लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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विजय कुमार

आखिर शर्मा जी ने राजनीति के अखाड़े में उतरने का निश्चय कर ही लिया। वैसे तो अनशन पर बैठने से पहले ही वे इसकी योजना बना चुके थे; पर घोषणा के लिए थोड़ा वातावरण बनाना जरूरी था। इसलिए कुछ दिन अनशन भी करना पड़ा। यह अच्छा हुआ कि अनशन तुड़वाने के लिए दो-तीन खास लोग आ गये। इससे मीडिया में कुछ स्थान भी मिल गया।

– तो शर्मा जी, अब राजनीति कब से शुरू कर रहे हैं ?

– अभी तो कुछ दिन स्वास्थ्य लाभ करना है। मुझे तो अनशन का लम्बा अनुभव है; पर मेरे साथी इस चक्कर में पहली बार ही फंसे हैं। उन्हें लग रहा था कि सरकार इस बार भी झुक जाएगी; पर सरकार ने तो घास ही नहीं डाली। फिर मीडिया ने भी पहले जैसा साथ नहीं दिया। इसलिए उन सबकी हालत खस्ता है। वे कुछ ठीक हो जाएं, तब देखेंगे।

मुझे भी लगा कि शर्मा जी के कमजोर तन और घायल मन, दोनों को आराम चाहिए। कुछ दिन बाद जब मैं उनके घर पहुंचा, तो वहां उनके साथियों की बैठक चल रही थी। अरविन्द खेजड़ीताल, मनीष पिसौदिया, गोपाल हाय, किरण भेदी, कुमार अविश्वास, प्रशांत दूषण आदि सभी प्रमुख लोग वहां थे। वातावरण काफी गरम था।

एक – सबसे पहले हमें अपने दल का नाम तय करना होगा।

दूसरा – हमने कहा है कि दल का नाम जनता ही तय करेगी। इसलिए इसे जनता पर ही छोड़ देते हैं।

तीसरा – पर यदि दल का नाम नहीं होगा, तो हम जनता के बीच जाएंगे कैसे ?

चौथा – इसलिए पहले जनता के बीच जाकर नाम तय कर लें।

पहला – जनता तो सड़कों पर रहती है। तो क्या हम भी सड़क पर जाकर बैठ जाएं ?

दूसरा इस बात से नाराज था कि मीडिया वाले उसे पहले वाले की अपेक्षा अधिक महत्व क्यों नहीं देते। इसलिए वह गुस्से में बोला – अब तक तो हम जनता के बीच ही बैठे थे। इसलिए फिर बैठने में क्या नुकसान है ?

पहला – पर इस बार जनता ने हमें समर्थन नहीं दिया। इसलिए तो वहां से बिस्तर समेटना पड़ा।

दूसरा – तो चुनाव में जनता समर्थन देगी, इसकी क्या गारंटी है ?

शर्मा जी ने बात बिगड़ते देखी, तो बीच-बचाव करा दिया। अंततः तय हुआ कि दल का नाम अगली बैठक में तय करेंगे; पर दल के संविधान के बारे में कुछ मोटी-मोटी बातें तय कर ली जाएं।

तीसरा – संविधान तो सब दलों का लगभग एक सा ही होता है। पहला – नहीं, हमारा संविधान सबसे अलग होगा। वरना हम उनसे अलग कैसे दिखेंगे ?

दूसरा – क्यों न किसी एन.जी.ओ को इसका ठेका दे दें ? वह फेसबुक पर सर्वेक्षण कर दल का नाम और संविधान बना देगा।

पांचवा – मेरी राय में दल के नाम और संविधान से भी अधिक जरूरी है कि हम अगले चुनाव के लिए प्रत्याशी तय करें। यदि अभी से ऐसा हो गया, तो हमारी बढ़त बन जाएगी। चुनाव का क्या भरोसा; वे 2014 की बजाय 2013 में भी हो सकते हैं ?

दूसरा – पर प्रत्याशियों के लिए कुछ नियम और योग्यताएं तो तय करनी ही होंगी। वरना सैकड़ों लोग टिकट मांगने लगेंगे।

चौथा – विधानसभा के लिए एक सप्ताह और लोकसभा के लिए पन्द्रह दिन के अनशन का अनुभव और हिम्मत तो होनी ही चाहिए।

पहला – अब हमें अनशन नहीं करना। इसलिए अनशन करने वाले नहीं, चुनाव में जीत सकें, ऐसे प्रत्याशी तय करने होंगे।

दूसरा – चुनाव तो जाति, क्षेत्र, भाषा और धर्म के आधार पर जीते जाते हैं। धनबल और बाहुबल की भी जरूरत पड़ती है। अंतिम समय में कुछ खाने-पीने का भी प्रबंध करना होता है ?

तीसरा – नहीं, हम यह सब नहीं करेंगे। यदि यही करना है, तो फिर इस आंदोलन की जरूरत ही क्या थी ?

चौथा – तो फिर ?

पहला – यही तय करने के लिए तो बैठक हो रही है।

उनकी बहस और सिर फुटव्वल देखकर मैं पानी पीने के बहाने बाहर आ गया। कुछ देर में बातों का स्वर काफी ऊंचा हो गया। मुझे लगा है कि बस अब निर्णय होने को ही है; पर तभी शर्मा जी भी बाहर आ गये।

– क्यों, शर्मा जी; कुछ निर्णय हुआ ?

– मुझे नहीं लगता कि ये लोग किसी निर्णय पर पहुंच सकेंगे। अभी तो ये लोग आपस में ही लड़ रहे हैं। यदि ऐसे ही चलता रहा, तो भ्रष्टाचार और कांग्रेस से कैसे लड़ेंगे ?

– शर्मा जी, आपको यह गलतफहमी कैसे हो गयी कि यह आंदोलन कांग्रेस के विरुद्ध है ?

– क्यों, भ्रष्टाचार की जननी तो कांग्रेस ही है।

– यह तो ठीक है; पर यदि आप राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ेंगे, तो कांग्रेस विरोधी वोट बंटने से लाभ तो उसे ही होगा।

– अच्छा, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था।

– तो अब सोच लीजिये। असल में जो लोग आपको कंधे पर उठाकर घूम रहे हैं, उनका एजेंडा कांग्रेस को लाभ पहुंचाना ही है; पर अब जनता उनके भ्रष्टाचार विरोधी मुखौटे के पीछे छिपे असली चेहरे को पहचान गयी है। इसलिए आपको यदि अपनी इज्जत बचानी है, तो इन धोखेबाजों का साथ छोड़ दें।

– यानि अब इनसे अलग हटकर ही मुझे कुछ करना होगा।

– हां; पर एक बात ध्यान रहे कि अब अनशन बिल्कुल मत करना।

शर्मा जी नाराज होकर फिर अंदर चले गये और अपनी टीम को ही भंग कर दिया।

2 Responses to “राजनीति के अखाड़े में”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    व्यंग्य या कार्टून पर टिप्पणी करना आसान नहीं होता,पर जब आपका व्यंग्य या कार्टून सीधे सीधे आपकी राजनैतिक विचार धारा का मुखौटा बन जाता है तो न वह व्यंग्य रहता है,न कार्टून.वह एक घटिया स्तर का वकवास बन कर रह जाता है.

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  2. सन्जय कुमार श्रीवास्तव

    कम से कम आप जैसे विचारक से ये आशा नही थी कि आप इस तरह का लेख लिखिगे !! यदि किसी के साथ मतभेद है भी तो हमे उनके विचारो का भी सम्मान कारना चाहिये!!

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