डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
अमेरिका की ‘दादागीरी’ और दबंगई पुरानी है। यह दुनिया भर में कम से कम सवा सौ साल से चल रही है। इस अवधि में और आक्रामकता आयी है। इसी दौरान दो बार विश्व युद्ध हुए। सोवियत संघ के रूप में दुनिया में दूसरी महाशक्ति बनी तथा उसका पराभव हुआ। कालान्तर में चीन बड़ी ताकत बना और वह अब भी ऐसा लगता है। बावजूद इसके, दुनिया बहुध्रुवीय हो गयी है जहाँ समय-समय पर अनेक गुट बनते, बढ़ते, बदलते और बिगड़ते रहते हैं; फिर भी अमेरिका को चुनौती देने की ताकत किसी एक क्या, कई देशों के समूहों तक में नहीं दिखती। वजह इन सबके निहित स्वार्थ हैं। नतीजतन, अमेरिका अब धौंस के साथ दुनिया का ‘खौफनाक दरोगा’ हो गया है। वह जब, जहाँ, जिस तरीके से चाहता है मनमानी करता है। ताजा मामला वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण और गिरफ्तारी का है। अचरज यह है कि अमेरिका यह सब लोकतंत्र और मानवाधिकार की रक्षा के नाम पर करता है! ऐसी स्थिति में भारत का मौन बहुध्रुवीय दुनिया की कसौटी पर है।
यह ठीक है कि इस वक़्त हमारा भारत “बड़ी आर्थिक शक्ति” बनने को अग्रसर है और इसके मद्देनज़र ‘सुरक्षात्मक नीति’ (डिफेंसिव पालिसी) आवश्यक होती है लेकिन चाहे वेनेजुएला की बात हो या, पड़ोसी बाँग्लादेश में हिन्दुओं की हत्या का मामला, भारत का मुखर होकर आगे न आना अनेक लोगों को खलता है और गरचे ऐसा न हो, तो हैरान अवश्य करता है क्योंकि भारत सदा से विश्व शान्ति का पक्षधर रहा है।
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दुनिया आज दिखने में तो भले बहुध्रुवीय हो चुकी है, लेकिन शक्ति सन्तुलन की असल तस्वीर बहुत असमान है। एक ओर अमेरिका है जो अपने हित में किसी भी देश की सत्ता–संरचना को पलट देने से कभी नहीं हिचकता, दूसरी ओर चीन–रूस–ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे देश हैं जो इस वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। यूरोपीय यूनियन के देश अमूमन अमेरिका के पिछलग्गू हैं। ऐसे समय में भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेज़ी से उभरती चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, पर अभी उसकी आवाज़ उतनी ‘मुखर’ नहीं दिखती। इसके कारणों पर विशेषज्ञों के दृष्टिकोण भिन्न हैं। हाँ, ज्यादातर का यह अवश्य मानना है कि भारत किसी को मौक़ा देने की चूक नहीं करना चाहता।
अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री को अपना मित्र कहते जरूर हैं परन्तु यह उनके ‘तंज’ जैसा ही है। असल में ट्रम्प भारत से खार खाये बैठे हैं। उन्होंने सोचा होगा कि भारत भी उनके पिछलग्गुओं की जमात में शामिल हो जाएगा किन्तु भारत ने मौजूदा नेतृत्व की स्पष्ट नीति से यह बता दिया है कि यह अब अपनी पुरानी नीति को तिलाञ्जलि दे चुका है। इससे ट्रम्प की बहाने की तलाश के साथ कूटनयिक कोशिशें और साज़िशें भले जारी हों, उन्हें भारत पर सीधे कोई कार्रवाई की कल्पना भी नहीं हो सकती। वजह साफ है कि भारत अब बड़ी आबादी वाला देश और बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, एक बड़ा बाजार है जिसके पेटे में पूरा चीन, अमेरिका जैसे चार और जनसंख्या में रूस की तरह 10 से अधिक देश समा जाएँगे।
मादुरो की गिरफ्तारी और अमेरिकी शक्ति :
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को 3 जनवरी (2026) की रात अमेरिकी विशेष बलों ने ‘डेल्टा फोर्स’ की अगुवाई में गुप्त अभियान के तहत राजधानी काराकस के एक सैन्य ठिकाने से पकड़ लिया और अमेरिकी जहाज़ पर ले जाकर उन्हें अपने यहाँ मुक़दमे के लिए बन्दी बना लिया। अमेरिका इसके पहले कम से कम चार बार विभिन्न देशों में ऐसी हरकत को अंजाम दे चुका है। 1901 में 23 मार्च को पहली बार उसने फिलीपींस के तत्कालीन राष्ट्रपति एमिलियो एगुइनाल्डो को एक सैनिक कार्रवाई में इसी प्रकार बन्दी बनाया था। उसके कोई 89 वर्ष बाद उसने 1990 में पनामा के मैनुएल नोरिएगा, 2003 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन और इसके अगले ही साल 2004 में हैती के राष्ट्रपति जीन बर्टेण्ड एरिस्टाइड को गिरफ्तार कर लिया। ये सारी कार्रवाइयाँ सम्बन्धित देशों की सम्प्रभुता के खिलाफ जाते हुए की गयीं। उनकी वजह कुछ भी बतायी गयी हो, मकसद केवल अमेरिकी कारोबार का विस्तार तथा उसके व्यावसायिक हितों को साधना रहा है। इसी तरह इस बार वेनेज़ुएला में भी हुआ है जहाँ निशाने पर उसका विशालतम पेट्रोलियम ‘तेल रिजर्व’ है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।
अमेरिका को दूसरे देशों पर या, उनके विरुद्ध ‘एक्शन’ के लिए हर बार किसी न किसी बहाने की जरूरत होती है। अबकी उसने निकोलस मादुरो पर ड्रग–तस्करी और अन्य अपराधों के आरोप लगाये हैं और अब उन पर अमेरिकी अदालत में मुकदमा शुरू हुआ है जहाँ ‘कथित सुनवाई’ की अगली तारीख़ 17 मार्च तय की गयी है। यह कार्रवाई केवल किसी एक नेता अथवा, देश के विरुद्ध अभियान नहीं, बल्कि उस सोच की मिसाल है जिसमें वाशिंगटन खुद को विश्व–न्यायाधीश मानकर किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र की सरकार में जब चाहे हस्तक्षेप कर सकता है। हालाँकि मादुरो की जगह उनकी विश्वस्त डेल्सी ने ले ली है पर डोनाल्ड ट्रम्प ने यह तक संकेत दिया है कि वेनेज़ुएला में “सुरक्षित राजनीतिक बदलाव” तक अमेरिका ही वहाँ की स्थिति को नियंत्रित करेगा, जो वस्तुतः एक प्रकार के संरक्षक–शासन की घोषणा है।
बहुध्रुवीय दुनिया या, नया शीतयुद्ध?
रूस, चीन, ईरान और लातीनी अमेरिका के कई देश पहले से अमेरिकी दबाव और प्रतिबन्धों से असन्तुष्ट हैं। अब एक निर्वाचित/मान्य राष्ट्राध्यक्ष को इस तरह उठा ले जाना अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था में और भी गहरा अविश्वास पैदा करता है। इससे दुनिया व्यवहारतः दो खेमों में बँटती दिखती है –एक खेमे में अमेरिकी शक्ति और उसके नज़दीकी सहयोगी, दूसरे में वे देश जो अपनी सम्प्रभुता पर ऐसे हस्तक्षेप से डरते या आहत महसूस कर रहे हैं। बहुध्रुवीयता का विचार तभी सार्थक होगा जब भारत जैसे देश खुलकर यह कह सकें कि किसी भी ताकत के लिए इस तरह की पकड़–धकड़ स्वीकार्य नहीं, चाहे निशाना वेनेज़ुएला हो या, कोई और। गौरतलब है कि यह शाश्वत सिद्धान्त है कि कहीं, विशेषकर किसी समानधर्मी के विरुद्ध किसी तरह के अन्याय का यदि आप विरोध नहीं करते तो निश्चित मानिए कि अगली बारी आपकी हो सकती है।
उल्लेख्य है कि डोनाल्ड ट्रम्प ने तीन दिन पहले ही कहा है कि भारत ने रूस से पेट्रोलियम तेल का आयात बन्द नहीं किया तो वे टैरिफ की दर बढ़ा सकते हैं। ट्रम्प ने पहले ही यह दर 25 से बढ़ाकर 50 फीसद कर रखी है।
बाँग्लादेश : अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर बढ़ती हिंसा :
