सावन का महीना है,फिर भी मै प्यासी

आर के रस्तोगी 

सावन का महीना है फिर भी मै प्यासी हूँ
मिलने की चाहत है,फिर भी मै उदासी हूँ
नन्नी नानी बूंदे चारो तरफ बरस रही है
उनके दीदार के लिए आँखे तरस रही है
बिजली भी आसमान में कडक रही है
उनसे मिलने की उम्मीदे भडक रही है
बादल गरज गरज कर कुछ कह रहे है
उनका कुछ संदेशा मुझ को सुना रहे है
उदास मत हो प्रिय जल्द आने वाला हूँ
कुछ क्षण में तुमसे ही मिलने वाला हूँ
अब खूब तेज पानी बरसने लगा है
मेरा मन भी अब तड़पने लगा है
इस तेज बारिश में वे कैसे आयेगे ?
मेरी प्यास वे कैसे अब बुझायेगे ?
यह दशा देख वर्षा रानी बोली
अच्छा,मै कुछ घंटो के लिए रूक जाती हूँ
तेरी प्यास बुझाने का इन्तजाम करती हूँ
बादल बोला,तेरा सन्देश उनको देता हूँ
कब तक आयेगे,ये खबर तुझको देता हूँ
बिजली भी बोली,मै उनको रास्ता दिखाती हूँ
तेरे प्रियतम को तुझसे तुरन्त मिलाती हूँ
मै बोली,ये तीनो मुझ पर कितने मेहरबान है
बुरे वक्त पर काम आये यही अच्छे मित्र की पहचान है
उनका शुक्रिया कैसे अदा करू,ये जहन में नहीं आता है
कैसे लब्जो में बयान करू, ये समझ में नहीं आता है
बादल बोला,मै तेरी नहीं सबकी प्यास बुझाता हूँ
धरती क्या मै सब जीव जन्तुओं की प्यास बुझाता हूँ
जब जब सावन आयेगा मै तेरी प्यास बुझाऊंगा
तेरे प्रियतम को हर सावन में तेरे पास लाऊंगा
यह द्रष्य देख “रस्तोगी ” भीगी आँखों से बोला
सावन का महीना कितना महान और पावन है
जो सबका मिलन कराये वही महीना सावन है

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