विकास की राजनीति ‘जाति‘ पर अटकी

संदर्भ:- अमित शाह द्वारा नरेंद्र मोदी को पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री बताना-

 

प्रमोद भार्गव

सबका साथ,सबका विकास जैसा समतामूलक और समावेषी नारा देने वाले नरेंद्र मोदी की राजनीति बिहार विधान चुनाव के परिप्रेक्ष्य में जातीय कुचक्र के वर्तुल घेरे में आ अटकी है। झारखंड विधानसभा चुनाव में भी मोदी ने जातीय राजनीति की बजाय विकास की राजनीति करने की आवाज बुलंद की थी और चुनावी बाजी जीत भी ली थी। लेकिन अब बिहार के चुनाव निकट आते-आते विकास को दरकिनार कर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मोदी की जाति को महिमामंडित करने का काम शुरू कर दिया है। शाह दावा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी ने नरेंद्र मोदी के रूप में देश को पिछड़े समाज से पहला प्रधानमंत्री दिया। यही नहीं सबसे ज्यादा पिछड़े मुख्यमंत्री,सांसद और विधायक भी भाजपा ने दिए। यह नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन के वजूद में आने के बाद ५१ फीसदी पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं को भरमाकर भाजपा की और खींचने का एक सियासी पांसा तो हो सकता है,लेकिन देश के सत्ताधारी दल के अध्यक्ष को इतना भान तो होना ही चाहिए कि देश के पहले पिछड़े वर्ग से प्रधानमंत्री मोदी नहीं कर्नाटक से आने वाले हरदन हल्ली देवगौड़ा थे,जिन्हें एचडी देवगौड़ा के नाम से जाना जाता है।

हमारे देश के सनातन मूल्यों में जातीय कुचक्र कितना मजबूत है,इसे अच्छे ढंग से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने परिभाषित किया है। उन्होंने कहा है कि ‘जाति‘ ब्राह्मणवादी व्यवस्था का कुछ ऐसा दुष्चक्र है कि हर जाति को अपनी जाति से छोटी जाति मिल जाती है। यह ब्राह्मणवाद नहीं है,बल्कि पूरी की पूरी एक साइकिल है। अगर यह जातिचक्र एक सीधी रेखा में होता तो इसे तोड़ा जा सकता था। यह वर्तुलाकार है। इसका कोई अंत नहीं है। यही वजह है कि धर्म और संप्रदाय के बीज-संस्कार जिस तरह से हमारे बाल अवचेतन में जन्मजात संस्कारों के रूप में बो दिए जाते हैं,कमोबेश उसी स्थिति में जातीय संस्कार भी नादान उम्र में ही अंतर्मन में उड़ेल दिए जाते हैं। दुनिया में फैलता इस्लामिक आतंकवाद धर्म आधारित इसी बीज-संस्कार की देन है। गोया,इस तथ्य को एकाएक नहीं नकारा जा सकता है कि जाति एक चक्र है। यदि जाति चक्र न होती तो टूट गई होती।

जाति पर शायद पहला सबसे जबरदस्त कुठाराघात महाभारत काल के भौतिकवादी ऋषि चार्वाक ने किया था। उनका दर्शन  था,‘इस अनंत संसार में कामदेव अलंध्य हैं। कुल में जब कामिनी ही मूल है तो जाति की परिकल्पना किसलिए ? इसलिए संकीर्ण योनी होने से भी जातियां दुष्ट ,दूषित या दोषग्रस्त ही हैं। इस कारण जाति एवं धर्म को छोड़कर स्वेच्छार का आचरण करो।‘ गौतम बुद्ध ने भी जो राजसत्ता भगवान के नाम से चलाई जाती थी,उसे धर्म से पृथक किया। बुद्ध धर्म,जाति और वर्णाश्रित राज व्यवस्था को तोड़कर समग्र भारतीय नगरिक समाज के लिए समान आचार संहिता प्रयोग में लाए। चाणक्य ने जन्म और जातिगत श्रेष्ठता को तिलांजलि देते हुए व्यक्तिगत योग्यता को मान्यता दी। गुरूनानक देव ने जातीय अवधारणा को अमान्य करते हुए राजसत्ता में धर्म या जाति के उपयोग को मानवाधिकारों का हनन माना। संत कबीरदास ने जातिवाद को ठेंगा दिखाते हुए कहा भी,‘जाति‘ न पूछो साधु की,पूछ लीजियो ज्ञान,मोल करो तलवार का पड़ी रहने दो म्यान।‘महात्मा गांधी के जाति प्रथा तोड़ने के प्रयास तो इतने अतुलनीय थे कि उन्होंने अछूतोद्वार जैसे आंदोलन चलाकर ‘भंगी‘ का कार्य दिनचर्या में शामिल कर उसे आचरण में आत्मसात किया।

इतने सार्थक प्रयासों के बाद भी क्या जाति टूट पाई ? नहीं,क्योंकि कुलीन हिंदू मानसिकता जातितोड़क कोशिशों के समानांतर अवचेतन मे पैठ जमाए बैठे मूल से अपनी जातीय अस्मिता और उसके भेद को लेकर संघर्ष करती रही है। इसी मूल की प्रतिच्छाया हम पिछड़ों और दलितों में देख सकते हैं। मुख्यधारा में आने के बाद न पिछड़ा,पिछड़ा रह जाता है और न दलित,दलित। वह उन्हीं ब्राह्मणवादी हथकंडों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगता है,जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हजारों साल हथकंडे रहे हैं। लालू,मुलायम,नीतीश और मायावती ने यही किया और अब अमित शाह द्वारा पढ़ाए जा रहे नरेंद्र मोदी के जातीय-पाठ से यह संदेश साफ झलक रहा है कि बिहार में चुनावी जीत हासिल करने के लिए शाह-मोदी की जोड़ी ने जाति के आगे घुटने टेक दिए हैं। यह मंत्रणा सोची-समझी राजनीति का परिणाम है।

