प्रो. मनोज कुमार
प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से देशवासियों से अपील किया है कि आसन्न संकट को देखते हुए ईंधन की बचत करें. साथ में कुछ और आग्रह भी. स्वाभाविक है कि पीएम की यह अपील सर्वसमाज के लिए था लेकिन मैं और हम में बँटे लोग इस अपील का मौखाल उड़ा रहे थे। सोशल मीडिया में लगातार इस पर तरह-तरह की बातें चल रही थी। यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उनके ही दल के लोग उदाहरण प्रस्तुत करें लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने फौरन अपनी सुरक्षा व्यवस्था में लगी गाडिय़ों की संख्या कम कर दी। अपरोक्ष रूप से उन्होंने अपने मंत्रिमंडल एवं नव-नियुक्त निगम-मंडलों के अध्यक्षों को निर्देश था लेकिन दिल है कि मानता नहीं के तर्ज पर शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया था। ख$फा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जनप्रतिनिधियों को संदेश दे दिया है- ‘कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे’ अन्यथा उनकी सख्ती जग-जाहिर है। यह अपने आपमें हैरान में डाल देने वाला सवाल है कि जिस मोदी को आप अपना आदर्श मानते हैं, उनकी अपील का असर होता नहीं दिख रहा है. सवाल यह भी है कि क्या यह अपील उनके निजी नफा-नुकसान के लिए है अथवा आसन्न संकट से बचाने के लिए देशहित में है।
किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है. यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है. इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है. भले ही अभी हाहाकार ना मचा हो लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसा ही बन रहा है. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. हम यह भी मानते हैं कि सामान्य हालत में शासकीय योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आम लोगों को मिले किंतु संकटकालीन स्थितियों में इन पर रोक लगाया जाना देशहित में है. लाडली बहनों को दिए जाने वाली राशि फिलहाल स्थगित कर देना एक बड़ा उपाय हो सकता है। और हम यह भी जानते हैं कि हमारी मातृशक्ति हर संकट में घर-परिवार, समाज और देश को उबारने में सक्षम हैं और इस समय भी उनका साथ मिलेगा।
मोदी के विरोधी जिस स्तर पर उनका मजाक बना रहे हैं, वह स्वाभाविक है लेकिन क्या ऐसे लोगों के पास जवाब है कि जब देश संकट से गुजर रहा होगा तो वे बच जाएंगे? सुरक्षित रह पाएँगे? वे और उनका परिवार भी इसी देश के नागरिक हैं तो मोदी ना सही, प्रधानमंत्री की बात सुनिए, मानिए. लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात की है कि विरोध का मंच खुला होता है। सत्ता के कार्यों की समीक्षा करना और उनकी आलोचना करना, सुधार का सुझाव देना किसी भी विपक्ष के लिए जिम्मेदारी होता है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विरोध ही एक पक्ष है? अधिकार के साथ क्या हमें दायित्व का पालन नहीं करना चाहिए? लोकतंत्र आपको अधिकार देता है तो आपका दायित्व भी निर्धारित करता है और इसलिए आवश्यक है कि समयकाल और परिस्थितियों के अनुरूप विरोध करें या समर्थन कर देशहित में निर्णय लें। वर्तमान समय की माँग है कि हम देशहित में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें।
इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है. बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है.
पीएम की अपील भी हैकि वर्कफ्रॉम होम को प्राथमिकता देंञ सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है. साथ ही जरूरत पडऩे पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है. कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है. सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है. समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलवक्त संकट बहुत भयावह नहीं है लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है. बहुत जल्द ही हम तनाव मुक्त होंगे लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है. एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा