दुर्गेश्वर राय
इस साल के शुरुआती छह महीनों के भीतर ही इसरो के 110 से अधिक वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले ली। यह संख्या सामान्य वार्षिक औसत से तीन गुना अधिक है। चिंताजनक बात यह है कि इस्तीफा देने वालों में यू.आर. राव उपग्रह केंद्र (यू.आर.एस.सी.) और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वी.एस.एस.सी.) के 18 वरिष्ठ परियोजना निदेशक और मुख्य सिस्टम इंजीनियर शामिल हैं, जो गगनयान और चंद्रयान-4 जैसे अति-संवेदनशील मिशनों की कमान संभाल रहे थे।
इस आकस्मिक स्थिति के तुरंत बाद 14 जुलाई 2026 को भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग ने एक आपातकालीन आंतरिक सर्कुलर जारी किया। इसके तहत ग्रुप ए के वैज्ञानिकों के इस्तीफे सीधे स्वीकार करने पर रोक लगा दी गई और अंतिम निर्णय का अधिकार इसरो केंद्र निदेशकों से छीनकर सीधे अंतरिक्ष विभाग को सौंप दिया गया।
अंतरिक्ष संगठन में इतने बड़े पैमाने पर हुए इस फेरबदल के केंद्र में भारत का तेजी से उभरता निजी स्पेस-टेक क्षेत्र है। वर्ष 2020 में अंतरिक्ष नीति में किए गए ऐतिहासिक सुधारों और इन-स्पेस के गठन के बाद भारतीय निजी एयरोस्पेस कंपनियों ने अपनी ताकत बढ़ाई। वर्ष 2024 से 2026 के बीच भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में लगभग 800 मिलियन डॉलर का विदेशी और घरेलू निवेश आया। अग्निकुल कॉस्मॉस, स्काईरूट एयरोस्पेस, पिक्सल और बेलाट्रिक्स जैसी स्वदेशी कंपनियों को अपने रॉकेट और उपग्रहों के निर्माण के लिए तैयार और अनुभवी कार्यबल की सख्त जरूरत थी।
निजी क्षेत्र इसरो के वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए पैसा के साथ ही कई अन्य अवसर भी दे रहे हैं। सरकारी वेतन आयोगों की तय सीमाओं में बंधा इसरो अपने वैज्ञानिकों को एक सीमा से अधिक आर्थिक लाभ नहीं दे सकता। इसके विपरीत, निजी स्टार्टअप्स इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिकों को 200 से 300 प्रतिशत तक अधिक वेतन वृद्धि, कंपनी में हिस्सेदारी और निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता दे रहे हैं।
इसके अलावा, कार्यसंस्कृति का अंतर भी एक प्रमुख वजह है। सरकारी प्रक्रियाओं, लालफीताशाही और लंबी औपचारिक अनुमतियों की तुलना में निजी कंपनियों में काम की रफ्तार बहुत तेज होती है। नई पीढ़ी के युवा वैज्ञानिक प्रशासनिक कागजी कार्रवाई में उलझने के बजाय लैब में काम करने और नए विचारों को तुरंत लागू करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
हालाँकि, इस स्थिति को केवल इसरो के नुकसान के रूप में देखना एक अधूरी तस्वीर होगी। वास्तव में, यह देश से प्रतिभा का पलायन नहीं है। यह प्रतिभा देश के भीतर ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रही है। इसे ब्रेन ड्रेन के स्थान पर ब्रेन सर्कुलेशन कहना अधिक तर्कसंगत होगा। इसरो में सालों तक निखरी यह वैज्ञानिक दक्षता अब भारत के ही निजी उद्योगों को मजबूत कर रही है। इससे देश के समग्र अंतरिक्ष इकोसिस्टम का विस्तार ही हो रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू इसरो के पूर्व दिग्गजों की रिवर्स भूमिका है। जिस तरह 1970 के दशक में विक्रम साराभाई ने इसरो की नींव रखी थी, ठीक उसी तर्ज पर आज इसरो के सेवानिवृत्त शीर्ष अधिकारी निजी अंतरिक्ष कंपनियों के संस्थापकों, बोर्ड सलाहकारों और मुख्य रणनीतिकारों की भूमिका निभा रहे हैं। जब इसरो के पूर्व निदेशक या वरिष्ठ अधिकारी किसी स्टार्टअप की कमान संभालते हैं, तो वे इसरो के भीतर की कार्यसंस्कृति, तकनीकी जटिलताओं और प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों की क्षमताओं से भली-भांति परिचित होते हैं। नतीजतन, वे इसरो के सबसे योग्य और दक्ष वैज्ञानिकों की सटीक पहचान कर उन्हें अपनी नई परियोजनाओं के लिए आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं।
लेकिन इसके सिक्के का दूसरा पहलू भी है। गगनयान जैसे मानव अंतरिक्ष मिशन और चंद्रयान-4 जैसी रणनीतिक परियोजनाओं के बीच में यदि कोई मुख्य परियोजना निदेशक हटता है तो मिशन की गति धीमी पड़ना स्वाभाविक है। वर्षों का संचित अनुभव और संस्थागत ज्ञान रातों-रात नए व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। इससे अभियानों की समय-सीमा प्रभावित होने का गंभीर जोखिम उत्पन्न हो जाता है।
यह समसामयिक घटनाक्रम भारत सरकार के सामने कुछ कड़े और व्यावहारिक सवाल भी खड़े करता है। क्या इसरो जैसे रणनीतिक संस्थानों को पारंपरिक सिविल सेवा और वेतन आयोग के ढाँचे से बाहर निकालकर एक विशेष प्रोत्साहन संरचना दी जानी चाहिए? क्या वैज्ञानिकों को केवल प्रशासनिक पदों तक सीमित रखने के बजाय उनके लिए शोध-केंद्रित करियर ट्रैक विकसित करने की आवश्यकता है?
यह स्थिति इसरो का पतन नहीं, बल्कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का एक ऐतिहासिक रूपांतरण काल है। यदि सरकार इस बदलाव को सही नीतिगत फैसलों के साथ संभालती है तो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का यह तालमेल भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना सकता है।