-ललित गर्ग-
भारतीय किशोरों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति एवं क्रूर मानसिकता चिन्ताजनक है, नये भारत एवं विकसित भारत के भाल पर यह बदनुमा दाग है। पिछले कुछ समय से किशोरों में बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति निश्चित रूप से डरावनी, मर्मांतक एवं खौफनाक है। चिंता का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि जिस उम्र में किशोरों के मानसिक और सामाजिक विकास की नींव रखी जाती है, उसी उम्र में कई बच्चों में आक्रामकता एवं क्रूर मानसिकता घर करने लगी है और उनका व्यवहार हिंसक होता जा रहा है। बदलते समय के साथ समाज के व्यवहार में आई यह हिंसक तीव्रता और आक्रामकता अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सबसे चिंताजनक प्रभाव किशोर पीढ़ी पर स्पष्ट रूप से दिखाई देना ज्यादा परेशान करने वाला है। हाल के वर्षों में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या और उनकी क्रूरता ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह गया, बल्कि यह सामाजिक संरचना, पारिवारिक मूल्यों, शिक्षा व्यवस्था और सांस्कृतिक प्रभावों के गहरे संकट का संकेतक बन चुका है।
दिल्ली के दयालपुर क्षेत्र में मात्र चार सौ रुपये के विवाद में एक युवक की नृशंस हत्या, जिसमें तीन किशोरों ने बेरहमी से चाकू घोंपे और चौथा उसका वीडियो बनाता रहा, इस विकृति का भयावह उदाहरण है। यह घटना केवल एक हत्या नहीं, बल्कि संवेदनाओं के क्षरण, नैतिकता के पतन और कानून के भय के समाप्त हो जाने का प्रतीक है। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर किशोरों में यह दुस्साहस और हिंसात्मक प्रवृत्ति कहां से जन्म ले रही है? वस्तुतः, किशोर अपराधों के बढ़ते ग्राफ के पीछे कई परस्पर जुड़े हुए कारण हैं, जिनका विश्लेषण आवश्यक है। सबसे पहला और प्रमुख कारण है पारिवारिक संरचना का विघटन। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य सदस्यों के सान्निध्य में नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक मर्यादाओं का सहज प्रशिक्षण मिलता था। आज एकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता और समयाभाव के कारण बच्चों के साथ संवाद का अभाव हो गया है। परिणामस्वरूप, किशोर अपनी समस्याओं और जिज्ञासाओं का समाधान बाहर ढूंढते हैं, जो कई बार उन्हें गलत दिशा में ले जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण है डिजिटल और सोशल मीडिया का अनियंत्रित प्रभाव। इंटरनेट ने जहां ज्ञान के द्वार खोले हैं, वहीं अपराध, हिंसा और अश्लीलता से भरी सामग्री भी किशोरों के लिए सहज उपलब्ध कर दी है। फिल्मों, वेब सीरीज और टीवी धारावाहिकों में हिंसा को जिस प्रकार ग्लैमराइज किया जाता है, वह किशोर मन को प्रभावित करता है। वे अपराध को एक साहसिक कार्य या रोमांच के रूप में देखने लगते हैं। कई बार वे यह भूल जाते हैं कि वास्तविक जीवन में इसके गंभीर और जीवन विनाशक घातक परिणाम होते हैं। तीसरा पहलू शिक्षा व्यवस्था का है। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा और रोजगार तक सीमित हो गया है। नैतिक शिक्षा, चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों पर आधारित शिक्षण लगभग समाप्त हो गया है। शिक्षकों की भूमिका भी अब मार्गदर्शक की बजाय केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करने तक सीमित हो गई है। विद्यालयों में अनुशासन और संवाद का जो वातावरण होना चाहिए, वह धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।
इसके अतिरिक्त, समाज में बढ़ती असहिष्णुता और आक्रामकता भी किशोरों को प्रभावित कर रही है। जब वे अपने आसपास छोटे-छोटे विवादों में लोगों को हिंसक होते देखते हैं, तो यह उनके लिए सामान्य व्यवहार बन जाता है। राजनीति, मीडिया और सामाजिक जीवन में बढ़ती कटुता और टकराव की प्रवृत्ति किशोरों के मन में भी उसी प्रकार की प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करती है। किशोर अपराधों के पीछे एक और गंभीर कारण है आपराधिक गिरोहों द्वारा उनका उपयोग। चूंकि कानून में किशोरों के लिए अपेक्षाकृत नरमी होती है, इसलिए अपराधी गिरोह उन्हें अपने कार्यों के लिए मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी किशोरों को अपराध की ओर धकेलती है। नशे की लत पूरी करने के लिए वे चोरी, लूट और यहां तक कि हत्या जैसे गंभीर अपराध करने से भी नहीं हिचकते।