-ः ललित गर्ग :-
तेज होती हथियारों की होड़ और अस्थिर होती विश्व व्यवस्था आज मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनकर खड़ी है। दुनिया एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां युद्ध केवल सीमाओं पर लड़े जाने वाले संघर्ष नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका प्रभाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा व्यवस्था, पर्यावरण, सृष्टि-संतुलन, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता तक पहुंच रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, ईरान और इजरायल के बीच हमलों का नया दौर, अमेरिका की रणनीतिक भूमिका, रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन-ताइवान तनाव जैसे अनेक घटनाक्रम मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि दुनिया एक बार फिर हथियारों की दौड़ और शक्ति संतुलन की राजनीति की ओर लौट रही है। यह स्थिति केवल राजनीतिक या सामरिक नहीं, बल्कि मानवीय संकट का संकेत भी है, क्योंकि जब दुनिया हथियारों पर ज्यादा खर्च करती है तो विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे क्षेत्र पीछे छूट जाते हैं।
आज हर देश अपनी सुरक्षा के नाम पर हथियार खरीद रहा है, सेना को मजबूत कर रहा है और सैन्य बजट बढ़ा रहा है। यह एक ऐसी दौड़ बन गई है जिसमें कोई भी देश पीछे नहीं रहना चाहता। लेकिन विडंबना यह है कि जितने अधिक हथियार बढ़ रहे हैं, दुनिया उतनी ही असुरक्षित होती जा रही है। सुरक्षा की यह मानसिकता वास्तव में असुरक्षा का ही परिणाम है। एक देश हथियार बढ़ाता है तो दूसरा देश भी हथियार बढ़ाता है और इस तरह एक अविश्वास का वातावरण बन जाता है। यह अविश्वास ही युद्ध की जमीन तैयार करता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में दुनिया का सैन्य खर्च कई गुना बढ़ जाएगा और यह पैसा मानव विकास के बजाय विनाश की तैयारी में खर्च होगा। यह स्थिति मानव सभ्यता के लिए शुभ संकेत नहीं है। पश्चिम एशिया का संकट इस समय दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता दिखाई दे रहा है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते हमले, समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर तनाव और बड़े देशों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी ने इस क्षेत्र को युद्ध के कगार पर खड़ा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समुद्री मार्ग खोलने की चेतावनी को खारिज करते हुए ईरान ने इजरायल पर हमलों का नया दौर शुरू किया है, जिससे यह संकट और अधिक गंभीर हो गया है। यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो इसका प्रभाव केवल इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा, क्योंकि यह क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल और गैस पर निर्भर है और पश्चिम एशिया तेल उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है। यदि वहां युद्ध बढ़ता है या समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो तेल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। तेल महंगा होगा तो पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, परिवहन महंगा होगा, उत्पादन लागत बढ़ेगी और अंततः हर वस्तु महंगी हो जाएगी। यानी एक वैश्विक महंगाई का दौर शुरू हो सकता है। महंगाई बढ़ने से गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। इसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर भी जा सकती है। पहले से ही कई देश आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और यदि ऊर्जा संकट बढ़ता है तो स्थिति और गंभीर हो जाएगी। भारत जैसे देश भी इस स्थिति से अछूते नहीं रह सकते, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति, पेट्रोल-डीजल, गैस और उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने को लेकर तैयारी शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंत्रियों के साथ आपात बैठक कर ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने और संभावित संकट से निपटने की रणनीति पर चर्चा की। केवल केंद्र सरकार की तैयारी पर्याप्त नहीं होगी, राज्य सरकारों को भी इस स्थिति को समझते हुए ऊर्जा संरक्षण, आपूर्ति प्रबंधन और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने होंगे।