इधर भारत के दरवाज़े पर ही बाँग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति लगातार असुरक्षित होती गयी है। 2024 में शेख हसीना के हटने के बाद देश में कई जगह हिंसक भीड़ ने हिन्दू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों पर हमले किये, मन्दिर तोड़े और घर जलाये; अगस्त 2024 की एक रिपोर्ट में दो हफ्तों के भीतर अल्पसंख्यकों पर दो हज़ार से ज़्यादा हमलों और कम से कम पाँच हिन्दुओं की हत्या का उल्लेख है। जनवरी से मार्च 2025 के बीच भी स्थिति सामान्य नहीं हो सकी; इस दौरान हिन्दुओं के विरुद्ध हत्या, बलात्कार, मन्दिर–विध्वंस और सम्पत्ति–लूट की 142 गम्भीर घटनाएँ दर्ज की गयीं। दिसम्बर 2025 में मारे गये हिन्दू युवकों दीपू चन्द्र दास और अमृत मण्डल, राणा प्रताप वैरागी जैसे उदाहरण बताते हैं कि यह केवल छिटपुट अपराध नहीं, बल्कि एक लम्बे समय से चलती आ रही संगठित नफरत का हिस्सा है।
भारत सरकार ने इस हिंसा पर “कड़ी निन्दा” और “लगातार शत्रुतापूर्ण माहौल” जैसी सख्त भाषा में बयान ज़रूर दिया, पर व्यावहारिक स्तर पर यह आपत्ति फिलहाल कूटनीतिक संवाद तक ही सीमित दिखती है। 18 दिसम्बर से 5 जनवरी तक “केवल 18 दिनों में छह हिन्दुओं की बर्बर हत्या” और एक हिन्दू महिला से बलात्कार जैसी घटनाएँ इसी सिलसिले की नयी और निन्दास्पद ‘कड़ी’ हैं, जो यह दिखाती हैं कि बाँग्लादेश में अल्पसंख्यक आज भी खुद को असुरक्षित और असहाय महसूस करते हैं।
भारत की मौन रणनीति : कारण और जोखिम :
भारत ने वेनेज़ुएला–प्रकरण एक तो अभी तक खुलकर आपत्ति नहीं की है। इसके मुख्य कारण हैं –अमेरिका के साथ बढ़ता रक्षा, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग, चीन–सीमा और हिन्द–प्रशान्त में अमेरिकी समर्थन की आवश्यकता, पश्चिमी बाज़ार और पूँजी पर आंशिक निर्भरता। …लेकिन बाँग्लादेश के मामले में भी भारत की नीति बहुत संयत रही है। समझ आता है कि भारत ढाका के साथ करीबी रिश्ते बनाये रखना चाहता है, क्योंकि सीमा–सुरक्षा, अवैध प्रवासन, चरमपन्थ और व्यापार–रास्तों के सन्दर्भ में बाँग्लादेश का सहयोग आवश्यक है। यदि भारत बहुत कठोर रुख अपनाये तो आशंका है कि बाँग्लादेश चीन या पाकिस्तान के क़रीब चला जाएगा। लेकिन यह भी देखना होगा कि इस “मौन रणनीति” के अपने बड़े जोखिम हैं –एक ओर तो भारत नैतिक नेतृत्व का दावा करता है, दूसरी ओर जब किसी देश की सम्प्रभुता या हिन्दुओं की जान पर सीधा हमला होता है, तब उसकी आवाज़ बहुत धीमी पड़ जाती है। यह अन्तर भारत की साख और दीर्घकालिक राष्ट्रीय–हित दोनों को चोट पहुँचा सकता है। सवाल यह है कि भारत को क्या करना चाहिए? इस सम्बन्ध में पाँच मुख्य बिन्दु समझ आते हैं।
स्पष्ट सिद्धान्त, संयमित भाषा की जरूरत :
भारत को यह सिद्धान्त स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए कि किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र के मान्य राष्ट्राध्यक्ष को बाहरी शक्ति द्वारा बलपूर्वक उठा ले जाना अन्तरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के खिलाफ है। यह बात सामान्य, पर साफ शब्दों में कही जा सकती है ताकि सन्देश यह जाए कि भारत किसी भी तरह की “रिज़ीम–चेंज” सैन्य कार्रवाइयों के खिलाफ है, भले ही वह अमेरिका जैसी शक्तिशाली सरकार ही क्यों न हो।
बहुध्रुवीयता को नारा नहीं, व्यवहार बनाना :
भारत को रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, इण्डोनेशिया, ईरान जैसे देशों के साथ मिलकर ऐसे मञ्चों पर (जैसे ब्रिक्स + “वैश्विक दक्षिण”) यह मुद्दा उठाना चाहिए कि कोई भी ताकत अपने इलाक़े से बाहर जाकर किसी राष्ट्राध्यक्ष को पकड़ने की परम्परा न डाले। साथ ही भारत वेनेज़ुएला जैसे देशों के साथ ऊर्जा और व्यापार में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाकर यह दिखा सकता है कि वह केवल एक धुरी तक सीमित नहीं है।
बाँग्लादेश पर साफ लाल–रेखा :