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि किशोर न्याय से जुड़े कानूनों का लचीलापन कई बार अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच बन जाता है। गंभीर अपराधों में संलिप्त होने के बावजूद किशोरों को शीघ्र रिहा कर दिया जाता है, जिससे उनमें कानून का भय समाप्त हो जाता है। इस संदर्भ में यह बहस भी समय-समय पर उठती रही है कि गंभीर अपराधों में संलिप्त किशोरों के लिए वयस्कों जैसा दंड प्रावधान होना चाहिए या नहीं? हालांकि केवल कानून को कठोर बनाना ही समाधान नहीं है। समस्या की जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं और इसके समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सबसे पहले परिवार को अपनी भूमिका को पुनः समझना होगा। बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना, उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर ध्यान देना और उन्हें सही-गलत का अंतर समझाना अत्यंत आवश्यक है। माता-पिता को यह समझना होगा कि केवल भौतिक सुविधाएं प्रदान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय और संस्कार देना अधिक महत्वपूर्ण है।
दूसरे, शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, जीवन कौशल और व्यवहारिक प्रशिक्षण को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। शिक्षकों को केवल ज्ञान प्रदाता नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरक की भूमिका निभानी होगी। स्कूलों में काउंसलिंग व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है ताकि किशोर अपनी समस्याओं को साझा कर सकें। तीसरे, मीडिया और मनोरंजन उद्योग को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी होगी। हिंसा और अपराध को महिमामंडित करने के बजाय सकारात्मक और प्रेरणादायक सामग्री का निर्माण किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी कंटेंट की निगरानी और नियंत्रण को सख्ती से लागू करना होगा। चौथे, पुलिस और प्रशासन को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय, अपराध की रोकथाम पर अधिक ध्यान देना होगा। समुदाय आधारित पुलिसिंग, स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम और किशोरों के साथ संवाद जैसी पहलें प्रभावी हो सकती हैं।
ऑस्ट्रिया के क्लागेनफर्ट विश्वविद्यालय की ओर से किशोरों पर किए गए अध्ययन में पता चला है कि दुनिया भर में 35.8 प्रतिशत से ज्यादा किशोर मानसिक तनाव, अनिद्रा, अकारण भय, पारिवारिक अथवा सामाजिक हिंसा, चिड़चिड़ापन अथवा अन्य कारणों से जूझ रहे हैं। एकाकीपन बढ़ने से वे ज्यादा आक्रामक और विध्वंसक सोच की तरफ बढ़ने लगे हैं। मोबाइल व कथित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बह रहे नीले जहर से किशोर अराजक यौन व्यवहार एवं हिंसक प्रवृत्तियों की तरफ उन्मुख हुए हैं। किशोरों को समझाने वाला कोई नहीं है कि यह रास्ता आत्मघात का है। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व ब्रिटेन जैसे देश किशोरों को मोबाइल से दूर रखने हेतु कानून बना रहे हैं। हमारे देश में भी शीर्ष अदालत ने समय-समय पर ऐसी घटनाओं पर तल्ख टिप्पणियां की हैं। क्या इन दर्दनाक घटनाओं से हमारे अभिभावकों, समाज-निर्माताओं एवं हमारे सत्ताधीशों की आंख खुलेगी? बच्चों से जुड़ी हिंसा की इन वीभत्स एवं त्रासद घटनाओं से जिन्दगी सहम गयी है। हमें मानवीय मूल्यों के लिहाज से भी विकास एवं नयी समाज-व्यवस्था की परख करनी होगी। बच्चों के भीतर हिंसा मनोरंजन की जगह ले रही है। इसी का नतीजा है कि छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी अपने किसी सहपाठी की हत्या तक कर रहे हैं। बच्चों के व्यवहार और उनके भीतर घर करती प्रवृत्तियों पर मनोवैज्ञानिक पहलू से विचार किए बिना समस्या को कैसे दूर किया जा सकेगा?
यदि एक किशोर अपराध की राह पर जाता है, तो उसमें कहीं न कहीं परिवार, समाज, शिक्षा और व्यवस्था की भी जिम्मेदारी होती है। आज आवश्यकता है एक समन्वित और संवेदनशील दृष्टिकोण की, जिसमें सरकार, समाज, परिवार और शिक्षा संस्थाएं मिलकर कार्य करें। केवल दंड से नहीं, बल्कि संवाद, संस्कार और सकारात्मक मार्गदर्शन से ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह आक्रामकता आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी गंभीर संकट का रूप ले सकती है। इसलिए यह समय चेतने का है, सोचने का है और मिलकर समाधान खोजने का है, ताकि हमारी किशोर पीढ़ी हिंसा की राह छोड़कर सृजन और संवेदना के मार्ग पर अग्रसर हो सके।