संसद में दिखा राजनीती का स्वार्थी चेहरा

भारत में राजनीति का जो दौर दिखाई दे रहा है, उससे किसका भला हो रहा है और भविष्य में किसका भला होगा। अगर इस प्रकार की राजनीति देश की जनता के लिए हितकारी नहीं है तो ऐसी राजनीति से देश के राजनीतिक दलों को तौबा करना ही चाहिए। अपने अपने स्वार्थों के भंवर में कैद राजनीति के कारण देश को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। क्या देश को विकास और महाशक्ति बनाने के प्रयासों के लिए इस प्रकार की राजनीति सार्थक मानी जा सकती है? आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश की साख पर कुठाराघात करने वाली राजनीति का पूरी तरह से तिरस्कार होना चाहिए। राजनीतिक स्वार्थ में फंसा देश का वर्तमान किस प्रकार के भविष्य का प्रदर्शन कर रहा है। इस प्रकार का भविष्य निश्चित रूप से देश के लिए और देश की जनता के लिए दुखदायी ही साबित होगा, इसलिए कम से कम राजनीतिक दलों को इस बात की पूरी जिम्मेदारी लेना चाहिए कि भारत के भविष्य को मजबूती प्रदान करने वाली राजनीति ही की जाए। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल देश में जिम्मेदार राजनीतिक दल की भूमिका में आते हैं, कम से कम इन दोनों दलों से तो यह आशा की जाना चाहिए कि वह देशहित की राजनीति करें।

देश की राजनीति में जिस प्रकार के उतार चढ़ाव का खेल शुरू हो गया है, इसका साक्षात्कार हम सभी ने संसद के मानसून सत्र के दौरान देखा। कांग्रेस ने ललित मोदी के मुद्दे पर जिस प्रकार के आक्रोश का प्रदर्शन करके पूरी संसद को ठप कर दिया था, उसी मुद्दे कांगे्रस ने उस समय किनारा कर लिया, जब सत्र समाप्त होने की ओर आ गया था। केन्द्र सरकार के बार बार कहने के बाद भी कांग्रेस ने इस मामले पर बहस से किनारा किया, फिर बाद में कांगे्रस को अचानक क्या सूझी कि वह वहस में भाग लेने को तैयार हो गई। लेकिन कांग्रेस पहले से यह जानती थी कि हमारे द्वारा लगाए गए आरोपों में उतना दम नहीं है, जितना हमने प्रदर्शित कर दिया है।

वर्तमान में कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से अपने बचाव की मुद्रा में खड़ी दिखाई देती है। ललित मोदी के बहाने बहुत सारे मामले खुलकर सामने आने लगे, तब कांग्रेस के नेताओं के चेहरे देखने लायक थे। वास्तव में कांग्रेस के पास उन सवालों का कोई जवाब नहीं हैं, जो उनके शासनकाल की देन हैं। कौन नहीं जानता कि ललित मोदी को जितनी छूट कांग्रेस शासनकाल के दौरान दी गई, उतनी किसी ने नहीं दी। भाजपा ने तो केवल मानवीयता के आधार पर बीमार पत्नी को देखने की इजाजत दी थी। इस बात को स्वयं कांग्रेस भी स्वीकार करने लगी है कि भाजपा को यह मानवीयता छुपकर नहीं करना चाहिए। सरेआम करनी चाहिए। कांगे्रस के राहुल गांधी ने खुद यह बात कही है।

जहां तक ललित मोदी के प्रकरण की बात है तो यह तो सारे राजनीतिक विश्लेषक जानते हैं कि यह प्रकरण इतना बड़ा नहीं है जितना प्रचारित किया गया है, इससे बड़े प्रकरण देश ने देखे हैं, वह भी कांग्रेस शासनकाल के दौरान देखे हैं। कांग्रेस ने उस समय देश भाव के साथ कार्यवाही की होती तो शायद एंडरसन और क्वात्रोची भारत से भागने में सफल नहीं हो पाते। इस बात को पूरा देश जानता है कि क्वात्रोची सोनिया गांधी के नजदीकी रिश्तेदार हैं। इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि क्वात्रोची के करीबियों ने ही उसको भगाने में सहायता की होगी।

