राजनीति

कहीं यूपी में योगी को घेरने की तो नहीं हो रही कोशिश

राजेश श्रीवास्तव

देश में इन दिनों एक अलग तरह का माहौल छाया हुआ है और दिलचस्प यह है कि उसका सबसे अधिक असर उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिल रहा है। बीते दिनों दो ऐसे प्रकरण आये जिसका सबसे अधिक प्रभाव उत्तर प्रदेश में देखने को मिला। पहला मामला प्रयागराज से आया ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का और दूसरा मामला यूजीसी का । अगर यह मान लिया जाये कि शंकराचार्य का मामला यूपी में गरमाया तो यूजीसी का असर तो पूरे देश में होना चाहिए था लेकिन उसका भी सबसे अधिक विरोध उत्तर प्रदेश में ही दिखा. पूरे देश से विरोध की कोई तस्वीर नहीं दिखी। आखिर क्या यह सिर्फ संयोग है या फिर 2०27 के चुनाव में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ कुछ ‘खेल’ करने की साजिश क्योंकि दोनों मामलों पर न तो केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से कोई सफाई आयी और न ही संघ ने किसी भी तरह का वक्तव्य दिया। जाहिर है कि इसका असर जो भी होगा उसका सबसे अधिक प्रभाव उत्तर प्रदेश के 2०27 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर ही होगा। बीते लोकसभा चुनाव में भी यूपी से भाजपा को खासा नुकसान हुआ है लेकिन इस बार विधानसभा का चुनाव है और भाजपा का जो मूल वोट बैंक – ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ, बनिया और भूमिहार है वह इस समय भाजपा से खासा नाराज है। भले ही यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया है लेकिन इस वर्ग में पार्टी को लेकर खासा आक्रोश है ।

पहले शंकराचार्य के मामले को लेते हैं । इस पर कोई मामला नहीं था लेकिन शंकराचार्य को 5० मीटर के लिए पैदल जाने की जिद करना और उसके बाद उनसे प्रशासन द्बारा यह मांग करना कि वह साबित करें कि वह शंकराचार्य हैं, इतने पर भी बात नहीं रुकी. पुलिस द्बारा उनके समर्थक साधु-संतों के साथ दुर्व्यवहार की जो तस्वीरें आयी, वह हर हिंदू के मन को उदास कर गयीं क्योंकि अभी तक उप्र का हर हिंदू उम्मीद करता था कि अगर साधु-संतों पर कोई बात आयेगी तो योगी आदित्यनाथ उसके साथ जरूर खड़ें होगे लेकिन इस मामले पर पुलिस की ज्यादती के बावजूद मुख्यमंत्री ने कोई दखल नहीं दिया और न ही पांच दिन धरने पर बैठे शंकराचार्य को मनाने के लिए कोई कोर-कसर ही करती सरकार दिखी। ऐसे में जब शंकराचार्य नाराज होकर चले गये तो अधिकारियों ने उनको मनाने की असफल कोशिश की जिसका और उल्टा असर हुआ जबकि इस मामले में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने नरमी दिखायी और कहा कि शंकराचार्य के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था, बदले में शंकराचार्य ने भी केशव मौर्य की तारीफ कर दी। यही नहीं, गोवर्धन पीठ के स्वामी स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और द्बारिका पीठ के स्वामी सदानंद सरस्वती ने भी शंकराचार्य के साथ खड़े होकर सहमति दिखायी जिसके बाद प्रशासन जागा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसलिए साफ कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ की प्रखर हिंदुत्व की छवि पर आघात तो लगा।

