ईश्वर, समाज में अन्याय व नास्तिकता

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godमनमोहन कुमार आर्य

ईश्वर किसे कहते हैं? एक दशर्नकार ने इसका उत्तर दिया है कि जिससे यह सृष्टि बनी है, जो इसका पालन करता है तथा जो इस सृष्टि की अवधि पूरी होने पर प्रलय करता है, उसे ईश्वर कहते हैं। इस उत्तर के अनुसार ब्रह्माण्ड में एक सच्चिदानन्दस्वरुप, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ ईश्वर नामी चेतन सत्ता है जिसने किसी उपादान कारण से इसे सृष्टि को बनाया है। किसके लिए वा क्यों बनाया है, इसका उत्तर भी वैदिक साहित्य वा दर्शनों से प्राप्त होता है। उपादान कारण उस पदार्थ वा सामग्री को कहते हैं जिससे कोई नया पदार्थ वा सामग्री बनाई जाती है जैसे कि आटे से रोटी वा भवन सामग्री से भवन आदि। ईश्वर ने किस उपादान कारण से सृष्टि को बनाया तो इसका उत्तर है प्रकृति नाम की जड़ व सत्व, रज और तम गुण वाली सूक्ष्म अनादि, अविनाशी, नित्य प्रकृति से ईश्वर ने इस संसार को रचा है। कैसे व किस प्रकार रचा, इसका ज्ञान जैसे किसी पदार्थ के रचने वाले निमित्त कारण को होता है, उसी प्रकार से ईश्वर को सृष्टि को रचने व चलाने का ज्ञान भी नित्य, अनादि व समय के बन्धन से रहित है व उसमें इस कार्य को करने की पूर्ण शक्ति, बल व सामथ्र्य है। वह ईश्वर हमेशा व सनातन काल से अपने कार्यों को करता चला आ रहा है। मनुष्य अल्पज्ञ अर्थात् अल्प व नयून ज्ञान व शक्ति वाला होता है, अतः वह ईश्वर के द्वारा किये जाने वाले सभी कार्यों को सम्रगता या पूर्णता से जान नहीं पाता। ईश्वर जितना जनायेगा उतना ही वह जान सकता है। हमें लगता है कि जिस प्रकार पहली से लेकर कक्षा दस या बारह तक का विद्यार्थी उसे पढ़ाने वाले अध्यापक वा आचार्य से जो एम.ए., बी.एड. व अधिक पढ़े होते हैं, उनके समान ज्ञान न तो रख सकता है और न ही उनके सब ज्ञान को जान व समझ सकता है। यह उल्लेखनीय है कि अध्यापक व विद्यार्थियों में समान जीवात्मा होता है। यदि विद्यार्थी अपने अध्यापक के समान ज्ञान प्राप्त करना चाहे तो उसे उनकी ही तरह अध्ययन करना होगा जिसमें विद्यार्थी के तप के साथ समय व अध्ययन की समस्त सुविधाओं का उपलब्ध होना आवश्यक है। अतः यदि हमें ईश्वर के कार्यों व ज्ञान का पूरा पूरा ज्ञान व अनुभव नहीं है, तो इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि ईश्वर है ही नहीं और यह सृष्टि उसके द्वारा नहीं बनाई गयी है। वैज्ञानिकों व किसी अन्य की दृष्टि में यदि यह सृष्टि बिना ईश्वर अपने आप बनी है तो उनका यह ज्ञान भी अज्ञान ही सिद्ध होता है क्योंकि किसी कर्ता के बिना क्रिया व बुद्धिपूर्व रचना एवं निर्माण कदापि नहीं हो सकता। यह संसार अर्थात् हमारा सौर मण्डल तो अति विशाल है और पूरे ब्रह्माण्ड पर विचार करें तो हम इसकी विशालता का अनुमान भी नहीं कर सकते। यह सारा का सारा ब्रह्माण्ड विज्ञान के नियमों पर आधारित होकर ही चल रहा है। जब एक छोटा सा भवन या कमरा अपने आप नहीं बन सकता, एक रोटी, दाल या सब्जी अपने आप नहीं बन सकती, कपड़े अपने आप धुल नहीं सकते तो यह सृष्टि तो बिना कर्ता के कदापि नहीं बन सकती, यही सिद्धान्त पुष्ट होता है। वैज्ञानिक चाहें ईश्वर से निर्मित सृष्टि के सिद्धान्त को स्वीकार करें या न करें, इसमें कितनी भी कमियां निकालें, परन्तु यह सिद्धान्त सत्य व प्रमाणिक है, ऐसा हम मानते हैं और इसके लिए हमारी आत्मा हमसे सहमत हैं।

 

