राजेश श्रीवास्तव
दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। विश्व भर के दस देशों में ईरान और अमेरिका व इजरायल के बीच हुए युद्ध की घमक देखी जा सकती है। दुनिया के कई देश में इसमें न चाहते हुए भी शामिल हो गये हैं। भारत ने हमेशा की तरह इस बार भी खामोशी ओढ़ रखी है। जब कई प्रमुख देश अमेरिका की खुलकर निंदा कर रहे हैं तब भारत ने वही पुराने रटे-रटाये बयान जारी किये हैं कि सभी देश नियंत्रण बरतें। युद्ध कोई रास्ता नहीं है। भारत की यह खामोशी इस बार भारत को बहुत महंगी पड़ने वाली है पहले बात करते हैं कि भारत को न चाहते हुए भी क्या-क्या गंवाना पड़ सकता है फिर अन्य पहलू पर भी बात होगी।
यूएस-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग का असर भारत में भी पड़ने वाला है। इससे तेल की कीमतें बाधित हो सकती हैं। भारत का लगभग 5०% कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आयात होता है, जिसपर ईरान का दबदबा है। मिडिल ईस्ट में छिड़े इस युद्ध का असर कई देशों पर पड़ने वाला है, इसमें भारत भी शामिल है। भारत-ईरान की भले ही जमीनी सीमाएं नहीं मिलती हों, लेकिन भौगोलिक रूप से वह हिदुस्तान का पड़ोसी क्षेत्र है। ऊर्ज़ा सुरक्षा लिहाज से ईरान भारत के लिए अहम माना जाता है। दरअसल, भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। वह 8०% से अधिक तेल आयात करता है. रूस के बाद वह सबसे ज्यादा क्रूड ऑयल इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और ओमान से खरीदता है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है। इस एरिया पर ईरान का कब्जा है। ईरान ने अब इस रास्ते को बंद कर दिया तो भारत में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है।
इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ने की आशंका है। अगर 1 डॉलर की भी बढ़ोतरी हुई तो भारत 9,००० करोड़ रुपये सालाना के हिसाब से नुकसान होगा। इससे देश का राजकोषिय घाटा ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि रुपये की वैल्यू भी गिरेगी। तेल महंगा होने का असर अन्य चीजों पर भी पड़ेगा। जैसे माल ढुलाई महंगी हो जाएगी। फल-सब्जी और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। जिसका बोझ सीधा आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएस-इजरायल और ईरान की यह जंग अगर लंबी खिचती है तो 2०26 की अंतिम तिमाही तक कच्चे तेल की कीमतें 91 डॉलर बैरल को पार कर सकती हैं। सोचिए जब भारत 67 डॉलर प्रति बैरल से भी कम कीमत अभी कच्चा तेल खरीद रहा है, तब पेट्रोल की कीमत 1०० रुपये प्रति लीटर के करीब है। अगर यह 1०० डॉलर प्रति बैरल हो गई तो तेल के भाव कितने होंगे। मिडिल ईस्ट के इस वॉर से तेल ही नहीं, बल्कि सोना-चांदी और कॉपर के दाम में भी उछाल आ सकता है। भारत दुनिया के देशों से भारी मात्रा में गोल्ड-सिल्वर खरीदता है।
अब बात इरान की तो यह जान लीजिये कि कमजोर होकर भी ईरान बेहद खतरनाक है। लगभग पचास साल से ईरान अमेरिका के साथ जंग की आहट सुन रहा था। इसी को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां भी कर रहा था। चूंकि वह अमेरिका की सैन्य शक्ति से सीधे मुकाबला नहीं कर सकता और इस्राइल के जंग में कूदने की स्थिति में उसके लिए राह और भी मुश्किल थी, इसलिए उसकी रणनीति अलग तरह की रही। उसने ऐसे तरीकों के बारे में सोचा, जिनसे हमला करने वाले देश को नुकसान उठाना पड़े और पूरे पश्चिम एशिया के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाया जा सके। ईरान की सेना को पश्चिम एशिया में काफी ताकतवर माना जाता है। ग्लोबल फायरपावर के अनुसार, यह विश्व की शीर्ष 2० सैन्य शक्तियों में शामिल है और 145 देशों में से 16वें स्थान पर है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, ईरानी सशस्त्र बल पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, जिसमें कम से कम 5,8०,००० सक्रिय सैनिक हैं। लगभग 2,००,००० प्रशिक्षित आरक्षित सैनिक हैं। ईरान के दुश्मन उससे भले ही डरते नहीं हों, लेकिन वे जानते थे कि उसके खिलाफ कोई भी युद्ध बेहद गंभीर होगा।
198० के दशक में इराक के साथ युद्ध के दौरान बहुत कम देश ईरान को हथियार बेचने के लिए तैयार थे। जब 1989 में जंग खत्म होने के एक साल बाद आयातुल्लाह खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता बने। उन्होंने रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को देश में हथियार प्रणाली बनाने का आदेश दिया। इस प्रयास में भारी संसाधन लगाए गए। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि ईरान को अपनी रक्षा जरूरतों के लिए फिर कभी विदेशी शक्तियों पर निर्भर न रहना पड़े। ईरान के पास हजारों मिसाइलें। ड्रोन भी हैं। पश्चिम एशिया के कई देशों में तैनात अमेरिकी बेस ईरान के हथियारों की जद में हैं। जून 2०25 में इस्राइल के आश्चर्यजनक हमले के बाद ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों की कई लहरें इस्राइल पर दागीं। ईरान के हमले इस्राइल की उन्नत वायु रक्षा प्रणाली को भेद पाने में कुछ हद तक कामयाब भी रहे। ईरान ने 2० से ज्यादा तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें विकसित की हैं, जिनकी जद में दक्षिणी यूरोप तक का इलाका है। ईरान बार-बार कहता रहा है कि उसके खिलाफ जंग केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगी। भले ही वह सैन्य रूप से अमेरिका से कमजोर हो, लेकिन ऊर्ज़ा बाजार और वैश्विक व्यापार में खलल पैदा कर वह दुनियाभर पर असर डालने की ताकत रखता है।
ईरान के पास सबसे बड़ा आर्थिक हथियार है होर्मुज जलडमरूमध्य । यह दुनिया का बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा यानी 2०% तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी इसी रास्ते से गुजरती है। ईरान इस जलडमरूमध्य के उत्तरी हिस्से को नियंत्रित करता है। इसे इस तरह समझें कि अगर होर्मुज बंद हो जाए तो यह वैसा ही होगा, जैसे दुनिया की ऊर्ज़ा आपूर्ति की एक मुख्य नस काट दी जाए। इससे ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं। आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हो सकती हैं। दुनियाभर में मंदी का वास्तविक खतरा पैदा हो सकता है।
मतलब साफ है कि अगर ईरान इसे अंतिम युद्ध समझे, तो वह सब कुछ झोंक सकता है। होर्मुज के रास्ते में अगर खलल पैदा होता है तो दुनियाभर में महंगाई बढ़ सकती है। यह पूरी तरह बंद हो जाए तो एक वास्तविक खतरा बन सकता है। बात परमाणु कार्यक्रम की है। अमेरिका और इस्राइल का आरोप है कि ईरान चुपके-चुपके परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। ईरान कहता है कि यह सब शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, हम हथियार नहीं बना रहे। दुनिया में जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, उनमें से ईरान अकेला है जिसने यूरेनियम को हथियार बनाने के करीब तक जाकर संवर्धित किया है। यही बात अमेरिका को खलती है।
राजेश श्रीवास्तव