राजनीति

राजस्थान में बीजेपी के बजाय आपस में ही लड़ती कांग्रेस

– राकेश दुबे

राजस्थान कांग्रेस आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसकी सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसकी अपनी उलझती हुई आंतरिक राजनीति है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र रखते हैं, लेकिन इन दोनों बड़े नेताओं की शक्तियों के समन्वय में खालीपन देखते हुए प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने खुद को ताकतवर दिखाना करना शुरू किया है। हालांकि उनके साथ विधायकों का संख्या बल शून्य है, लेकिन प्रदेश कांग्रेस की कमान उनके हाथ होने के कारण वे खुद को दमदार मानने लगे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कांग्रेस में जूनियर नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं बड़े नेताओं से डराती रही और गुटीय समीकरण संगठनात्मक हितों पर हावी रहे, तो पार्टी के लिए चुनौती और कठिन हो जाएगी। राजस्थान कांग्रेस का भविष्य अंततः इस बात पर निर्भर करेगा कि वह व्यक्तिगत संघर्ष की राजनीति से निकलकर सामूहिक नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि की ओर कितनी जल्दी बढ़ती है।

प्रदेश अध्यक्ष गुटबाजी के तीसरे केंद्र 

गोविंद सिंह डोटासरा शुरू में अशोक गहलोत खेमे के थे। गहलोत ने ही अपनी सरकार में उनको राज्य मंत्री बनाया और प्रदेश अध्यक्ष भी उन्हीं की मेहरबानी से बने। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत दिखाने का प्रयास किया। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते कार्यकर्ताओं के बीच सक्रियता ने उन्हें इस जोश से भर दिया है कि वे खुद को सचिन पायलट और अशोक गहलोत से बी ज्यादा बड़ा नेता मानने लगे हैं। आज राजस्थान कांग्रेस में वे खुद को तीसरे शक्ति केंद्र के रूप में दिखाने के प्रयास करते देखे जाते हैं। गहलोत और पायलट के बीच चल रही अनवरत प्रतिस्पर्धा के बीच वे खुद को खड़ा करते दिखते हें।  उनके समर्थकों का मानना है कि पार्टी को केवल दो नेताओं के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए। कुल मिलाकर डोटासरा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में एक स्वतंत्र धुरी के रूप में खुद को देख रहे हैं।

गहलोत और पायलट ही वजनदार

अशोक गहलोत और सचिन पायलट के संबंध पहले की तुलना में सार्वजनिक रूप से अधिक संयमित दिखाई देते हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। दोनों नेता खुली टकराव की राजनीति से बच रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व भी सार्वजनिक विवादों को नियंत्रित रखना चाहता है। गहलोत अभी भी राजस्थान कांग्रेस के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं तथा विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के बीच उनका मजबूत नेटवर्क है। दूसरी ओर सचिन पायलट युवाओं, पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ नए नेताओं के बीच अपनी अलग लोकप्रियता बनाए हुए हैं। पर्यवेक्षकों का मानना है कि दोनों नेताओं ने फिलहाल संघर्ष को विराम दिया है, लेकिन नेतृत्व और भविष्य की भूमिका को लेकर अंतर्निहित प्रतिस्पर्धा बरकरार है। आगामी चुनावों के मद्दे नज़र दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता भी है। इसलिए वर्तमान स्थिति को “संघर्ष विराम” कहा जा सकता है, न कि पूर्ण राजनीतिक सामंजस्य।

आलाकमान को कोई परवाह नहीं

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस आलाकमान की प्राथमिकताएं वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर अधिक केंद्रित हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि कांग्रेस आलाकमान द्वारा दखल नहीं देने से राजस्थान कांग्रेस में दुराव बढ़ता जा रहा है। परिहार कहते हं कि कई राज्यों में संगठनात्मक चुनौतियों और चुनावी मुकाबलों में उलझा कांग्रेस आलाकमान राजस्थान के आंतरिक विवाद को शायद प्राथमिकता नहीं मान रहा है। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया कहते हैं कि शायद कांग्रेस नेतृत्व को लगता है कि गहलोत, पायलट और डोटासरा जैसे नेता अंततः पार्टी के भीतर ही रहेंगे और कोई बड़ा विभाजन नहीं होगा। इसलिए वह अत्यधिक हस्तक्षेप से बचता दिखाई देता है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक परिहार मानते हैं कि कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व शैली अब पहले जैसी निर्णायक नहीं रही, जिससे राज्य इकाइयों को अधिक स्वतंत्रता मिली है। इसके नकारात्मक परिणाम कई बार सामने आए हैं। परिहार कहते हैं कि जब शीर्ष नेतृत्व स्पष्ट संदेश नहीं देता, तब स्थानीय नेता अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने में लग जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार चोटिया कहते हैं कि  राजस्थान कांग्रेस में विवाद का स्थायी समाधान शायद ही कभी निकल पाए।

आखिर इतना घमासान क्यों है

राजस्थान कांग्रेस में घमासान की जड़ लंबे समय से चली आ रही नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा है। सन 2018 में सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच शक्ति संघर्ष खुलकर सामने आया था। सत्ता गंवाने के बाद यह संघर्ष समाप्त होने के बजाय नए रूप में सामने आया है। संगठन और विधायकों के बीच प्रभाव बनाए रखने की होड़ लगातार जारी है। अशोक गहलोत राजस्थान कांग्रेस में निर्विवाद रूप से सबसे बड़े नेता हैं। सचिन पायलट दूसरे नंबर पर और गोविंद सिंह डोटासरा पद पर हैं, तब तक ही नेता हैं, कद से नेता कतई नहीं। कई नेता मानते हैं कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है, जिससे असंतोष बढ़ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता में रहते हुए जो मतभेद बने थे, वे विपक्ष में आने के बावजूद वे अधिक तीखे रूप में सामने आ रहे हैं। यही कारण है कि छोटी-छोटी राजनीतिक घटनाएं भी बड़े विवाद का रूप ले लेती जा रही हैं और कांग्रेस लगातार आंतरिक संघर्ष की खबरों में बनी हुई है।

कांग्रेस राजस्थान में कैसे जीतेगी

अगले विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी एक संगठित चुनावी मशीनरी के साथ मैदान में उतरने की तैयारी करती दिख रही है, जबकि कांग्रेस को पहले अपने आंतरिक मतभेद सुलझाने होंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कांग्रेस समय रहते इन अंतर्विरोधों को नहीं सुलझाती, तो बीजेपी के सामने उसकी चुनौती कमजोर पड़ सकती है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार का यह भी मानना है कि चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस को सामूहिक नेतृत्व का मॉडल अपनाना होगा, जिसमें गहलोत का अनुभव, पायलट की जनस्वीकार्यता और डोटासरा एक साथ काम करें। पार्टी को स्थानीय मुद्दों, किसान, युवा, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडा भी प्रस्तुत करना होगा। परिहार कहते हैं कि राजस्थान में कांग्रेस पार्टी के लिए केवल भाजपा विरोध के आधार पर चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। यदि कांग्रेस समय रहते एकजुटता का संदेश देने में सफल रहती है, तो राजस्थान की पारंपरिक सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्ति उसके पक्ष में जा सकती है। लेकिन आंतरिक संघर्ष जारी रहा, तो चुनावी नुकसान अभी से तय माना जाना चाहिए।