ईश्वर ने यह सृष्टि किस प्रकार व किस क्रम से बनाई, इसे जानने के लिए वेद, दर्शन, उपनिषद, सत्यार्थ प्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों के सृष्टि रचना विषयक प्रकरणों को गम्भीरता से पढ़ व समझ कर जाना जा सकता है। ईश्वर ने यह सृष्टि किसके लिए बनाई? इसका उत्तर है कि ईश्वर ने अपने सृष्टि रचना व उसका पालन करने के अपने स्वभाव, ज्ञान, सामर्थ्य सहित जीवात्माओं के सुख व उनके पूर्व कल्प वा सृष्टि के अवशिष्ट कर्मों के फलों का भोग कराने के लिए बनाई है। हम सृष्टि पर दृष्टि डालते हैं तो हमें सभी प्राणी सुख व दुःखों में संलिप्त दीखते हैं। सभी प्राणी सुख के लिए ही कर्म करते हुए प्रतीत होते हैं। हम भोजन करते हैं तो सुख के लिए, अध्ययन करते हैं तो सुख के लिए, धर्म का पालन करते हैं तो वह भी अभ्युदय व निःश्रेयस के लिए करते हैं जो कि एक प्रकार सुख ही है। इसी प्रकार से यह समस्त संसार वा सभी प्राणी सुख की प्राप्ति में ही लगे हुए हैं वा अग्रसर हैं। रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आती जाती रहती है। इसी प्रकार से सृष्टि के बाद प्रलय और प्रलय के बाद ईश्वर सृष्टि की रचना करता है और जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म देता है। हम सुख की प्राप्ती के लिए तप व पुरुषार्थ करते हैं तो कभी सफल व कभी असफल हो जाते हैं। हम अपनी कमियां दूर कर पुनः प्रयत्न करते हैं तो फिर कभी सफलता व किसी में असफलता दोनों ही मिलती हैं। हमने पढ़ा व सुना है कि कई वैज्ञानिक आविष्कार ऐसे हुए हैं जिसमें किसी वैज्ञानिक को सफलता 100 से 250 बार विफल होने के बाद प्राप्त हुई। आज विज्ञान जिस स्थिति में आया है वह स्थिति एक बार प्रयास करने से नहीं हुई अपितु आज हमें इसका अनुमान लगाना भी कठिन है कि कितने लोगों ने कितनी कितनी बार इन छोटी छोटी सफलताओं के लिए प्रयास किये हैं? अतः मनुष्य को दुःख प्राप्त होने पर अधीर नहीं होना चाहिये अपितु एक, दो, तीन, चार व अनेक बार प्रयास करने चाहियें। बार बार प्रयत्न करने पर सफलता अवश्य मिलेगी। अतः एक या दो बार विफलता मिलने पर अधीर होकर नास्तिक बन जाना या ईश्वर के प्रति शंकायें करना उचित नहीं है। जो ऐसा करते हैं व जिन्होंने ऐसा किया है, वह हृदय से तो शुद्ध होते हैं परन्तु वह अपने पूर्व जन्मों व अन्य मनुष्यों व प्राणियों के भी पूर्व जन्मों के कर्मों, पुण्य व पापों को न जानने के कारण कई बार ईश्वर के अस्तित्व में शंका करने लगते हैं और सुख के आधार वैदिक कर्मकाण्ड को भी छोड़ देते हैं। ऐसा करना हमारी दृष्टि में उचित नहीं होता।

 

