युवा अपने परिवारों में यदि वृद्धों के साथ संगतिकरण करेंगे तो वृद्धो को सुख मिलेगा : आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

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मनमोहन कुमार आर्य,

वैदिक साधन आश्रम, तपोवन-देहरादून में चल रहे शरदुत्सव के दूसरे दिन आज 4 अक्टूबर, 2018 को प्रातः 6.30 बजे से यजुर्वेद पारायण किया गया। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी के ब्रह्मत्व में यज्ञ हुआ। मंत्रों का उच्चारण गुरुकुल पौंधा के दो ब्रह्मचारियों श्री ओम्प्रकाश जी और श्री विनीत कुमार जी ने किया। यज्ञ के बाद पं. नरेश दत्त आर्य जी के भजन हुए। उनके गाये गये भजन के बोल थे प्रभु का भजन किया जीवन गंवा दिया, पापों का दमन किया जीवन गंवा दिया इसके बाद पं. सत्यपाल पथिक जी ने भजन गाया। उन्होंने भजन गाने से पूर्व कहा कि यज्ञ कल्पतरू है, यज्ञ ही कामधेनु है और यज्ञ ही विष्णु है। उन्होंने कहा कि यज्ञ को कामधेनु इसलिये कहा जाता है क्योंकि इसी से सब कुछ प्राप्त होता है। यज्ञ से मनुष्यों की सब कामनायें पूर्ण होती हैं। पं. सत्यपाल पथिक जी ने एक वेदमंत्र पर आधारित भजन सुनाया। उन्होंने मन्त्र में आये इन्द्र शब्द के विषय में बताया कि ऐश्वर्यों के स्वामी को इन्द्र कहते हैं। इन्द्र के अनेक अर्थ हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा का एक नाम भी इन्द्र है। भजन में परमात्मा इन्द्र के विषय में कहा गया है। भजन के बोल थे ‘ओ दाता श्रेष्ठ धन देना ओ दाता श्रेष्ठ धन देना‘। इस भजन की कुछ पंक्तियां यह भी थीं जीवन के दिन सुन्दर हों प्यारी प्यारी रातें, सब के सब जन करें परस्पर जनहितकारी बातें। पथिक सदा हर जनमानस में अपनापन देना। दाता श्रेष्ठ धन देना।

भजनों के बाद आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का सम्बोधन हुआ। आचार्य जी ने कहा कि आज समाज में उन देवताओं का पूजन हो रहा है जो बाजार में बिकते व खरीदे जाते हैं। कारीगर छेनी व हथौड़े से इन्हें बनाते हैं। इसका परिणाम है कि सारा समाज व देश दुःखी है। विद्वान आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि सभी देवता मरणधर्मा हैं। जब प्रलय अवस्था होती है तो यह सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अन्न, जल, वायु, अग्नि आदि देवता नहीं रहते। माता-पिता व आचार्य आदि भी मरणधर्मा हैं और वह भी नहीं होते। ईश्वर सृष्टि काल हो या प्रलय काल, नित्य व अनश्वर सत्ता होने से तब भी पूर्ववत् विद्यमान रहता है। आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने यज्ञ के अर्थ देवपूजा, संगतिकरण व दान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि यज्ञ में अग्नि तब प्रकट होती है जब यज्ञकुण्ड, यजमान, समिधा, यज्ञ के ब्रह्मा, दीपक, कपूर आदि का संगतिकरयण होता है। जिस परिवार के सभी सदस्यों में संगतिकरण होता है उस परिवार में सुख व शान्ति का वास होता है। लोग कहते हैं कि इस परिवार के सभी सदस्य परस्पर मिलकर प्रेम व सद्भाव से रहते हैं। कहीं किसी के मन में द्वेष नहीं होता। यदि ऐसा न हो तो घर परिवार में यज्ञ करने का कोई औचित्य नहीं है।

आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि राष्ट्र और समाज में संगतिकरण न होने से हमारा राष्ट्र मुसीबतों में फंसा है। सब परस्पर मिलकर अपने स्वार्थ छोड़कर सच्चे हृदय से राष्ट्रीय समस्याओं को हल करें, तब संगतिकरण होगा। आचार्य जी ने एक कथा सुनाई। एक युवा अपनी मां को एक पार्क में घुमाने ले गया। मां रूग्ण है। वह चल नहीं सकती। युवा मां का हाथ पकड़ कर धीरे धीरे उसी गति से चल रहा है जिस गति से मां चल सकती है। युवा को अपनी मां का ध्यान है। वह यह नहीं सोचता कि वह तेज चल सकता है तो उसे तेज चलना चाहिये। उसे अपनी मां के सुख का ध्यान है। इसी को संगतिकरण कहते हैं। आचार्य जी ने कहा कि यदि युवा अपने परिवारों में वृद्धों के साथ संगतिकरण करेंगे तो वृद्धो को सुख मिलेगा। परिवार के वृद्धों का सुख उसके युवा सदस्यों के संगतिकरण से ही सम्भव हो सकता है। आचार्य जी ने आगे कहा कि यह संगतिकरण राष्ट्र और परिवारों के लिये बहुत आवश्यक है। अखिल ब्रह्माण्ड में भी संगतिकरण दिखाई देता है। यह संगतिकरण ही यज्ञ है। उन्होने कहा कि यदि ब्रह्माण्ड में किसी सूर्य, चन्द्र या पृथिवी आदि की चाल बिगड़ जाये तो आज ही प्रलय अवस्था आ सकती है।

आचार्य उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने एक वेदमन्त्र का उच्चारण किया जिसमें कहा गया है कि मनुष्य का शरीर यज्ञ और संगतिकरण करने के लिये हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा भी सृष्टि के देवों के साथ मिलकर संगतिकरण व यज्ञ कर रहे हैं। विद्वान आचार्य ने कहा कि मनुष्य के शरीर रूपी पिण्ड सहित ब्रह्माण्ड तथा पृथिवी पर भी संगतिकरण रूपी यज्ञ चल रहा है। उन्होंने कहा कि मनुष्य व सभी प्राणियों के शरीरों के सभी अंग आत्मा के साथ संगतिकरण किये हुए है। इस संगतिकरण का परिणाम ही जीवन है। आचार्य जी ने संगतिकरण को भोजन का उदाहरण देकर समझाया। उन्होंने कहा कि हमारे हाथ हमें बताते हैं कि भोजन अधिक गर्म तो नहीं है। नाक सूंघ कर बताती है कि भोजन बासी या दुर्गन्धयुक्त तो नहीं है। भोजन मुंह में डाला तो दांत उसे पीसते है। यदि भोजन में कंकड़ हो तो हमें इसका ज्ञान हो जाता है। जिह्वा भोजन का स्वाद बताती है। यह सब संगतिकरण है और हमारे शरीर रूपी पिण्ड में यज्ञ का होना है। इसके बाद सब यजमानों व यज्ञ में भाग लेने वालों को आशीर्वाद दिया गया।कार्यक्रम का संचालन श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने बहुत कुशलता से किया। उन्होंने आश्रम को छोटी बड़ी धनराशि देने वाले दानदाताओं के नाम व धनराशि पढ़कर सुनाई। इसी के साथ आज का प्रातःकालीन यज्ञ एवं सत्संग सम्पन्न हुआ। इसके बाद का कार्यक्रम आश्रम के वृहद एवं भव्य सभागार में हुआ। आज वैदिक साधन आश्रम तपोवन द्वारा संचालित तपोवन विद्या निकेतन विद्यालय का वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ जिसमें मुख्य अतिथि वरिष्ठ श्रम अधिकारी डा. नीरज मोहन थे। भव्य कार्यकम सबके द्वारा सराहा गया जिसकी रिर्पोट इसके बाद तैयार कर आपकी सेवा में प्रस्तुत करेंगे।

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