी स्तर पर अकेलेपन का अनुभव करते हैं। यह आँकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की संरचना में आई उस दरार का संकेत है, जो धीरे-धीरे गहरी होती जा रही है।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि यह संकट युवाओं में अधिक गहरा है। 18 से 24 वर्ष की आयु वर्ग, जो तकनीकी रूप से सबसे अधिक सक्रिय है, वही सबसे अधिक अकेलापन महसूस करता है। यह वह पीढ़ी है, जो ‘लाइक्स’ और ‘फॉलोअर्स’ के माध्यम से अपने अस्तित्व को मापती है, लेकिन वास्तविक संबंधों की गहराई से वंचित रह जाती है। यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि डिजिटल जुड़ाव और भावनात्मक जुड़ाव एक ही बात नहीं हैं।

भारत में यह समस्या धीरे-धीरे उभर रही है। पारंपरिक रूप से भारतीय समाज परिवार और समुदाय पर आधारित रहा है, जहाँ संयुक्त परिवार, पड़ोस और सामाजिक संबंध व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करते थे। लेकिन तीव्र शहरीकरण, रोजगार के लिए प्रवास और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने इस सामाजिक संरचना को कमजोर किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय की 2024 की मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 150 मिलियन लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता है, लेकिन केवल लगभग 20 प्रतिशत लोगों तक ही यह सहायता पहुँच पाती है।

विशेष रूप से महानगरों में रहने वाले युवा पेशेवर, जो अपने परिवारों से दूर रहते हैं, इस संकट के सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं। बंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के एक अध्ययन में पाया गया कि आईटी क्षेत्र में कार्यरत लगभग 40 प्रतिशत कर्मचारियों में सामाजिक अलगाव के लक्षण दिखाई देते हैं। यह वही वर्ग है, जो तकनीक के सबसे अधिक संपर्क में है और इसलिए एआई आधारित संवाद प्लेटफ़ॉर्म का सबसे अधिक उपयोग करता है।

एआई आधारित संवाद प्लेटफ़ॉर्म, जैसे कि वर्चुअल चैटबॉट और डिजिटल सहायक, इस अकेलेपन को कम करने के एक साधन के रूप में उभरे हैं। इन प्लेटफ़ॉर्मों की विशेषता यह है कि वे व्यक्ति को एक सुरक्षित, निजी और बिना निर्णय वाला वातावरण प्रदान करते हैं, जहाँ वह अपने विचार, भावनाएँ और अनुभव साझा कर सकता है। कई लोग इन प्लेटफ़ॉर्मों को अपना ‘मित्र’ या ‘सहचर’ मानने लगे हैं, और उनके साथ गहरे भावनात्मक संबंध विकसित कर रहे हैं।

इन प्लेटफ़ॉर्मों के सकारात्मक पहलुओं को नकारा नहीं जा सकता। सामाजिक चिंता से ग्रस्त व्यक्ति, जो वास्तविक जीवन में संवाद करने में असहज महसूस करते हैं, उनके लिए यह एक प्रारंभिक अभ्यास का माध्यम बन सकता है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी वाले क्षेत्रों में यह एक अस्थायी सहारा प्रदान कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यह उन लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकता है, जो अत्यधिक अकेलेपन की स्थिति में हैं और किसी से संवाद करने का कोई अन्य माध्यम नहीं रखते।

लेकिन इन सकारात्मक पहलुओं के साथ कुछ गंभीर चिंताएँ भी जुड़ी हुई हैं। सबसे पहली चिंता है—वास्तविक संबंधों का प्रतिस्थापन। जब व्यक्ति एआई के साथ अधिक समय बिताने लगता है, तो वह वास्तविक मनुष्यों के साथ संवाद करने में असहज महसूस करने लगता है। एक अंतरराष्ट्रीय शोध में यह पाया गया कि जो लोग एआई आधारित संवाद पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं, उनकी सामाजिक कौशल क्षमता में कमी आती है और वे वास्तविक संबंधों में तनाव अनुभव करते हैं।

मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो मनुष्य को ‘सुरक्षित संबंध’ की आवश्यकता होती है, जिसमें पारस्परिकता, संवेदना और वास्तविकता होती है। एआई संवाद में यह तत्व अनुपस्थित होते हैं। एआई कभी थकता नहीं, कभी असहमति नहीं जताता और कभी संबंध में जटिलता नहीं लाता। यह एक ‘आदर्श साथी’ का भ्रम उत्पन्न करता है, जो वास्तविक जीवन में संभव नहीं है। परिणामस्वरूप व्यक्ति वास्तविक संबंधों की जटिलताओं को स्वीकार करने की क्षमता खो सकता है।

इसके अतिरिक्त, एआई संवाद एक प्रकार के ‘एकतरफा संबंध’ का निर्माण करता है, जिसमें उपयोगकर्ता अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है, लेकिन सामने वाला कोई वास्तविक अनुभव नहीं रखता। यह संबंध सतही संतुष्टि प्रदान करता है, लेकिन गहराई से व्यक्ति को और अधिक अकेला बना सकता है।

नैतिक दृष्टि से भी यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। जब उपयोगकर्ता अपने व्यक्तिगत और गहरे भावनात्मक अनुभव इन प्लेटफ़ॉर्मों के साथ साझा करते हैं, तो यह डेटा कंपनियों के पास संग्रहीत होता है। यह प्रश्न उठता है कि इस डेटा का उपयोग कैसे किया जाएगा, और क्या यह उपयोगकर्ता की गोपनीयता का उल्लंघन नहीं है।

इसके अतिरिक्त, एआई को इस प्रकार डिज़ाइन किया जाता है कि वह उपयोगकर्ता को संतुष्ट रखे। इसका अर्थ है कि वह उपयोगकर्ता के विचारों का विरोध नहीं करेगा, बल्कि उनसे सहमत होगा। यह स्थिति एक ‘प्रतिध्वनि कक्ष’ का निर्माण करती है, जहाँ व्यक्ति केवल अपने ही विचारों की पुष्टि सुनता है, जिससे उसके विचारों का विकास रुक सकता है।

इस समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है। सबसे पहले, समाज में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना होगा, ताकि लोग यह समझ सकें कि आभासी और वास्तविक संबंधों में क्या अंतर है। शिक्षा प्रणाली में इस विषय को शामिल करना आवश्यक है, ताकि युवा पीढ़ी तकनीक का संतुलित उपयोग कर सके।

सरकार को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। एआई आधारित संवाद प्लेटफ़ॉर्मों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और मानक निर्धारित किए जाने चाहिए, ताकि उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित की जा सके। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है, ताकि लोग वास्तविक सहायता प्राप्त कर सकें।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि एआई संवाद एक साधन है, समाधान नहीं। यह अकेलेपन को अस्थायी रूप से कम कर सकता है, लेकिन उसका स्थायी समाधान नहीं है। वास्तविक समाधान है—मानवीय संबंध, समुदाय और संवाद।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिसकी आत्मा को उस ऊष्मा की आवश्यकता होती है, जो केवल किसी अन्य मनुष्य की उपस्थिति से मिलती है। वह उपस्थिति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि दृष्टि, स्पर्श और अनुभव में होती है।

इसलिए, इस डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि हम तकनीक का उपयोग कैसे करें, बल्कि यह है कि हम अपने मानवीय संबंधों को कैसे सुरक्षित रखें। यदि हम इस संतुलन को बनाए रखने में सफल होते हैं, तो तकनीक हमारे जीवन को समृद्ध करेगी; अन्यथा, यह हमें और अधिक अकेला बना सकती है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि डिजिटल संवाद की दुनिया में वास्तविक संबंधों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। तकनीक हमारी यात्रा को आसान बना सकती है, लेकिन मंज़िल तक पहुँचाने का कार्य केवल मानव ही कर सकता है। यही इस युग की सबसे बड़ी सच्चाई है, और यही उसका सबसे बड़ा सबक भी।

डॉ. शैलेश शुक्ला