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चिंता यह है कि दुनिया युद्ध को रोकने के बजाय उसकी तैयारी ज्यादा कर रही है। युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे रोकना बहुत कठिन होता है। इतिहास गवाह है कि कई युद्ध ऐसे हुए जो कुछ दिनों के लिए शुरू हुए लेकिन वर्षों तक चलते रहे और उन्होंने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। आज भी यदि पश्चिम एशिया का युद्ध फैलता है तो यह केवल दो या तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बड़े देशों की भागीदारी से यह वैश्विक संघर्ष का रूप ले सकता है। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि विश्व के बड़े देश आगे बढ़कर युद्ध विराम की पहल करें और वार्ता का रास्ता निकालें। अमेरिका की भूमिका इस पूरे संकट में बहुत महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिका चाहे तो वह इजरायल पर दबाव डाल सकता है, ईरान के साथ वार्ता शुरू करा सकता है और संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से युद्ध विराम की दिशा में कदम उठा सकता है। कूटनीति का रास्ता हमेशा युद्ध से बेहतर होता है, क्योंकि युद्ध में अंततः नुकसान सभी का होता है। युद्ध में सैनिक मरते हैं, नागरिक मरते हैं, शहर बर्बाद होते हैं, अर्थव्यवस्था टूटती है और आने वाली पीढ़ियां तक उसके दुष्परिणाम झेलती हैं। इसलिए आज दुनिया को हथियारों की दौड़ नहीं, शांति की दौड़ की जरूरत है।
हथियारों की होड़ का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे विकास रुक जाता है। दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां आज भी लोग गरीबी, भूख, बीमारी और अशिक्षा से जूझ रहे हैं, लेकिन सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने के बजाय हथियारों पर खर्च बढ़ा रही हैं। यह मानवता के साथ एक तरह का अन्याय है। यदि दुनिया का सैन्य बजट का एक छोटा हिस्सा भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर दिया जाए तो दुनिया से गरीबी और भूख को काफी हद तक खत्म किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से दुनिया की राजनीति अभी भी शक्ति संतुलन और सैन्य प्रभुत्व के इर्द-गिर्द घूम रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व नेतृत्व यह समझे कि असली शक्ति हथियारों में नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, विज्ञान, शिक्षा और मानव विकास में होती है। जो देश अपने नागरिकों को बेहतर जीवन देता है, वही वास्तव में शक्तिशाली देश होता है। युद्ध और हथियार केवल विनाश लाते हैं, विकास नहीं। इसलिए दुनिया को यह तय करना होगा कि उसे हथियारों की दुनिया बनानी है या मानवता की दुनिया।
यदि वर्तमान परिस्थितियों में युद्ध नहीं रुके और हथियारों की होड़ इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले वर्षों में दुनिया को महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, ऊर्जा संकट और सामाजिक अस्थिरता जैसे अनेक संकटों का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति पूरी मानवता के लिए खतरनाक होगी। इसलिए अब समय आ गया है कि विश्व के सभी देश अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर वैश्विक हितों के बारे में सोचें और युद्ध के बजाय शांति, सहयोग और सहअस्तित्व का मार्ग अपनाएं। मानव सभ्यता का भविष्य हथियारों से नहीं, बल्कि शांति, संवाद और सहयोग से सुरक्षित हो सकता है। यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यही मानवता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
युद्ध का अंधेरा मानवता को केवल विनाश, महंगाई, भय और अस्थिरता देता है, जबकि दुनिया को आज शांति, संवाद और स्थिरता का उजाला चाहिए, और इस दिशा में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। आज वैश्विक परिदृश्य में भारत केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि एक नैतिक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का व्यक्तित्व एक ऐसे विश्व नेता के रूप में उभरा है जो युद्ध नहीं, संवाद-संघर्ष नहीं, सहयोग और हिंसा नहीं, सहअस्तित्व की बात करता है। भारत बुद्ध, महावीर और गांधी की अहिंसा की परंपरा का देश है, इसलिए भारत यदि सक्रिय कूटनीतिक पहल करे, युद्धरत देशों के बीच संवाद का सेतु बने, संयुक्तराष्ट्र के मंच पर युद्ध विराम की ठोस पहल करे, तो वह विश्व राजनीति को नई दिशा दे सकता है। मोदी यदि शांति, अहिंसा, वैश्विक संवाद और आर्थिक सहयोग के चार सूत्रों पर विश्व को साथ लाने की पहल करें तो भारत वास्तव में विश्व शांति का मार्गदर्शक बन सकता है और युद्ध की दिशा में बढ़ती दुनिया को शांति और स्थिरता की दिशा में मोड़ने में ऐतिहासिक भूमिका निभा सकता है।