लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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विजय कुमार

अन्ना हजारे के आंदोलन से छात्र हो या अध्यापक, किसान हो या मजदूर, व्यापारी हो या उद्योगपति; सब प्रभावित हैं। यह बात दूसरी है कि कानून बनाने वाले अभी कान में तेल डाले बैठे हैं।

शर्मा जी का खाद बनाने का एक छोटा सा कारखाना है। पिछले बीस साल से वे इससे ही अपने परिवार का पेट भर रहे हैं। वे प्रायः हंसी में कहते हैं कि यों तो हम उद्योगपति हैं; पर हमारे कितने पति हैं, यह हमें भी ठीक से नहीं मालूम। स्थानीय दादा से लेकर श्रमिक नेता; नगर और जिले के सरकारी अधिकारी; पुलिसकर्मी, विधायक, सांसद और न जाने कौन-कौन। इनमें से किसी एक को भी समय से राशन न पहुंचे, तो काम बंद होते देर नहीं लगती।

जहां तक खाद में मिलावट की बात है, यह तो सब ही करते हैं। कुछ लोग तो सरकारी अधिकारियों की अनुमति से भी अधिक कर लेते हैं; पर शर्मा जी इस मामले में भले आदमी हैं। वे मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। पाप-पुण्य में संतुलन बनाकर चलना उनके स्वभाव में है। वे कई बार सोचते हैं कि मिलावट न करें; पर ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ वाली कहावत याद कर शांत हो जाते हैं।

लेकिन अन्ना के अनशन से उन्हें एक आशा की किरण दिखाई दी। उनकी भी इच्छा है कि भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए। कल जब वे रामलीला मैदान गये, तो उन्हें जिला उद्योग अधिकारी वर्मा जी मिल गये। वर्मा जी को वे शुभकामनाओं वाले रंगीन लिफाफे में रखकर, मेज के नीचे से हर साल दस हजार रु0 देते हैं।

– कैसे हैं शर्मा जी ?

– दया है आपकी।

– काफी दिन से आये नहीं। अब तो नया साल भी लग गया है।

– जी हां। बस, आने की सोच ही रहा था। पिताजी की बीमारी के कारण जरा हाथ तंग है; पर जल्दी ही आऊंगा।

– नहीं, नहीं। आप कल ही आ जाएं। अगले महीने मेरी बेटी की शादी है। आपकी शुभकामनाओं की मुझे बहुत जरूरत है।

शर्मा जी बात समझ गये। मन तो हुआ कि यहीं उसका मुंह नोच लें। अन्ना की रैली में ऐसी बात करते हुए उसे शर्म नहीं आई; पर क्या करें ? उसे नाराज नहीं किया जा सकता था। अतः वे अगले दिन लिफाफा लेकर उसके कार्यालय पहुंच गये।

– आइये शर्मा जी, आइये।

– जी..। कहकर शर्मा जी ने लिफाफा बढ़ा दिया।

– शर्मा जी, दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी; पर आप अभी तक छोटे लिफाफे से ही काम चला रहे हैं।

– सर, मैंने आपको बताया ही थी कि पिताजी..।

– अरे भाई, संसार में यहां दुख-सुख तो लगे ही रहते हैं; पर इससे कोई काम थोड़े ही रुकता है। फिर इन दिनों तो अन्ना हजारे के आंदोलन के कारण रिस्क और रेट दोनों ही बढ़ गये हैं। नीचे से ऊपर तक सब लोग कुछ अधिक ही सावधानी बरत रहे हैं। मंत्री जी भी दुगना पैसा मांग रहे हैं। उनका कहना है कि इस सरकार का कोई भरोसा नहीं। हो सकता है कि चुनाव अगले साल ही हो जाएं। इसलिए वे अभी से उसके प्रबंध में लग गये हैं।

– पर सर, हमारे काम में तो इससे अधिक की गुंजाइश नहीं है।

– गुंजाइश तो निकालने से निकलती है शर्मा जी। अभी आप दस प्रतिशत मिलावट करते हैं, अब पन्द्रह प्रतिशत कर लिया करो। मोहर तो मुझे ही लगानी है। क्या समझे ?

– जी समझ गया। अच्छा, अब मैं चलता हूं।

– आपको थोड़ा कष्ट और देना चाहता हूं। मुझे रामलीला मैदान तक छोड़ दें। भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे इस आंदोलन में भाग लेना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

शर्मा जी क्या कहते। उन्होंने स्कूटर में किक मारी। वर्मा जी ने जेब में से निकालकर गांधी टोपी पहनी और पीछे बैठ गये।

रास्ते में हर ओर अन्ना हजारे के समर्थन में नारे लग रहे थे। वर्मा जी ने भी मुट्ठी बांधी, हाथ उठाया और गला फाड़कर चिल्ला पड़े –

मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना; अन्ना हजारे जिन्दाबाद।।

One Response to “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    जब आपने यह लिखा की
    ” फिर इन दिनों तो अन्ना हजारे के आंदोलन के कारण रिस्क और रेट दोनों ही बढ़ गये हैं। नीचे से ऊपर तक सब लोग कुछ अधिक ही सावधानी बरत रहे हैं। मंत्री जी भी दुगना पैसा मांग रहे हैं। उनका कहना है कि इस सरकार का कोई भरोसा नहीं। हो सकता है कि चुनाव अगले साल ही हो जाएं। इसलिए वे अभी से उसके प्रबंध में लग गये हैं।” तो मुझे १९७५ का आपात काल याद आ गया .आपात काल लागू होने के छ: महीने तक तो सबकुछ ठीक ठीक चला,लगता था की सचमुच राम राज्य आ गया ,पर छ: महीने बीतते बीतते लेने वाले एक की जगह पांच या दस लेने लगे.क्योंकि रिस्क ज्यादा हो गया था.हो सकता है की जन लोकपाल या लोकपाल आने की चिंता में इस समय भी रिश्वत का दर बढ़ जाए क्योंकि बाद में रिश्वत मिले या न मिले.
    ऐसे मैं यद्दपि आन्ना हजारे के अनशन का साधारण त्या साक्षी रहा पर मैं अन्ना की टोपी पहनने का साहस नहीं जुटा पाया क्योंकि मैंने अपने को उस टोपी के योग्य नही समझा

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