धर्म-अध्यात्म

जीवन में यदि उन्नति करनी है तो मनन शक्ति को उत्पन्न करना होगा और वैदिक साहित्य का स्वाध्याय भी करना होगा: आचार्य राहुल आर्य

-मनमोहन कुमार आर्य

  आज रविवार दिनांक 4-1-2026 को हम आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय सत्संग में सम्मिलित हुए। आर्यसमाज की यज्ञशाला में प्रातः 8.30 बजे से यज्ञ हुआ। यज्ञ आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित श्री विद्यापति शास्त्री जी ने सम्पन्न कराया। इस यज्ञ में आर्यसमाज के सदस्यगण एवं बालवनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित हुए। यज्ञ के बाद आर्यसमाज के सभागार में सत्संग आरम्भ हुआ। स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चों ने भजन प्रस्तुत किये, सामूहिक प्रार्थना प्रस्तुत की तथा आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने भजन प्रस्तुत करने सहित ऋषि जीवन चरित्र से कुछ अंशों को पढ़कर प्रस्तुत किया। आज का व्याख्यान गुरुकुल पौंधा, देहरादून के युवा आचार्य राहुल आर्य जी का निर्धारित था। उन्होंने स्वाध्याय के महत्व पर बोलते हुए ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र अग्निमीळे पुरोहितम्’ को प्रस्तुत कर उस पर अपने विचार प्रस्तुत किये। C:\Users\Manmohan\Desktop\Aryasamaj image 1 4 1 26.jpg

आचार्य राहुल आर्य जी ने कहा कि कि वेदों को श्रुति इस लिये कहा जाता है कि सृष्टि के आदि काल में वेदों की रक्षा, अध्ययन, अध्यापन व प्रचार सुन सुनाकर किया जाता रहा। श्री आर्य ने कहा कि मन्त्र उसे कहा जाता है जिसका मनन किया जाता है। उन्होंने कहा कि मन्त्र के दो प्रकार के अर्थ होते हैं प्रथम प्रकट अर्थ तथा द्वितीय गुप्त अर्थ। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द जी ने वेदों के मन्त्रों के गुप्त अर्थों को मनन करके प्रस्तुत किया है जबकि उनके पूववर्ती विद्वानों सायण, महीधर आदि ने वेदों के प्रकट अर्थ किये हैं। उन्होंने कहा कि इसी कारण से ऋषि दयानन्द का वेदभाष्य उनके पूर्ववर्ती वेद के आचार्यों के भाष्यों से भिन्न व उत्कृष्ट है। 

युवा आर्य विद्वान आचार्य राहुल आर्य ने कहा कि विश्व के पुस्तकालय में सबसे पुरानी पुस्तक वेद की संहितायें हैं। विद्वान वक्ता ने आज के अपने प्रवचन में स्वाध्याय के महत्व पर प्रकाश डाला तथा ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र को प्रस्तुत कर उसके अर्थों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। मन्त्र के अग्नि पद के अर्थ पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि अग्नि अग्रणी होती है। अग्नि से प्रेरणा ग्रहण कर हमें भी जीवन में अग्नि के समान अग्रणीय बन कर रहना है। आचार्य जी ने मन्त्र में आये पुरोहित शब्द के अर्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अग्नि हमें समर्पण की प्रेरणा करती है। उन्होंने कहा कि निरुक्त की सहायता के विना वेद के मन्त्रों का अर्थ नहीं किया जा सकता। आचार्य जी ने कहा कि हम उस नेता की स्तुति करते हैं जो देश व समाज को आगे वा उन्नति की ओर ले जाता है। आचार्य जी ने कहा कि अग्नि हमेशा ऊपर की ओर जाती है। इससे प्रेरणा ग्रहण कर हमें भी अपने जीवन में ऐसे कार्य करने चाहियें जिससे हमारी उन्नति हो तथा हमारा पतन कदापि न हो। आचार्य जी ने कहा कि अग्नि हमें प्रेरणा देती है कि हम नीचे गिरने का कोई कार्य अपने जीवन में न करें। आचार्य राहुल आर्य जी ने कहा कि जहां अग्नि होती है वहां गति होती है। अग्नि के इस गुण से भी हमें प्रेरणा लेनी है और हमें अपने जीवन को गतिशील बनाना है। आचार्य जी ने कहा कि हमें ऐसे लोगों की संगति करनी है जिनमें अग्नि के समान गुण हों। 