ढाका के साथ दोस्ती बरक़रार रखते हुए भी भारत तीन प्रकार का दबाव बना सकता है –हर हिंसक घटना पर विस्तार से जानकारी, एफआईआर, गिरफ़्तारी और सज़ा की प्रगति रिपोर्ट माँगना। पीड़ित हिन्दू, बौद्ध, ईसाई परिवारों के पुनर्वास, मुआवज़े और सुरक्षा के लिए विशेष तंत्र और कोष पर ज़ोर देना। यदि कुछ महीनों में सुधार न दिखे, तो चरणबद्ध ढंग से कुछ आर्थिक रियायतों या सहयोगी योजनाओं की समीक्षा करना, ताकि वहाँ की सतता– प्रतिस्पर्द्धा में यह साफ संकेत जाए कि अल्पसंख्यकों की रक्षा भारत–बाँग्लादेश रिश्तों की अनिवार्य शर्त है। अन्तरराष्ट्रीय मञ्चों पर भी भारत इस मुद्दे को “मानव–अधिकार और संवैधानिक प्रतिबद्धता” के रूप में उठा सकता है, ताकि यह केवल धार्मिक या दो–पक्षीय विवाद न रह जाए।
सीमावर्ती हिन्दुओं के लिए ठोस नीति :
भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि बाँग्लादेश में यदि किसी हिन्दू, बौद्ध, सिख या ईसाई समुदाय पर लगातार हमले हो रहे हैं तो उनके लिए कानूनी, पारदर्शी और नियंत्रित तरीके से शरण और नागरिकता का रास्ता मौजूद रहेगा। इससे दो लाभ होंगे –असली पीड़ितों को सुरक्षा और सम्मान मिलेगा,और अवैध आर्थिक प्रवासन से अलग एक मानवीय, सीमित दायरे की नीति बन सकेगी। साथ में सीमा–सुरक्षा, बाड़ और खुफ़िया तंत्र को और मजबूत करके यह सन्देश भी देना होगा कि भारत अपने सीमावर्ती हिन्दुओं की सुरक्षा के मामले में केवल भावनात्मक भाषणों पर नहीं, बल्कि ठोस कदमों पर भी भरोसा रखता है।
घरेलू लोकतांत्रिक सहमति :
ऐसे बड़े सवाल केवल सरकार–विरोध या सरकार–समर्थ से नहीं सुलझते। ज़रूरत है कि संसद की समिति या सर्वदलीय समूह अमेरिका–वेनेज़ुएला कार्रवाई और बाँग्लादेश–हिंसा जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करे। इससे विदेश नीति को एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय सहमति मिल सकेगी और भारत जब भी अन्तरराष्ट्रीय मञ्चों पर बोलेगा, तो वह केवल किसी एक दल के नहीं, पूरे राष्ट्र के विचार का प्रतिनिधित्व करेगा।
निष्कर्ष : भारत की ऐतिहासिक भूमिका :
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति की अन्तरराष्ट्रीय कानूनों को तोड़ते हुए की गयी गिरफ्तारी और बाँग्लादेश में हिन्दुओं पर लगातार हमले–दोनों घटनाएँ यह दिखाती हैं कि आज की दुनिया में ताकतवर राज्य और उन्मादी भीड़, दोनों ही अन्तरराष्ट्रीय नियमों और मानवीय मूल्यों को चुनौती दे रहे हैं। भारत यदि सचमुच “बहुध्रुवीय विश्व” और “विश्व–गुरु” की बात करना चाहता है, तो उसे केवल आर्थिक ताकत और बाज़ार की भाषा से आगे बढ़कर सिद्धान्त, न्याय और सभ्यतागत उत्तरदायित्व की भाषा भी अपनानी होगी। यही वह दूरदर्शी और राष्ट्रहितकारी राह है, जिसमें भारत न तो अमेरिकी दबंगई का मौन दर्शक बनता है, न पड़ोस के हिन्दुओं की पीड़ा को अनदेखा करता है, बल्कि एक स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और न्याय–समर्थ शक्ति के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होता है। हाँ, यह भी है कि भारत को अन्तरराष्ट्रीय हालात को देखते हुए बहुत सम्भलकर चलना होगा। दिख रहा है कि वर्तमान में “भारत की विदेश नीति तलवार की धार पर टिकी है।” उसके सहयोगियों में रूस की हालत खुद पतली हो चुकी है। चीन पर कोई भी भरोसा नहीं कर सकता है। भारत अगर पड़ोस में ही उलझा तो उसके सारे ख्वाब तो बण्टाधार होंगे ही, खार खायी ताकतों को दखल और यहाँ खड़े होने का मौक़ा भी मिल जाएगा। इसके लिए देश के गद्दार न्यौता बाँटते तो घूम रहे ही हैं, पलक पाँवड़े बिछाये उनका इंतज़ार भी कर रहे हैं।
डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर