विश्ववार्ता

ब्रिक्स को नाटो जैसा संगठन बनाने के ईरानी प्रस्ताव के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ 

कमलेश पांडेय

इस्लामी साम्राज्यवाद के स्वप्नद्रष्टा देश ईरान की अंतरराष्ट्रीय ताकत अब किसी से छिपी हुई नहीं है, क्योंकि अपनी ठोस देशज रणनीति व रूस-चीन के बल पर उसने अरब व खाड़ी देशों में अमेरिका-इजरायल की बादशाहत को कड़ी चुनौती दे डाली है। वहीं, अब ईरान द्वारा ब्रिक्स को नाटो जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था (Collective Security Alliance) में बदलने या उसके समान सुरक्षा ढांचा विकसित करने का जो विचार प्रकट किया गया है, वह केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है। 

हालांकि अभी तक ब्रिक्स ने इसे औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है, लेकिन ईरान लगातार चाहता रहा है कि ब्रिक्स केवल आर्थिक मंच न रहकर सुरक्षा और सामरिक मुद्दों पर भी अधिक सक्रिय भूमिका निभाए। 

सवाल है कि ईरान आखिर ऐसा क्यों चाहता है तो जवाब निम्नलिखित है, जिसमें उसके निहितार्थ मौजूद हैं:-

पहला, अमेरिका-नेतृत्व वाली व्यवस्था को चुनौती: नाटो पश्चिमी देशों का सैन्य गठबंधन है, जबकि ब्रिक्स स्वयं को “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है। यदि ब्रिक्स में सामूहिक सुरक्षा तंत्र विकसित होता है, तो यह अमेरिकी प्रभाव वाली वैश्विक सुरक्षा संरचना के समानांतर एक वैकल्पिक ध्रुव बन सकता है। 

दूसरा, चीन और रूस को लाभ: ईरान का प्रस्ताव चीन और रूस के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप माना जा सकता है। दोनों देश लंबे समय से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं। रूस-ईरान सामरिक साझेदारी और चीन-ईरान संबंध पहले से मजबूत हैं। 

तीसरा, भारत के लिए दुविधा: भारत ब्रिक्स को मुख्यतः आर्थिक सहयोग, व्यापार, विकास बैंक और वैश्विक शासन सुधार के मंच के रूप में देखता है। यदि यह सैन्य या सुरक्षा गठबंधन की दिशा में बढ़ता है, तो भारत को कठिन संतुलन बनाना पड़ेगा क्योंकि उसके अमेरिका, यूरोप, इज़राइल और खाड़ी देशों से भी महत्वपूर्ण संबंध हैं। 

चौथा, ब्रिक्स के भीतर विभाजन बढ़ सकता है: ब्रिक्स में अब ईरान और यूएई जैसे परस्पर प्रतिस्पर्धी देश भी हैं। हाल के ईरान संकट पर भी सदस्य देश एकमत नहीं हो सके और कई बैठकों में साझा रुख बनाना कठिन साबित हुआ। ऐसे में नाटो जैसी “एक पर हमला, सब पर हमला” वाली नीति अपनाना बेहद मुश्किल होगा। 

पांचवां, मध्य-पूर्व की राजनीति पर असर: ईरान चाहता है कि ब्रिक्स पश्चिमी प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के खिलाफ एक राजनीतिक-सुरक्षा कवच बने। यदि ब्रिक्स सुरक्षा मामलों में सक्रिय हुआ, तो मध्य-पूर्व में अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों की रणनीतियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। 

छठा, ब्रिक्स की मूल पहचान बदल जाएगी: अब तक ब्रिक्स की पहचान आर्थिक सहयोग, विकास वित्त, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग तक सीमित रही है। नाटो जैसी संरचना अपनाने से उसका चरित्र आर्थिक मंच से सामरिक-सुरक्षा मंच में बदल सकता है। 

राजनीतिक निष्कर्ष यह निकलता है कि ईरान का यह प्रस्ताव उसके सुरक्षा हितों और पश्चिमी दबाव के विरुद्ध समर्थन जुटाने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और यूएई जैसे देशों की अलग-अलग विदेश नीतियों को देखते हुए निकट भविष्य में ब्रिक्स का नाटो जैसा सैन्य गठबंधन बन पाना कठिन प्रतीत होता है। 

वहीं, अधिक संभावना इस बात की है कि ब्रिक्स सुरक्षा संवाद, आतंकवाद-रोधी सहयोग, समुद्री सुरक्षा और सामरिक समन्वय को बढ़ाए, लेकिन औपचारिक सैन्य गठबंधन न बने। राजनीतिक दृष्टि से यह प्रस्ताव इस बात का संकेत अवश्य है कि ब्रिक्स अब केवल आर्थिक मंच नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में अधिक प्रभावशाली भूमिका की तलाश में है। 

कमलेश पांडेय