संसद में जब बहस की बारी आई तो कांग्रेस की तरफ से जो दलीलें दी गईं उससे प्रथम दृष्टया तो यही लगा कि कांग्रेस ने इस प्रकरण का गहनता से अध्ययन नहीं किया था। अगर कांग्रेस के नेता अध्ययन करके जाते तो पहले तो इस मुद्दे को इतना बड़ा नहीं बनाते और अगर बना ही दिया था तो कांग्रेस के समक्ष इस प्रकार के हालात पैदा नहीं होते। पूरी की पूरी कांग्रेस मंडली की आवाज बन्द ही हो गई। केन्द्र सरकार की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बारे में यह तो कहना ही पड़ेगा कि वह किसी बात को तब ही बोलतीं हैं, जब उसके बारे में पूरा अध्ययन हो। संसद में दिया गया सुषमा स्वराज का बयान निश्चित ही राजनीतिक परिपक्वता को चरितार्थ करता दिखाई देता है।

वर्तमान राजनीति में जिस प्रकार का वातावरण दिखाई दे रहा है, उससे संसद की उपादेयता पर भी सवाल उठने लगे हैं। कहा जाने लगा है कि संसद का अगर यही काम है तो संसद होने के मायने क्या हैं। कांग्रेस पर भी यह सवाल उठ रहे हैं कि जब कांग्रेस को बहस में हिस्सा लेना ही था, तब संसद सत्र के इतने दिन खराब क्यों किए। इन दिनों में जो पैसा व्यय हुआ क्या उसकी भराई की जा सकती है। इस अवधि में संसद विधेयक पारित हो सकते थे, जो नहीं हो सके। हो सकता है कि यह विधेयक देश हित में ही होते। जहां तक वस्तु एवं सेवा कर विधेयक की बात है तो इसके बारे में यही कहा जा रहा है कि इस विधेयक के लागू हो जाने से देश में महंगाई पर लगाम लगाई जा सकती थी। कांगे्रस की भूमिका को लेकर संभवत: यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस शायद यह नहीं चाहती कि देश से महंगाई का दौर समाप्त हो। अगर महंगाई कम हो जाएगी तो कांगे्रस को सरकार को घेरने का मुद्दा भी नहीं मिलेगा। कांग्रेस की वर्तमान राजनीति को देखकर यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस केवल विरोध करने के लिए राजनीति करने का खेल खेल रही है। कांग्रेस ने कई बार ऐसा प्रदर्शित भी किया है कि उसे देश की चिन्ता बिलकुल नहीं है, फिर चाहे वह रामसेतु को तोडऩे का मामला हो या फिर देश के मानबिन्दुओं का। कांग्रेस ने हमेशा देश के एक वर्ग को ही खुश करने की कोशिश की। जो पूरी तरह से देश के साथ खिलवाड़ ही कहा जा सकता है।

 

सुरेश हिन्दुस्थानी

1 COMMENT

  1. लोगों की आँखों में अब भी पर्दा लगा हुआ है. भाजपा और मोदी की अँध भक्ति में लोग संसद की पुरानी कार्रवाई.यों को भूल रहे हैं . पिछले सालों में भी विपक्ष ने कई बार संसद में बहस होने से रोका है . लेकिन तब सत्ता में काँग्रेस थी – अब विपक्ष में कांग्रेस है. यह विरोध काँग्रेस के प्रति हतब भी था अब भी है लेकिन संसद का तो वहीं हाल रहा है. आज के माहौल में केवल काँग्रेस पर वार करना ही मीडिया और भाजपा का काम रह गया है. सच्चाई की तरफ देखने की कोई जरूरत नहीं समझता.

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