-ललित गर्ग-
महामारी के बाद की दुनिया केवल स्वास्थ्य के स्तर पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक सोच और व्यवहार में भी एक बड़े संक्रमण से गुज़री है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ती महंगाई, तकनीक-आधारित बाजार और उपभोक्तावादी संस्कृति के तीव्र प्रसार ने लोगों की खर्च करने की प्रवृत्ति को असाधारण रूप से बढ़ा दिया है। इस बदलाव का सबसे गहरा असर घरेलू बचत पर पड़ा है। भारत सहित अनेक देशों में घरेलू बचत दरें ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंच चुकी हैं। उपभोग बढ़ रहा है, लेकिन भविष्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक बचत निरंतर घटती जा रही है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चिंता का विषय भी बनती जा रही है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए घरेलू बचत सदैव विकास की रीढ़ रही है। बुनियादी ढांचे से लेकर औद्योगिक निवेश तक, भारत की विकास गाथा में घरेलू बचत की भूमिका निर्णायक रही है। परंतु आज स्थिति यह है कि विशेषकर युवा पीढ़ी में बचत की दर 10 से 15 प्रतिशत तक सिमट गई है। यह आंकड़ा किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, तब बचत और खर्च के बीच असंतुलन एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आ रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में युवाओं की भूमिका को हमेशा निर्णायक माना है और वे बार-बार यह संदेश देते रहे हैं कि बचत केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव है। उनके अनुसार उपभोग से पहले बचत की संस्कृति युवाओं में आत्मनिर्भरता, अनुशासन और दीर्घकालिक सोच का विकास करती है। जन-धन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, अटल पेंशन योजना, डिजिटल बचत और निवेश के माध्यमों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि छोटे-छोटे नियमित निवेश भविष्य की बड़ी आर्थिक शक्ति बनते हैं। मोदी का विचार है कि जब युवा वर्ग आज अनावश्यक खर्च से बचकर बचत और उत्पादक निवेश की ओर अग्रसर होगा, तभी भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, समावेशी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगी; क्योंकि आत्मनिर्भर युवा ही सशक्त भारत की सबसे बड़ी पूंजी है।
भारतीय परंपरा में बचत को केवल आर्थिक क्रिया नहीं, बल्कि एक सद्गुण माना गया है। “आज की बचत, कल का संबल” जैसी कहावतें हमारे सामाजिक व्यवहार का हिस्सा रही हैं। गृहस्थ जीवन में संतुलन, संयम और संचय को जीवन-मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया। बच्चों की गुल्लक, अनाज के कोठार, गहनों के रूप में सुरक्षित धन, और त्योहारों पर सीमित व सादगीपूर्ण खर्च-ये सब भारतीय जीवनशैली के अभिन्न अंग थे। संकट के समय भारतीय परिवार किसी के सामने हाथ फैलाने की बजाय अपनी जमा पूंजी और संसाधनों पर भरोसा करता था। यह आत्मनिर्भरता भारतीय समाज की शक्ति रही है। लेकिन बदलती जीवनशैली और बाजार-प्रेरित संस्कृति ने इस परंपरा को कमजोर किया है। आज ‘जियो अभी’ की मानसिकता, आसान कर्ज, ईएमआई संस्कृति, क्रेडिट कार्ड, ऑनलाइन शॉपिंग और सोशल मीडिया पर दिखावे की प्रतिस्पर्धा ने खर्च को एक प्रकार की पहचान बना दिया है। उपभोग अब आवश्यकता से अधिक आकांक्षा से संचालित होने लगा है। अनुभवों, ब्रांड और त्वरित संतुष्टि को प्राथमिकता देने से दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा पीछे छूटती जा रही है। विशेषकर जेन-जी और युवा मिलेनियल पीढ़ी के लिए बचत एक बोझ या भविष्य की अस्पष्ट चिंता जैसी प्रतीत होने लगी है। यह स्थिति भारतीय दर्शन की मूल भावना के विपरीत है। भारतीय विचार परंपरा न अति भोग की पक्षधर है, न अति त्याग की। संयम, संतुलन और विवेक का मार्ग ही श्रेष्ठ माना गया है। यही सिद्धांत आर्थिक जीवन में भी लागू होता है। उपभोग आवश्यक है, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था गतिशील रहती है, रोजगार सृजन होता है और नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है। परंतु जब खर्च अनियंत्रित हो जाए और बचत उपेक्षित हो जाए, तब व्यक्ति ही नहीं, समाज और राष्ट्र भी असुरक्षित हो जाते हैं।
