विदेश नीति में प्रबल होता भारत।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा एससीओ यानी शंघाई कोऑपरेशन
ऑर्गनाइजेशन की बैठक में शामिल होने से देश के अंदर इसको जानने की उत्सुकता बढ़ी
है कि आखिर यह कहाँ है और इसका क्या उद्देश्य है। तो आइए इसपर हम चर्चा कर
लेते हैं। यह विदेश नीति के आधार पर भारत के लिए बहुत ही अहम एवं प्रबल बैठक है।
यह बैठक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित हो रही है। ऐसे में यह जिज्ञासा
लोगों के जेहन में हो रही है कि आखिर एससीओ है क्या, इसका गठन कब हुआ और
इसके उद्देश्य क्या हैं, तथा भारत को इससे क्या लाभ होगा? चलिए हम आपको एक-
एक कर क्रमवार इस विषय को पूर्ण रूप से स्पषट करने का प्रयास करते हैं जिससे की
भारत के सभी नागरिक को इस संदर्भ में पूर्ण रूप से जानकारी प्राप्त हो सके।
यह बात है अप्रैल 1996 की जिसमें शंघाई में हुई एक बैठक में चीन, रूस,
कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजाकिस्तान आपस में एक-दूसरे के नस्लीय और
धार्मिक तनावों से निबटने के लिए सहयोग करने पर राजी हुए थे। तब इसे शंघाई के
नाम से जाना जाता था। परन्तु, हम इसके मजबूत एवं प्रभावशाली कदम एवं कार्यों पर
यदि प्रकाश डालें तो एससीओ का जन्म 15 जून 2001 को हुआ। तब चीन, रूस और
चार मध्य एशियाई देशों कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजाकिस्तान और उजबेकिस्तान के
नेताओं ने शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना की और नस्लीय और धार्मिक चरमपंथ से

निबटने और व्यापार और निवेश को बढ़ाने के लिए समझौता किया। इस संगठन का
उद्देश्य नस्लीय और धार्मिक चरमपंथ से निबटने और व्यापार-निवेश जैसे मुद्दों को
बढ़ाना था। एक तरह से एससीओ (SCO) अमेरिकी प्रभुत्व वाले नाटो का रूस और चीन
की ओर से बड़ा जवाब था। हालांकि, 1996 में जब शंघाई इनिशिएटिव के तौर पर इसकी
शुरुआत हुई थी तब इस संगठन का उद्देश्य था कि मध्य एशिया के नए आजाद हुए
देशों के साथ लगती रूस और चीन की सीमाओं पर तनाव को कैसे रोका जाए, और किस
तरह से उन सभी सीमाओं को सुधारा जाए, साथ ही उन पर शांति हेतु पूर्ण रूप कैसे
नियंत्रण किया जाए। परन्तु, कहते हैं कि इरादे अगर मजबूत हो तो मंजिलें भी आसान
एवं अनुकूल हो जाती हैं। बड़े एवं अडिग प्रयासों के बाद इस बुलंदी को मात्र तीन साल
के अंदर ही इस संगठन ने काफी हद तक हासिल कर लिया। इसकी वजह से ही इसे
काफी प्रभावी संगठन माना जाता है। अपने उद्देश्य पूरे करने के बाद उजबेकिस्तान को
संगठन में जोड़ा गया और 2001 से एक नए संस्थान की तरह से शंघाई को-ऑपरेशन
ऑर्गनाइजेशन का गठन हुआ। साल 2001 में इस संगठन के कुछ उद्देश्य बदले गए
और इसका अहम मकसद ऊर्जा पूर्ति से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना और आतंकवाद से
लड़ना जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो गया वर्तमान समय में आज भी यह दोनों ही मुद्दे आज
तक बने हुए हैं। यदि हम शिखरवार्ता के पन्नों को पलटकर देखते हैं तो आज भी बड़ी ही
जोरदारी के साथ इन मुद्दों पर लगातार बातचीत एवं चर्चाएं होती है। अवगत करा दें कि
पिछले वर्ष शिखरवार्ता में यह तय किया गया था कि आतंकवाद से लड़ने के लिए तीन
साल का एक्शन प्लान बनाया जाए। विशेषज्ञों की राय में इसबार के शिखर सम्मेलन में
ऊर्जा का मामला ज़्यादा उभरकर आएगा।
ज्ञात हो कि भारत वर्ष 2017 में एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना। पहले
(2005 से) पर्यवेक्षक देश का दर्जा प्राप्त था। 2017 में एससीओ की 17वीं शिखर बैठक
में इस संगठन के विस्तार की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण के तहत भारत और
पाकिस्तान को सदस्य देश का दर्जा दिया गया। इसके साथ ही इसके सदस्यों की संख्या