दरअसल बिहार में पिछड़े और अति पिछड़ों की आबादी करीब ५१ फीसदी है। लालू जहां इसमें १६ प्रतिशत मुस्लिम आबादी और वहीं नीतीश १६ फीसदी दलित और महादलितों का गठजोड़ करके पिछले ढाई दशक से सत्ता के खेल की बाजी जीतते रहे हैं। बिहार में सवर्ण १५ और आदिवासी व अन्य जातियां महज २ फीसदी हैं। लोकसभा चुनाव में मोदी मैजिक ने सभी तरह के जातीय व सांप्रदायिक समीकारणों को पलीता लगाते हुए ३१ सीटें जीत ली थीं। यह जीत राजग गठबंधन को  ३८.७७ फीसदी वोट हासिल करके मिली थी। जबकि संप्रग गठबंधन को २९.७५ फीसदी वोट मिले थे। इसमें नीतीश,लालू,कांग्रेस और राकांपा शामिल थे। चुनांचे भाजपा की दुविधा की शुरूआत राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल ;एकीकृत के महागठबंधन में तब्दील होने के बाद हुई। इस गठबंधन के वजूद में आने के बाद बिहार में जो भी उपचुनाव हुए तो बड़ी जीत इसी गठबंधन को मिली। इन परिणामों से राजग के रणनीतिकारों ने सहज ही अंदाजा लगा लिया कि बिहार में मोदी के तथाकथित विकास का जादू जातीय उभार के सामने टिकने वाला नहीं है। लिहाजा विकास की दृष्टि अंततः जातीय नफा-नुकसान पर आ टिकी। इसलिए बिहार में भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में कोई चेहरा पेश करने से पीछे हट गई और राजनीतिक चतुराई बरतते हुए बिहार भाजपा के चुनाव प्रभारी अनंत कुमार ने घोषणा कर दी कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा। भाजपा ने यह सावधानी इसलिए भी बरती,क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में वह मुख्यमंत्री के  रूप में किरण बेदी का नाम पेश करके करारी हार का मजा अरविंद केजरीवाल से चख चुकी थी। इस सावधानी की दूसरी वजह यह भी रही कि बिहार में तीखे जातीय समीकरणों के चलते एक जाति का उम्मीदवार,दूसरी जातियों के तल्ख प्रतिरोध का सबब बन सकता था।

हालांकि नरेंद्र मोदी को पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री घोषित करने से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बिहार के परिप्रेक्ष्य में जातीय राजनीति की रचना रचता रहा है। इस नजरिए से उसकी पहली नजर भूमिहरों पर रही। नतीजतन गिरीराज सिंह को केंदीय मंत्री-मंडल में लिया गया। हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका मृदुला सिन्हा को गोवा का राज्यपाल बनाया। रामधारी सिंह दिनकर के नाम का मोदी-मुख से उल्लेख इसी कड़ी का हिस्सा था। रामकृपाल यादव और राजीव प्रताप रूड़ी भी इसी  जातीय श्रृखंला का हिस्सा हैं। रामविलास पासवान तो राजग गठबंधन में पहले से ही हैं और अब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व महादलितों के प्रतिनिधि जीतनराम मांझी भी राजग का हिस्सा हैं।

नीतीश ने महादलितों की जातीय व्यूहरचना को जद का अविभाज्य अंग बनाने के उद्देश्य से मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला था,क्योंकि रामविलास पासवान के राजग में चले जाने के बाद दलित वोट लोकसभा चुनाव में राजग के खाते में चले गए थे। बिहार में दलित आबादी ६ प्रतिशत और महादलित आबादी १० फीसद है। लेकिन नीतीश ने फिर से मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा के चलते जिस तरह मांझी को सत्ता से बेदखल किया, वह चाल अब उलटी साबित हो रही है। क्योंकि विधान परिषद के चुनाव में लालू-नीतीश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष महागठबंधन को मुंह की खानी पड़ी है। ललितगेट एवं व्यापम घोटाले के चर्चा में बने रहने और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश,मंहगाई और अर्थव्यस्था में अपेक्षित सुधार न होने की वजह से यह धारणा बनी थी कि मतदाता का भाजपा नेतृत्व से मोहभंग हो रहा है। लेकिन विधान परिषद की २४ सीटों में से राजग द्वारा १४ सीटें जीत लेने से यह धारणा घ्वस्त हो गई। बावजूद भाजपा किसी मुगालते में नहीं रहना चाहती। लिहाजा उसने हर हाल में बिहार विधानसभा में जीत दर्ज कराने के लिए मोदी को पिछड़ा वर्ग का घोषित करके भारतीय राजनीति का परंपरागत जातीय दांव चल दिया है। बहरहाल,इस दांव के चंगे से यदि राजग को सफलता मिलती है,तो यही दांव अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा के होने वाले चुनाव में भी खेला जाएगा,जो मुलायम और मायावती की मुश्किलें बढ़ा सकता है। लेकिन इस जातीय दांव के चलने से नरेंद्र मोदी से अब यह उम्मीद टूट गई है कि वह जाति व संप्रदाय की राजनीति से भारत को मुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक पहल करेंगे ?

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