अनुभवों, ब्रांड और त्वरित संतुष्टि को प्राथमिकता देने से दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा पीछे छूट रही है। भारतीय आर्थिक सोच में बचत को आर्थिक सुरक्षा और विकास का आधार माना जाता है, जहाँ घर-परिवार की आय का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 70 प्रतिशत) घरेलू बचत से आता है, जो सोने, स्थायी जमा और पीपीएफ जैसी योजनाओं में होता है, लेकिन नई पीढ़ी में ‘खर्च करो’ की सोच बढ़ी है, जिससे बचत की दरें घट रही हैं, जबकि वित्तीय साक्षरता और सरकारी योजनाओं (पीपीएफ, एनएससी, सुकन्या समृद्धि) के जरिए इसे फिर से बढ़ाने पर जोर है, क्योंकि बचत से ही निवेश और आर्थिक विकास संभव है। आज की वैश्विक परिस्थितियां इस असुरक्षा को और गहरा कर रही हैं। भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध, जलवायु संकट, तकनीकी बदलाव और रोजगार की अनिश्चितता यह संकेत देती है कि भविष्य पहले से अधिक अस्थिर है। ऐसी स्थिति में बचत और निवेश दोनों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि भारतीय समाज अपनी बचत संस्कृति से दूर होता गया, तो दीर्घकाल में आर्थिक आत्मनिर्भरता कमजोर पड़ सकती है। विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ेगी और घरेलू संसाधनों की भूमिका सीमित होती जाएगी।
युवाओं को वित्तीय साक्षरता के माध्यम से बचत और निवेश का महत्व समझाना होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बचत में गिरावट का सीधा प्रभाव पारिवारिक एवं सामाजिक सुरक्षा पर पड़ता है। भारत में अभी भी व्यापक सामाजिक सुरक्षा तंत्र सीमित है। पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और बेरोजगारी सहायता जैसी व्यवस्थाएं पूरी आबादी को नहीं कवर करतीं। ऐसे में व्यक्तिगत और पारिवारिक बचत ही संकट के समय सहारा बनती है। यदि बचत घटती रही, तो आर्थिक झटकों का असर अधिक विनाशकारी होगा। समस्या केवल युवाओं की मानसिकता तक सीमित नहीं है। वित्तीय साक्षरता की कमी भी इसका एक बड़ा कारण है। आज भी बड़ी संख्या में युवा यह नहीं समझ पाते कि बचत और निवेश में अंतर क्या है, महंगाई का असर कैसे पड़ता है, और छोटी-छोटी नियमित बचत किस प्रकार दीर्घकाल में बड़ा संबल बन सकती है। तकनीक का उपयोग यदि उपभोग बढ़ाने में हो रहा है, तो उसी तकनीक का उपयोग बचत और निवेश को सरल और आकर्षक बनाने में भी किया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, माइक्रो-सेविंग्स, स्वचालित निवेश योजनाएं और वित्तीय शिक्षा ऐप्स इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
परिवार की भूमिका भी यहां अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों में विवेकपूर्ण खर्च और बचत की आदत बचपन से ही डाली जानी चाहिए। माता-पिता यदि स्वयं संतुलित व्यवहार अपनाएं, तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से अगली पीढ़ी पर पड़ता है। शिक्षा व्यवस्था में भी वित्तीय अनुशासन और आर्थिक साक्षरता को स्थान दिया जाना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी केवल कमाने पर ही नहीं, संभालने और संजोने पर भी ध्यान दे। यह याद रखना आवश्यक है कि भविष्य की चिंता करना भय नहीं, बल्कि बुद्धिमानी है। बचत का अर्थ जीवन का आनंद त्याग देना नहीं, बल्कि भविष्य के आनंद को सुरक्षित करना है। संतुलित खर्च और नियमित बचत से ही एक सुरक्षित, आत्मनिर्भर और स्थिर समाज का निर्माण संभव है। भारत यदि आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है, तो उसे केवल उपभोग-आधारित विकास से आगे बढ़कर बचत-संवर्धित विकास मॉडल अपनाना होगा। अंततः, बचत और खर्च के बीच संतुलन केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है। आर्थिक अनुशासन अपनाकर ही हम भावी पीढ़ी के लिए मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं। उभरती अर्थव्यवस्था की यह जिम्मेदारी है कि वह तात्कालिक उपभोग के आकर्षण से ऊपर उठकर दीर्घकालीन स्थिरता को प्राथमिकता दे। तभी भारत का आर्थिक उत्थान टिकाऊ, समावेशी और सुरक्षित बन सकेगा।