आठ हो गयी। वर्तमान में एससीओ के आठ सदस्य चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान,
रूस, तजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान हैं। इसके अलावा चार ऑब्जर्वर
देश अफगानिस्तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया हैं। छह अन्य सहयोगी देश अर्मेनिया,
अजरबैजान, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका और तुर्की हैं।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है जोकि भारत को इस वार्ता का खास एवं
अहम बनाती है वह यह है कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में चीन, रूस के बाद
भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहा है।
एससीओ को इस समय दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है। भारतीय
हितों की जो चुनौतियां हैं, चाहे वह आतंकवाद हो अथवा ऊर्जा की आपूर्ति या प्रवासियों
का मुद्दा हो। यह सभी मुद्दे भारत और एससीओ दोनों के लिए बहुत ही अहम हैं
इसलिए कि यह समस्याएं सभी की हैं, इसलिए यह क्षेत्रीय संगठन उभरते हुए भारत के
लिए बहुत ही अहम है। जिसकी चुनौतियों से निपटने हेतु सभी देश एक दूसरे के कदम
से कदम मिलाकर चलने का मजबूत प्रयास कर रहें हैं। इस संगठन के द्वारा सभी प्रकार
की समस्याय़ओं के समाधान की कोशिशें मजबूती के साथ हो रही है। ऐसे में भारत के
जुड़ने से एससीओ और भारत दोनों को परस्पर फायदा होगा। मुख्य बात यह है कि
इसबार भारत पहली बार शंघाई सहयोग संगठन में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हो रहा
है। इस बार भारत अपने प्रयासों में पूर्ण रूप सफल हो गया। शंघाई सहयोग संगठन में
भारत को पूर्ण रूप से सदस्यता प्राप्त हो जाने के कारण अब भारत अपनी बात को
मजबूती के साथ प्रस्तुत कर सकता है साथ ही सभी संबन्धित देशों का उस ओर ध्यान
आकर्षित करा सकता है। सबसे बड़ा एवं अहम विषय यह है कि अब भारत किसी भी बड़े
एवं कड़े फैसले लेने हेतु सक्षम एवं प्रबल हो गया है। अब भारत को किसी भी देश के
सहयोग की आवश्यकता कदापि नहीं है। अब वह दिन दूर नहीं जब भारत स्वयं ही
अपनी कूटनीति एवं राजनीतिक संबन्धों के सहयोग से इस संगठन मुखिया बनकर
दुनिया के सामने उभरकर आएगा। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि इस संगठन में

शिखरवार्ता के दौरान कई द्विपक्षीय बातचीत भी होती हैं जैसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी रूस और चीन के राष्ट्रपति से मिलेंगे। भारत के प्रधानमंत्री की कोशिश यह भी
होगी कि आतंकवाद को लेकर उनके कड़े रुख़ को शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ
के सभी नेताओं का समर्थन भी मिले। यही वह सबसे बड़ी वजह है कि यह शिखर
सम्मेलन भारत के लिए काफी अहम रहेगा।
अतः इस संगठन के माध्यम से भारत विश्व के सामने एक मजबूत देश के रूप में
उभरकर सामने आएगा। आने वाले समय में भारत का प्रयास होगा कि वह इस संगठन
में सबसे मजबूत एवं प्रबल दावेदार बने साथ ही इस संगठन के माध्यम से विश्व को यह
संदेश भी जाए की भारत आज के समय में एशिया का सबसे मजबूत एवं मुखिया देश
है। जिसके बाद भारत की साख विश्व स्तर पर बड़ी मजबूती के साथ उभरकर सामने
आएगी।
राजनीतिक विश्लेषक।
(सज्जाद हैदर)

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