अशोक गुप्त
लोकतंत्र वह शासन पद्धति है जहां जनता अपनी मर्जी से अपने वोट से सरकार चुनती है. कहा जाता है कि लोकतंत्र में जनता को विरोध करने का अधिकार है और सरकार की तानाशाही नहीं चल सकती, इसलिए विरोध को स्पेस देना भी आवश्यक माना गया है. शुरू में आंदोलन का यह रूप होता था कि आंदोलनकारी एक स्थान पर एकत्र होते थे और धरना प्रदर्शन करते थे. पुलिस गिरफ्तार कर लेती थी और शाम को छोड़ देती थी. यह गिरफ्तारी शांतिपूर्वक दी जाती थी. प्रदर्शनकर्ता यदि पुलिस बैरिकेड तोड़ते भी थे तो केवल पहला बैरिकेड ही तोड़ा जाता था अधिकतर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन इसी प्रकार के होते थे और जनता और पुलिस को मात्र एक दिन की परेशानी होती थी
कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर मंतर आंदोलन से तस्वीर बदली जब अभिजीत दिपके ने कॉकरोच जनता पार्टी बनाई और वह भारत आए तो उन्होंने जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगी जो सरकार ने आसानी से दे दी. पहले कुछ दिनों तक जंतर मंतर प्रदर्शन स्थल पर केवल एक डेढ़ हजार प्रदर्शनकर्ता रहते थे. वैसे प्रदर्शनकर्ताओं को वहां रात को नहीं रहने दिया जाता किंतु पहले दिन प्रदर्शन के पश्चात बड़ी मुश्किल से मान मनौवल से और जिद करके वे वहीं बैठ गए और सरकार उन्हें नहीं हटा नहीं पाई . उसके बाद उन्होंने वहीं खाने-पीने का प्रबंध करना शुरू कर दिया. बाहर से बढ़िया खाना आने लग गया. रोज नए-नए तरह के पिज़्ज़ा बर्गर और कई तरह के खाद्य पदार्थ आने लगे. बढ़िया खाने के लालच में भी बहुत से लोग प्रदर्शन स्थल पर पहुंचने लगे क्योंकि वहां पर मुफ्त खाना बांटा जा रहा था.
युवकों को आकर्षित करने के लिए वहां कॉकरोच जनता पार्टी वालों ने खाने के अतिरिक्त और भी कई आकर्षण पैदा करने की कोशिश की है .कई वाम दल उनके साथ मिल गए और उनके छात्र विंग अपने प्रदर्शन पर वहां बैठ गए. इसके अतिरिक्त यह ऐसे लोगों का जमावड़ा बन गया जो किसी न किसी कारणवश सरकार से नाराज थे और उन्हें एक ऐसा मंच मिला जहां सब आकर अपनी-अपनी शिकायत दर्ज करवा कर सरकार का विरोध कर सकते थे
यूट्यूबर्स ने इसका फायदा उठाया और सैकड़ो की संख्या में वहां पहुंचकर बहुत सारे यूट्यूब वीडियो बनाने शुरू किया जिससे वहां की लोकप्रियता बढ़ती गई और दिन प्रतिदिन नवयुवकों की संख्या बढ़ती गई. न केवल दिल्ली से बल्कि पूरे देश से युवक वहां आने लग गए और उन्होंने प्रदर्शन के नाम पर नाच गाने और पिकनिक का प्रबंध कर दिया . वहां पर प्रदर्शन कम और पिकनिक अधिक हो रही थी.
जब कॉकरोच जनता पार्टी ने संसद चलने का आह्वान किया तो उसको लीड करने के लिए कोई नेता नहीं था. इन नेताओं को कोई अनुभव भी नहीं था और यह प्रदर्शन अवांछित तत्वों के हाथ में चला गया और उन्होंने हिंसा करके इस आंदोलन का स्वरूप ही बदल दिया . पुलिस पर कई जगह हमले किए गए और बैरिकेडिंग तोड़कर संसद भवन की ओर जाने का प्रयास किया गया जिससे पुलिस ने कई स्थानों पर बल प्रयोग कर उसे काबू करने की कोशिश की .बाद में बल प्रयोग का शोर मचाकर और कुछ सरकार विरोधी वकीलों का साथ लेकर बहुत हल्ला मचाया गया जिससे सरकार की छवि खराब हो और सरकार तंग आकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले ले.
बढ़ती भीड़ को देखते हुए सरकार को मजबूर होकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवाना पड़ा जिससे इन प्रदर्शनकारियों ने अपनी भारी जीत समझा. कॉकरोच जनता पार्टी समझने लगी कि उनसे बड़ा कोई राजनीतिज्ञ नहीं है. हालांकि उन्होंने यह घोषणा की कि वह राजनीति में अभी फिलहाल भाग नहीं लेंगे, अभी वह एक प्रेशर ग्रुप की भर्ती काम करेंगे किंतु फिलहाल से सीधा अर्थ है कि कुछ समय के पक्ष में राजनीति में जरूर आएंगे और तब तक वह अपने फॉलोइंग बढ़ाने का प्रयास करेंगे.
लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उन्हें और मुद्दों की तलाश थी. पहले तो उन्होंने स्कूलों की स्थिति पर थोड़ी बात की और कुछ राज्यों में कुछ स्कूल विजिट किये. उसके पश्चात उन्हें लगा कि अब देश में एस आई आर का मुद्दा लोकप्रिय होता जा रहा है तो उन्होंने इस मुद्दे में कूदने की कोशिश की और जंतर मंतर पर फिर से विशाल प्रदर्शन की घोषणा कर दी. सरकार को यह डर था कि एक बार यह लोग जंतर मंतर पहुंचे तो वैसे वही जबरन बैठ जाएंगे और सरकार के लिए उन्हें वहां से उठाना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि उन्होंने अपना प्रबंध इस प्रकार से किया हुआ था कि बिना बल प्रयोग के उन्हें उठाया ना जा सके और बल प्रयोग करने पर उनके समर्थक वकील और वामपंथी लोभी इतना हल्ला मचाते कि सरकार के लिए इसका सामना करना कठिन हो जाता . ऐसे में सरकार ने तय किया कि इस बार इन्हें जंतर मंतर नहीं पहुंचने देना है. सरकार ने स्थान स्थान पर बैरिकेड लगाकर ऐसा प्रयास किया कि यह लोग वहां न पहुंच पाए जिसके कारण इन लोगों ने स्थान स्थान पर जंतर मंतर बनाना शुरू कर दिया. इसमें कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का इतना योगदान नहीं रहा जितना वामपंथी छात्र संघ का रहा. वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा ने अपनी टीम के अधिकतर लोगों को बुलाकर उन्हें इसमें सक्रिय कर दिया और वे लोग रोज प्रदर्शन करते रहे. उन्हें गोरिल्ला प्रशिक्षण दिया गया था. जहां कहीं पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश करते, उनके कार्यकर्ता जमीन पर लेट जाते. एक कार्यकर्ता को गिरफ्तार करने के लिए चार-पांच पुलिस वालों को उसे जमीन से उठाना पड़ता और फिर यह शोर मचाते कि हमारे साथ ज्यादती की जा रही है. बहुत स्थान पर यही नजारा देखने को मिला. महिला हो या पुरुष प्रदर्शनकारी, पुलिस के द्वारा पकड़े जाने पर भी जमीन पर लेट जाते थे और उन्हें उठाकर ले जाना पड़ता था. इस प्रकार 10000 प्रदर्शनकारियों को काबू करने के लिए लगभग 30 40 हजार पुलिस का बंदोबस्त करना पड़ा
इतने दिन प्रदर्शन के चलते रहने से कनॉट प्लेस की दुकानें बंद रही जिस कारण व्यापार का जबरदस्त नुकसान हो रहा है. अभी भी व्यापार पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाया है और पुलिस बंदोबस्त पर होने वाला सरकार का खर्च अलग. यह खर्च भी हमारे और आपके द्वारा दिए गए टैक्स की राशि से ही खर्च होता है.
प्रश्न यह है कि इन कॉकरोचों को यह अधिकार किसने दिया कि वह दिल्ली जैसे नगर का जन जीवन इस तरह से अपने हाथों में लें और लोगों का आना-जाना बाधित हो जाए . इनके कारण सरकार को अधिकतर मेट्रो स्टेशन और रेलवे बंद करनी पड़ी जिस कारण बहुत से लोग अपने गंतव्य पर नहीं जा सके, अपने कार्यालय नहीं जा सके ,अपने कार्य स्थल नहीं जा सके. क्या दिल्ली के नागरिक इन 5 -6000 प्रदर्शनकारियों की दया पर जिएंगे. इसका इलाज सरकार को सोचना ही था इसलिए सरकार ने तय किया कि जंतर मंतर को प्रदर्शन के लिए डीनोटिफाई कर दिया जाए. अगर इन्हें प्रदर्शन करना है तो यह लोग ऐसी जगह प्रदर्शन करें जहां जन जीवन प्रभावित न हो. अब यह कॉकरोच और अन्य विरोधी दल इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि वह ऐसा स्थान ही प्रदर्शन के लिए चाहते हैं जहां जनजीवन को बंद किया जा सके ताकि लोग परेशान होकर सरकार से कहें कि इनकी मांगे मानी जाए या कोई ना कोई हल निकाला जाए और उनके विचार में कोई ना कोई हल यही है कि उनकी मांगे मान ली जाए.
इस प्रकार कोई भी सरकार नहीं चल सकती और ना ही वह कोई देश का शासन चला सकती है इसलिए सरकार को अपने निश्चय पर दृढ़ रहकर जंतर मंतर पर या आसपास के क्षेत्र में प्रदर्शन की अनुमति बिल्कुल नहीं देनी चाहिए. जो भी कोई जबरन प्रदर्शन करने का प्रयास करें, उसके लिए उचित स्थान जेल ही है और ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर उन पर प्रॉपर मुकदमे चलाए जाने चाहिए कि वह आम जन जीवन में बाधा डाल रहे हैं जिससे नागरिकों को परेशानी हो रही है. प्रश्न वही है, क्या नागरिकों का जन जीवन महत्वपूर्ण है या इनका मनमानी जगह विरोध करने का अधिकार.
अशोक गुप्त