हम देख रहे हैं कि समाज में न्याय कम परन्तु अन्याय अधिक है। इसी अन्याय के कारण ही देश की सरकार ने नोट बन्दी का निर्णय भी लिया है जिससे निर्धनों व वंचितों के हितों की रक्षा हो सके। हमें लगता है कि यह राजनीति से जुड़ा निर्णय होने के साथ प्रत्येक मनुष्य के जीवन को प्रभावित करने वाला निर्णय होने से एक धार्मिक व सामाजिक उचित व शुभ कार्य भी है। मनुष्येतर पशुओं आदि प्राणियों में भी देखा जाता है कि बड़े बलवान पशु छोटे कमजोर पशुओं को कष्ट देते हैं। बिल्ली व सांप चूहे को खा जाते हैं जबकि चूहे का कोई अपराध नहीं होता। शेर व अन्य हिंसक वनीय पशु वनों में शाकाहारी पशुओं को अपना आहार बनाते हैं। यह सब कर्म फल सिद्धान्त के कारण होना ही सम्भव प्रतीत होता है। यह पशुओं का पशुओं के प्रति व्यवहार है जिनमें बुद्धि तत्व पूर्ण विकसित नहीं होता। उनकी सभी क्रियायें ईश्वर प्रदत्त स्वभाविक ज्ञान के आधार पर सम्पन्न होती है। इनमें से किसी को दोषी और किसी को पीड़ित नहीं माना जा सकता। ईश्वर ने मनुष्य को सत्य व असत्य सहित शुभ व अशुभ तथा पाप व पुण्य का ज्ञान रखने व कराने वाली विवेक बुद्धि दी हुई है। वेदों का ज्ञान भी दिया है जिसमें मनुष्यों के लिए विहित व निषिद्ध कर्मों का ज्ञान है। अतः विवेक बुद्धि सम्पन्न कोई मनुष्य यदि अन्य प्राणियों, प्रकृति व पर्यावरण के विरुद्ध अपराध करता है तो वह ईश्वर व मानव समाज की दृष्टि में अपराधी व पापी होता है। बलवान, अहंकारी व लोभी व्यक्तियों के कारण अन्य निर्दोष मनुष्य, प्राणी और प्रकृति पर्यावरण विपरीत अर्थात् नकारात्मक रुप में प्रभावित होते हैं। अतः वेद व मनुस्मृति के अनुसार ऐसे लोग दण्डनीय होते हैं। मनुष्य क्योंकि अल्पज्ञ व बल, शक्ति, ज्ञान आदि में ससीम होता है, अतः मनुष्यों के कर्मों का पूरा पूरा न्याय तो ईश्वर की निर्णय व्यवस्था से ही होता है जिसके अनुसार कुछ क्रियमाण कर्मों का फल इसी जन्म में मिल जाता है और शेष अवशिष्ट कर्मों का फल परजन्म व बाद के जन्मों में मिलता है। इसी कारण देश, समाज व विश्व में छोटे-बड़े व अनेक भीषण अपराध होते हैं जिससे मनुष्य पीड़ित ही नहीं होते अपितु कई बार अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं। क्या इस कारण किसी को नास्तिक हो जाना चाहिये, हमें लगता है कि ऐसा करना उस बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उचित नहीं होगा। हमारी दृष्टि में तो उसे महर्षि दयानन्द, मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगेश्वर कृष्ण के जीवन व उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर सत्य के पक्ष में आन्दोलन व समाज सुधार के कार्य करने चाहये। हम यहां ऋषि दयानन्द निर्दिष्ट मनुष्य के कर्तव्यों पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं। उन्होंने स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश में लिखा है कि ‘मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामर्थ्य से धर्मात्माओं की, कि चाहे वे महा अनाथ निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उनकी रक्षा,  उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती, सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथपि उनका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करें अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करें। इस काम में चाहे उसको कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी चले ही जावें, पन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक (कोई मनुष्य) कभी न होवें।’ यदि ऐसा होगा तो समाज में अत्याचार कम होंगे जिससे ईश्वर के अस्तित्व में अविश्वास भी कम होगा। तब लोग नास्तिक न बन कर आस्तिक ही होंगे। बलवान मनुष्यों के अत्याचारों, अन्याय व शोषण ने ही संसार के लोगों को नास्तिक बनाया है, ऐसा हम अनुभव करते हैं।

 

हमें इस लेख को लिखने के कुछ ही समय बाद आर्य जगत के देदीप्यमान नक्षत्र आर्य विद्वान श्री भावेश मेरजा जी, भडूच की महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है।  पाठकों के ज्ञानवर्धन हेतु हम उसे साभार प्रस्तुत कर रहें हैं।  उन्होंने लिखा है कि “श्री मनमोहन जी ! आपने आस्तिकता के पक्ष में अनेक उपयोगी बातें इस लेख में प्रस्तुत की हैं । आज की नई पीढ़ी की आस्तिक भावना धर्मध्वजियों के दम्भ, अनाचार आदि को देखकर भी प्रभावित होती है । अवैज्ञानिक, अतार्किक, अतिशयोक्तिपूर्ण बातों पर खड़ा किए गए कई व्यक्ति केन्द्रित मत-सम्प्रदाय भी नई पीढ़ी को नास्तिकता की ओर झुकाते हैं । परिवार में तथाकथित धार्मिक माता-पिता आदि के व्यवहारिक जीवन में यम-नियम या मानव मूल्यों का अभाव देखकर भी आस्तिकता से मन उठ जाता है । वेदोक्त ईश्वरवाद बुद्धिमान एवं तार्किक मस्तिष्कों को आकर्षित करने में समर्थ है परन्तु इसे अधिकाधिक समर्थ तथा समर्पित व्याख्याताओं, प्रचारकों तथा इसके साथ जीवन जीने वाले सच्चे धार्मिकों की आवश्यकता है । इस विचार प्रधान लेख के लिए आपको बधाई।”

 

हमने ईश्वर तथा समाज में अन्याय पर अपने कुछ संक्षिप्त विचार ही इस लेख में प्रस्तुत किये हैं। नास्तिकता के कारणों पर प्रसंगानुसार कुछ विचार किया भी है। हम आशा करते हैं कि पाठक इस चर्चा को पसन्द करेंगे। ओ३म् शम्।

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