ओंकारेश्वर पांडेय
साल 2025 विदा हो रहा है लेकिन दिल्ली-एनसीआर समेत कई राज्यों के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए नया साल उम्मीद नहीं बल्कि वित्तीय बोझ, अनिश्चितता और नई चुनौतियाँ लेकर आ रहा है। दिल्ली समेत पूरे भारत में प्रदूषण नियंत्रण को वाजिब और कारगर तरीकों से रोकने में नाकाम सरकार अब जनता की कारों पर ठीकरा फोड़ रही है। दिल्ली सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर जो कठोर नीतियां लागू की हैं—चाहे वह बिना वैध PUCC के ईंधन न मिलना हो या बाहरी वाहनों के लिए केवल BS-VI का अनिवार्य प्रवेश—ये नीतियां सतही तौर पर पर्यावरण हितैषी लगती हैं लेकिन वास्तव में यह लाखों आम नागरिकों पर अन्यायपूर्ण दंड और वाहन निर्माता कंपनियों को दिया जा रहा अप्रत्यक्ष इनाम है।
ये नीतियाँ वैज्ञानिक समाधान कम और आम जनता की जेब पर ‘सरकारी डकैती’ अधिक जान पड़ती हैं। दिल्ली की हवा आज भी ‘गंभीर’ (Severe) श्रेणी में है लेकिन सरकार का पूरा जोर धूल और पराली की बजाय उन कारों को सड़कों से हटाने पर है, जो मध्यम वर्ग की जीवन भर की जमापूंजी से खरीदी गई हैं।
आँकड़ों का सच और मध्यम वर्ग पर मार
इन नीतियों का सीधा असर दिल्ली-एनसीआर के करोड़ों लोगों पर पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश समेत अनेक राज्यों के वे मध्यमवर्गीय परिवार, जिन्होंने कर्ज लेकर अपनी पहली कार का सपना संजोया था, उन्हें आज अपराधी की तरह देखा जा रहा है।
- 5 लाख से अधिक कारें अब तक स्क्रैप की जा चुकी हैं।
- 12 लाख बाहरी वाहनों का दिल्ली में प्रवेश वर्जित है क्योंकि वे BS-VI मानक के नहीं हैं।
- 30 लाख वाहन मालिक अगले कुछ महीनों में अपनी वैध – फिट गाड़ियों को खोने के कगार पर हो सकते हैं
एक कार पर औसतन 5 सदस्यों की निर्भरता के गणित से सीधे तौर पर डेढ़ करोड़ लोग पीड़ा में
- ‘No PUCC, No Fuel’ जैसे कठोर नियम और ANPR कैमरों के जरिए निगरानी ने सड़कों को जेल बना दिया
तकनीक का ‘शॉर्टकट‘ या नियोजित साजिश?
दशकों पहले एक कार की औसत आयु 20-25 साल होती थी। आज तकनीक के विकास के साथ इसे लंबा होना चाहिए था लेकिन इसे घटाकर 10-15 साल कर दिया गया है। इसे तकनीकी जगत में ‘Planned Obsolescence’ (नियोजित अप्रचलन) कहा जाता है। यह कंपनियों के लिए मुनाफा बढ़ाने का तरीका है।
सबसे बड़ा विरोधाभास
आम जनता को जिन BS-IV और BS-V कारों को सरकार ने खुद “पर्यावरण-अनुकूल” बताकर बेचा था, आज उन्हें ही “प्रतिबंधित” क्यों किया जा रहा है? अगर ये कारें प्रदूषण फैला रही हैं,अगर तकनीक खराब थी, तो दोषी निर्माता कंपनियां होनी चाहिए थीं, न कि ग्राहक। तो क्या किसी कंपनी पर ‘दोषपूर्ण तकनीक’ के लिए कार्रवाई हुई? जवाब है—बिल्कुल नहीं। गलती ग्राहक की बताई जा रही है, कंपनी की नहीं लेकिन जुर्माना और जब्ती केवल ग्राहक की किस्मत में है।
वैश्विक उदाहरण: फिटनेस बनाम उम्र
दुनिया क्या कर रही है? हम कहाँ खड़े हैं? भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहाँ केवल ‘आयु’ (Age) के आधार पर फिटनेस तय होती है। दुनिया भर के विकसित देश निजी संपत्ति और नागरिक अधिकारों का सम्मान करते हैं:
- अमेरिका और यूरोप: यहाँ 20-30 साल पुरानी कारें भी सड़कों पर दौड़ती हैं, बशर्ते वे वार्षिक ‘एमिशन टेस्ट’ पास करें। वहाँ नियम ‘फिटनेस’ पर है, ‘उम्र’ पर नहीं।
- सिंगापुर और जर्मनी: यहाँ पुरानी कारों को सहेजने के लिए विशेष ‘विंटेज’ या ‘क्लासिक’ श्रेणी दी जाती है, न कि उन्हें हाइड्रोलिक प्रेस में डालकर कुचला जाता है।
- भारत अकेला ऐसा देश है जहाँ केवल ‘जन्म प्रमाण पत्र’ के आधार पर फिट गाड़ी को कबाड़ घोषित किया जाता है।
- यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और निजी संपत्ति के अधिकार का खुला उल्लंघन है।
भारत में सरकार ‘फिटनेस टेस्ट’ को पारदर्शी बनाने में विफल रही, इसलिए उसने सबसे आसान रास्ता चुना—गाड़ियों को ही खत्म कर देना।
झूठे निशाने: असली अपराधी कौन?
