लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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गुजरात उच्च न्यायालय ने इसरत जहां केस में राज्य सरकार को स्टे दे दिया है। बावजूद इसके राजनीति तो होनी ही है, क्योंकि मामला गुजरात सरकार से संबंधित है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी को केवल भाजपा के प्रतिपक्षी ही नहीं कुछ अपने लोग भी घेरने के फिराक में हैं। उन लोगों के लिए इस प्रकार का मामला ज्यादा महत्व रखता है। अब देखना यह है कि प्रमुख प्रतिपक्षी और मोदीवाद के घुर आलोचक कांग्रेस, इस मामले को लेकर क्या रणनीति अपनाती है।

प्रेक्षकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव तथा राजकोट महानगर पालिका में हुई भाजपा की भारी हार के बाद मोदी परेशान हैं। उपर से इसरत प्रकरण ने मोदी को और दबाव में ला दिया है, ऐसी संभावना स्वाभाविक है। मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि मीडिया का एक खास वर्ग उन्हें राक्षस के रूप में प्रचारित कर रहा है। उन समाचार माध्यमों के लिए इसरत प्रकरण मजबूत हथियार साबित हो रहा है। ऐसे में नरेन्द्र भाई कौन सी चाल चलते हैं यह एक अहम प्रश्‍न है। भाजपा के अंदर हुए उठा पटक और कई प्रकार के विवाद के बाद मोदी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन राव भागवत से मिलना, फिर संघ के नजदीकी माने जाने वाले डॉ0 मुरली मनोहर जोशी का मोदी के साथ वार्ता यह साबित करने के लिए काफी है कि अब मोदी का गुजरात अभियान समाप्ति की ओर है। केन्द्र में मोदी की अहमियत बढ रही है। साथ ही भाजपा के पास ऐसी कोई छवि नहीं है जो देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को एक बार फिर से जोड सके। ऐसी परिस्थिति में मोदी केन्द्रीय अभियान पर निकलने की रणनीति बना रहे हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए।

अब सवाल यह उठता है कि क्या इसरत मुठभेड प्रकरण मोदी की भावी राजनीति तय करने वाली होगी या सोहराबुद्दीन प्रकरण के तरह ही मोदी इस केस को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर लेंगे? इन तमाम सवालों के घटाटोप में एक बार फिर गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में उष्‍णता महसूस की जा रही है। अब क्या होगा, गुजरात के मुख्य प्रधान की कुर्सी खतरे में है या फिर इस प्रकरण से भी वे उबर जाएंगे, ऐसे कई सवाल राजनीति के गलियारे में तैरने लगे हैं। फिलहाल न्यायालय को राजनीति का अखाडा बनाने के फिराक में प्रतिपक्षी जोर आजमाइस में लगे हैं। खबर का एक पहलू यह भी है कि आखिर एकाएक महानगर न्यायालय के न्यायाधीश की आख्या को सार्वजनिक क्यों कर दी गयी? सवाल गंभीर है और इसका जवाब किसी के पास नहीं है। तमांग के पास जाने वाले तमाम पत्रकारों को खाली हाथ ही लौटना पडा है। वे कुछ भी कहने से इन्कार कर हरे हैं।

इधर इसरत समर्थक समूह एकाएक हडकत में आ गया है। समूह अखबार से लेकर राजनीति तक को झकझोर रहा है। पत्रकार वार्ताएं हो रही है। समूह के मुखिया और पूर्व अवकास प्राप्त पुलिस महानिदेशक आर0 बी0 श्रीकुमार चीख-चीख कर कह रहे हैं कि गुजरात सरकार ने न केवल फर्जी मुठभेड करवाए अपितु सरकार के प्रवक्ता ने न्यायालय की अवमानना भी की है। न्यायालय की अवमानना पर तो न्यायालय को संज्ञान लेना अभी बांकी है लेकिन एक साथ कई मोर्चों का खुलना और उन मोर्चों पर स्वयंभू सिपहसालारों की मार्चेबंदी का कुछ रहस्य तो जरूर होगा। इस बार गुजरात सरकार भी ज्यादा उत्साहित नहीं है। मामले की गंभीरता को समझकर सरकार अपनी रणनीति बना रही है। सरकारी प्रवक्ता और काबीना मंत्री जयनाराण व्यास ने एक और खुलासा करते हुए कहा कि मात्र 20 दिनों के अंदर 600 पृष्टों की रिपोर्ट कैसे तैयार हो गयी? फिर इस रिपोर्ट के साथ ऐसी क्या बात है कि इतनी जल्दबाजी की गयी? श्री व्यास का कहना है कि मामला पेंचीदा है और मामले को साधारन तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए। व्यास को माननीय न्यायालय के द्वारा प्रस्तुत आख्या में राजनीति की गंध आ रही है। सरकारी प्रवक्ता ने न्यायालय की मंशा पर सीधे-सीधे आरोप तो नहीं लगाया है लेकिन कई प्रश्‍न ऐसे खडे किये जो रिपोर्ट की त्रुटि को इंगित करता है।

इसरत केस पर मानवाधिकारवादी और केस लड रहे समर्थकों को छोड कर कोई बडी राजनीतिक पार्टी खुल कर सामने नहीं आ रही है। इससे भी ऐसा लगता है कि अंदर खाने कोई नई रणनीति बनायी जा रही है। रणनीति का सूत्रधार कौन है और उस रणनीति के काट के लिए भारतीय जनता पार्टी और राज्य सरकार कौन सी रणनीति बना रही है यह तो भविष्य बताएगा लेकिन वर्तमान तमांग की रिपोट ने सत्ता पक्ष तथा प्रतिपक्ष को अपने अपने दायरे का हथियार तो दे ही दिया है। इस हथियार से कितनी लडाई लडी जाएगी, और लडाई का क्या प्रतिफल होगा इसपर अभी मीमांसा बांकी है लेकिन प्रकारांतर में गुजरात की राजनीति में इसरत केस का अध्याय कोई न कोई गुल जरूर खिलाएगा।

-गौतम चौधरी

One Response to “इसरत प्रकरण के बहाने नई राजनीति की सुगबुगाहट”

  1. Isht Deo Sankrityaayan

    इसके पहले गोधरा को लेकर लालूवादियों की जो रिपोर्ट आई थी, वहीं से यह तय हो गया था कि अब कोई भी रिपोर्ट घटना की वास्तविक जांच पर आधारित होने नहीं जा रही है. जांच बाद में होगी, निष्कर्ष पहले तय कर लिए जाएंगे. इस रिपोर्ट से भी ऐसी ही बू आ रही है.

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