दूसरा प्रकरण यूजीसी का आया तो सबसे अधिक विरोध प्रदर्शन यूपी में ही होने लगे। कुछ अधिकारी भी इसमें खड़े हो गये और अपना इस्तीफा भेजकर रोंटियां सेकंने लगे। इन विरोध प्रदर्शन की आग इतनी बढ़ी कि यूपी में कई भाजपा नेताओं के इस्तीफे हो गये । कई भाजपा विधायकों ने तो खुलकर सरकार के विरोध का स्वर बुलंद कर दिया। कई विधायकों ने तो सरकार को मजा चखाने की चुनौती भी दे डाली। यह मुद्दा ऐसा बन गया कि मुख्यमंत्री ने इस पर खामोशी ओढ़ ली क्योंकि यह मुद्दा न तो उगलते बन रहा था और न ही निगलते। वह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का कि उसने इस मामले पर पहले ही दिन और पहली ही सुनवाई पर तत्काल प्रभाव से स्टे लगा दिया और योगी सरकार को होने वाले डैमेज कंट्रोल पर भी स्टे लग गया।

लेकिन स्टे के बावजूद सवर्ण वर्ग की नाराजगी अभी खत्म या कम होती नजर नहीं आ रही है। सवर्ण वर्ग का मानना है कि अभी स्टे हुआ है. सरकार की ओर से कानून को वापस नहीं लिया गया है। इसका मतलब है कि सरकार नहीं चाहती कि यह कानून खत्म हो, इसलिए लोग सरकार से नाराज हैं। दरअसल भाजपा पिछड़ों के वोट को साधने के लिए यूजीसी के सहारे ऐसा कानून लेकर आयी थी लेकिन पिछड़े तो सधे नहीं और जो अपने थे, वह भी बिखर गये। इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी बड़े सधे तरीके से अपने बयान जारी किये। यूपी के मुख्य विपक्षी दल ने न इसका विरोध किया और न ही समर्थन बल्कि यह कहा कि कानून ऐसा होना चाहिए जिससे किसी का नुकसान न हो। मतलब साफ था कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने यह कोशिश कि वह सवर्ण वर्ग को संदेश दे सके कि देखो तुम जिस दल को वोट देते हो, वह भारतीय जनता पार्टी तुम्हारे साथ नहीं है और वह इसमें कामयाब भी हुआ। 

नए नियम आए तो पहले ही दिन से पता चला गया था इसमें बवाल होगा। कौन शोषण करता है और कौन शोषित होता है उसमें से समान्य वर्ग को हटा दिया गया। कमेटी ने जो सिफारिशें की थीं, अंतिम गाइडलाइन उससे हटकर आईं। इस मामले में विशुद्ध राजनीति हो रही है। मुझे लगता है कि सरकार की मंशा भी इसमें राजनीति को साधन है। दोनों तरफ से इस पर जो राजनीति खेली जा रही है वो बहुत दुर्भाग्य पूर्ण है। इस कमेटी में रविशंकर प्रसाद और बांसुरी स्वराज जैसे बड़े वकील शामिल थे, क्या उन्हें इसका आभास नहीं हुआ। सरकार को बाद में समझ आया, लेकिन सरकार ने इस पर चुप्पी साधे रखी। ये गलत फैसला था। सरकार को इस पर खेद प्रकट करना चाहिए और इसे वापस ले लेना चाहिए। मुझे लगता है कि 2०24 नतीजों के बाद भाजपा ने स्थायी राजनीति के लिए एक व्यवस्था सुनिश्चित करना चाहती थी। मुझे लगता है इसीलिए यह कदम उठाया गया।

अब सरकार के लिए ऐसी स्थिति हो गई है कि एक तरफ कुआं हैं और दूसरी तरफ खाई है। कानूनों का दुरुपयोग होता है। दहेज कानून बना तो उसका दुरुपयोग हुआ तो वो खत्म नहीं हुआ। इसी तरह दलित एक्ट का भी दुरुपयोग हुआ लेकिन इन कानूनों के फायदे भी हुए हैं। देखना यह पड़ेगा कि इस नियम को ठीक करने की बात हो रही थी या इन्हें खत्म करने की बात हो रही थी। ये मामला दुधारी तलवार वाला है. इस पर एक तरफा अप्रोच से काम नहीं चलेगा। कुछ भी हो लेकिन इन सभी मामलों पर अगर जल्दी कुछ न किया गया तो नुकसान योगी आदित्यनाथ का सबसे अधिक होगा।

राजेश श्रीवास्तव