दिसंबर 2025 की ताज़ा रिपोर्ट्स और IIT कानपुर के अध्ययन (2015) से लेकर हालिया डेटा तक, सच यह है कि पेट्रोल कारों का प्रदूषण में योगदान मात्र 2% से 5% है। दिल्ली की हवा में असली ज़हर उद्योगों का धुआँ, सड़कों की उड़ती धूल (35-60%) और थर्मल पावर प्लांट की सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) है। सरकार ने जुलाई 2025 में 78% कोयला संयंत्रों को प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाने से छूट दे दी लेकिन एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की 10 साल पुरानी डीजल कार उसे ‘मौत का सौदागर’ नजर आती है।
स्क्रैपिंग नीति: आपदा में अवसर?
ईंधन स्टेशनों पर तेल देने से मना करना और बिना फिटनेस जाँच के गाड़ियाँ जब्त करना मौलिक अधिकारों का हनन है। सरकार कहती है “इलेक्ट्रिक वाहन (EV) अपनाओ” लेकिन सब्सिडी कम कर दी गई है। पुरानी कार की कीमत ‘कौड़ियों’ में है और नई EV की कीमत ‘आसमान’ पर। क्या सरकार ‘पुरानी कार लो, नई ईवी दो’ जैसी कोई मुफ्त विनिमय नीति लाएगी? जवाब है—नहीं।
वैज्ञानिक शोध का अकाल और ‘आउटडेटेड‘ नीतियां
सवाल यह है कि ये नीतियां किस आधार पर बनाई जा रही हैं? भारत में आज भी वाहन नीतियां 2015 के आईआईटी कानपुर के पुराने आंकड़ों या पुराने पड़ चुके ‘सोर्स अपोर्शन्मेंट’ अध्ययनों पर टिकी हैं। विकसित देशों (अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन) में हर 24 से 36 महीनों में स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थाएं प्रदूषण के स्रोतों का गहन ऑडिट करती हैं। हमारे यहाँ संबंधित मंत्रालय (MoEFCC और MoRTH) केवल ‘डेस्क रिसर्च’ और कंपनियों के डेटा पर भरोसा करते हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को भी अक्सर वास्तविक डेटा के अंधेरे में रखा जाता है। सड़क निर्माण की धूल और औद्योगिक उत्सर्जन पर कार्रवाई करने के बजाय कारों को आसान निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे सड़क पर दिखती हैं और मध्यम वर्ग चुपचाप चालान भरता है।
बजट का सच और ‘मिशन LiFE’ की विफलता
सरकारी विज्ञापनों में ‘मिशन LiFE’ और प्रदूषण नियंत्रण के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन हकीकत यह है कि इन विभागों को आवंटित बजट का 25-30% हिस्सा हर साल बिना खर्च किए (Unspent) वापस चला जाता है। पर्यावरण शोध, जागरूकता (Advocacy) और पुरानी कारों को ईवी (EV) में बदलने के लिए कोई ‘मुफ्त विनिमय नीति’ या ठोस बजट प्रावधान नहीं है। सारा जोर केवल ‘दंड’ पर है।
जनता पर प्रहार बंद हो
दिल्ली का 50% प्रदूषण धूल भरी सड़कों, अवैध खनन और पराली से आता है, लेकिन वहां सरकारी तंत्र पंगु हो जाता है। मध्यम वर्ग वोट बैंक मात्र नहीं है; वह देश की आर्थिक रीढ़ है। सरकार को चाहिए कि वह उम्र के बजाय ‘फिटनेस’ आधारित नीति लाए और ‘ईवी’ अपनाने के लिए पुरानी कारों का पूरा मूल्य सब्सिडी के रूप में दे। जनता को सज़ा देकर नहीं बल्कि वैज्ञानिक समाधानों और ईमानदार रोड इंजीनियरिंग के माध्यम से ही दिल्ली की हवा साफ हो सकती है।
नीतिगत क्रूरता का अंत अनिवार्य
दिल्ली-एनसीआर की जनता अब इसे केवल पर्यावरण नीति नहीं, बल्कि ‘वाहन माफिया’ और ‘सरकार’ का गठजोड़ मान रही है। जब तक सड़कों से धूल नहीं हटेगी, जब तक सार्वजनिक परिवहन (मेट्रो और बसों) का जाल हर गली तक नहीं पहुँचेगा, तब तक निजी कारों पर प्रतिबंध केवल ‘छलावा’ है। मध्यम वर्ग वोट बैंक मात्र नहीं है. वह देश की रीढ़ है। अगर इस रीढ़ को बार-बार लोन और नई कारों के बोझ से तोड़ा गया तो 2026 का सूरज सरकार के लिए राजनीतिक रूप से अंधकारमय हो सकता है।
ओंकारेश्वर पांडेय