आचार्यजीनेकहाकिजोहमारेसाथरहकरहमाराहितकरतेहैंवहहमारेपुरोहितहोतेहैं।उन्होंनेकहाकिहमारेआचार्य, विद्वान, माता-पितावसभीसत्पुरुषोंकीसंज्ञापुरोहितहोतीहै।आचार्यजीनेयज्ञशब्दपरभीप्रकाशडाला।आचार्यजीनेकहाकिपरस्परसहयोगकीभावनाकाहोनायज्ञकहलाताहै।उन्होनेकहाकिसंसारकेसभीश्रेष्ठकार्ययज्ञकेअन्तर्गतआतेहैं।मन्त्रमेंआये‘देव’शब्दकाउल्लेखकरउन्होंनेकहाकिपंचमहाभूत, माता-पितातथासभीआचार्यगणहमारेदेवकहलातेहैं। सभी देव पूजा व सत्कार के योग्य होते हैं। पूजा का अर्थ करते हुए आचार्य जी ने कहा कि किसी भी वस्तु से यथायोग्य उपकार लेना उसकी पूजा होती है। आचार्य जी ने देवपूजा के अर्थ पर भी व्याकरण के आधार पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सत्पुरुषों, साधु व विद्व़ानों का सग करना व उनके गुणों को अपने जीवन में धारण करना भी देवपूजा है। आचार्य जी ने बताया कि दान किसे कहते हैं? उन्होंने कहा कि वेदों की शिक्षाओं व मान्यताओं का प्रचार करना भी शुभ गुणों का दान करना होता है। ‘ऋत्विज’ शब्द के अर्थ पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जो प्रत्येक ऋतु में यज्ञ करते हैं वह ऋत्विज कहलाते हैं। उन्होंने बताया कि ऋत्विज किन्हीं भी परिस्थितियों में यज्ञ करना नहीं छोड़ते। उन्होंने कहा कि हमें ऋतु के अनुसार यज्ञ करना चाहिये और जिस ऋतु में जो सामग्री उपयोगी होती है, उसका यज्ञ की आहुतियों में प्रयोग करना चाहिये। आचार्य राहुल आर्य जी ने कहा कि ऋतुओं के संधि काल में सबसे अधिक रोग होते हैं। शरद ऋतु को उन्होंने सबसे अधिक रोग उत्पन्न करने वाली ऋतु बताया। उन्होंने कहा कि इसी कारण ‘तच्चक्षुर्देवहितंपुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्’ मन्त्र में 6 बार शरदः शतम् कहकर प्रार्थना की गई है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा की कृपा हम पर रहे और हम एक सौ बार शरद् ऋतु पार करने वाले बने। उन्होंने कहा कि शरद ऋतु पार कर लेने वाले मनुष्यों के लिये अन्य ऋतुओं में स्वस्थ रहना सरल होता है। 

होतारम्’ शब्द का उल्लेख कर आचार्य जी ने कहा कि होता यज्ञ करने वाले को कहते हैं। आचार्य जी  ने परमेश्वर को भी होता बताया और कहा कि हम होता=परमेश्वर की स्तुति करने वाले बने। आचार्य जी ने कहा कि होता का अर्थ कृतज्ञ भी होता है। उन्होंने गुरु, आचार्य एवं विद्वानों को भी होता बताया। आचार्य जी ने कहा कि ऋग्वेद मन्त्र में ईश्वर कोरत्नधातमम्’ कहा गया है। उन्होंने कहा कि रत्नों को धारण करने वाले को रत्नधातमम् कहते हैं। आचार्य जी ने बताया कि सभी अच्छे हितकारी वचन रत्न होते हैं तथा स्वर्ण व आभूषण आदि भी रत्न होते हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर सभी प्रकार के रत्नों को धारण करने वाला है। आचार्य जी ने कहा यज्ञ करने से आत्मा को शीतलता प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि यज्ञ यज्ञकर्ता को रत्नों को धारण कराता है। आचार्य जी ने सभी मनुष्यों को यज्ञरूप परमेश्वर की उपासना व अग्निहोत्र करने की प्रेरणा की। आचार्य जी ने एक महत्वपूर्ण बात यह कही कि निरन्तर मन्त्र का मनन करने पर उसका अर्थ समझा जा सकता है। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य की मनन करने की शक्ति स्वाध्याय करने पर विकसित होती है। उन्होंने कहा कि सबको प्रतिदिन स्वाध्याय अवश्य करना चाहिये। आचार्य जी ने सभी को वेदों की ओर लौटने की प्रेरणा की और कहा कि हमारे सभी कार्य वेदानुकूल और वेदों की मान्यताओं की भावनाओं के अनुरूप होने चाहियें। विद्वान आचर्य ने कहा कि जीवन में यदि उन्नति करनी है तो मनन शक्ति को उत्पन्न करना होगा और वैदिक साहित्य का स्वाध्याय भी करना होगा। आचार्य जी ने कहा कि मनन शक्ति के लिये स्वाध्याय एवं विद्वानों के उपदेशों का श्रवण करना आवश्यक है। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि हमें स्वामी दयानन्द जी की विचार वा ज्ञान सम्पदा को संजोकर व सम्भाल कर रखना है। 

आचार्य राहुल आर्य जी के व्याख्यान की समाप्ति पर आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने भी स्वाध्याय के महत्व पर प्रकाश डाला और आचार्य जी का धन्यवाद किया। पण्डित जी ने कहा आत्म निरीक्षण करना भी स्वाध्याय के अन्तर्गत आता है अतः सबको प्रतिदिन आत्म निरीक्षण अवश्य करना चाहिये। पुरोहित जी ने कहा कि ‘‘ओ३म्” का उच्चारण भी स्वाध्याय के अन्तर्गत आता है। सत्संग की समाप्ति पर आर्यसमाज के नियमों को पढ़कर सुनाया गया तथा शान्तिपाठ के साथ आज का सत्संग समाप्त हुआ। सत्संग में बड़ी संख्या में स्त्री, पुरुष एवं बाल वनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित थे। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य