-अशोक “प्रवृद्ध”
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फरवरी 2026 में राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के लिए नए प्रोटोकॉल जारी करते हुए सभी सरकारी कार्यक्रमों और विद्यालयों में राष्ट्रगान से पहले वन्दे मातरम् का गायन अनिवार्य कर दिया है। अब वन्दे मातरम् गीत के केवल पहले दो अंतरे नहीं, बल्कि सभी 6 अंतरे गाना अनिवार्य होगा। पूरे गीत की अवधि 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है। इसे गाते या बजाते समय सिनेमा हॉल को छोड़कर अन्य स्थलों पर सभी उपस्थित लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य है। वन्दे मातरम् के नए नियमों के तहत इसके अपमान पर सजा के प्रावधान भी किये गए हैं। गृह मंत्रालय के हालिया प्रोटोकॉल के अनुसार राष्ट्रगीत का अपमान अब कानूनन दंडनीय है। यदि कोई व्यक्ति गीत के गायन में जानबूझकर बाधा डालता है या इसका अपमान करता है, तो उसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण अधिनियम, 1971 के तहत 3 वर्ष तक की सजा या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। क़ानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इसे अब राष्ट्रगान के समान कानूनी दर्जा दिया जा रहा है। नियमों के अनुसार गीत बजते समय सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य है। केवल शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को इसमें छूट दी गई है।
उल्लेखनीय है कि वन्दे मातरम् के गायन को अनिवार्य करने का विषय भारत में लंबे समय से एक चर्चा का केंद्र रहा है। इसके पक्ष में मुख्य तर्क यह है कि यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक रहा है और इसका सामूहिक गायन नागरिकों में एकता और देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ कर सकता है। यद्यपि इस पर अलग-अलग दृष्टिकोण भी मौजूद हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी संवैधानिक स्थिति के बारे में पूर्व में स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 51A (मौलिक कर्तव्य) में केवल राष्ट्रगान अर्थात जन गण मन और ध्वज का उल्लेख है, राष्ट्रगीत का नहीं। संविधान में राष्ट्रगीत को अनिवार्य रूप से गाने का कोई मौलिक कर्तव्य नहीं जोड़ा गया है, जबकि राष्ट्रगान का सम्मान करना अनिवार्य है। हालांकि केंद्र के नए नियमों के बाद इसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण अधिनियम, 1971 के तहत संरक्षण देने की योजना है। समर्थकों का मानना है कि विद्यालय और सरकारी संस्थानों में इसे अनिवार्य करने से युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और बलिदान के इतिहास से जुड़ी रहेगी। जहां भाजपा और केंद्र सरकार का मानना है कि यह 1937 में हटाए गए हिस्सों को पुनर्स्थापित करने और राष्ट्रीय गौरव को वापस लाने का कदम है। वहीं विरोधी पक्ष कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे इतिहास बदलने की कोशिश और चुनावी राजनीति से प्रेरित बताया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।
इसमें कोई शक नहीं कि वन्दे मातरम् का गौरवशाली इतिहास रहा है और इस गीत का सफर भारतीय राष्ट्रवाद की कहानी है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में लिखा था और 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में इसे लयबद्ध कर गाया था। 24 जनवरी 1950 को प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि वन्दे मातरम् का स्थान अर्थात संवैधानिक दर्जा राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर होगा। भारत विभाजन के पूर्व 1937 में कुछ वर्गों की आपत्तियों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने केवल पहले दो अंतरे गाने का निर्णय लिया था, क्योंकि उनमें मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और पोषण क्षमता का वर्णन था, जबकि बाद के अंतरे धार्मिक रूप से देखे जा रहे थे। मूल रूप से, तीसरे से छठे छंद में भारत माता की तुलना देवी दुर्गा और शक्ति के रूपों से की गई है, जो ऐतिहासिक रूप से चर्चा का विषय रहे। तीसरा छंद है-त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी… ।
अर्थात- माँ, तुम ही दस शस्त्रों को धारण करने वाली दुर्गा हो। तुम ही कमल के फूलों के बीच विहार करने वाली देवी लक्ष्मी (कमला) हो और तुम ही ज्ञान की देवी सरस्वती हो।
चौथा छंद- वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्, नमामि कमलां अमलां अतुलां… ।
अर्थात- मैं आपको नमन करता हूँ, जो विद्या प्रदान करने वाली वाणी (सरस्वती) हैं। मैं उस लक्ष्मी को नमन करता हूँ जो शुद्ध और अतुलनीय है।
पांचवां और छठा छंद में देश की करोड़ों भुजाओं की शक्ति और शत्रुओं के संहारक रूप का वर्णन है, जो स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत था।
वर्तमान में बदलाव के उद्देश्य के संबंध में सरकार का तर्क है कि 1937 में गीत के जो 4 अंतरे हटाए गए थे, वे औपनिवेशिक तुष्टिकरण का हिस्सा थे। अब सभी 6 अंतरे गाना पूर्ण राष्ट्रवाद और भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जा सकता है। मुस्लिम संगठनों और कुछ ईसाई समुदायों का तर्क रहा है कि उनके धर्म में ईश्वर के अलावा किसी अन्य की प्रतिमा या देवी के रूप में पूजा करना वर्जित है। चूँकि इन छंदों में राष्ट्र की तुलना सीधे हिन्दू देवी-देवताओं से की गई है, इसलिए वे इसे अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध मानते हैं। संस्कृति मंत्रालय और समर्थकों का मानना है कि यह केवल धार्मिक चित्रण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। उनका तर्क है कि जिस तरह हम देश को माता मानते हैं, उसी तरह उसे शक्ति और ज्ञान के विभिन्न प्रतीकों के साथ देखना भारतीय परंपरा का हिस्सा है।
वन्दे मातरम् के सभी 6 छंदों को अनिवार्य किए जाने के फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। सत्ता पक्ष इसे ऐतिहासिक सुधार और सांस्कृतिक न्याय कह रहा है, वहीं विपक्ष इसे संविधान सभा के मूल समझौते का उल्लंघन बता रहा है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि 1937 में हुआ समझौता देश की विविधता को ध्यान में रखकर किया गया था। सरकार इतिहास को फिर से लिखने और जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी जैसे असल मुद्दों से भटकाने के लिए यह कदम उठा रही है। सत्ता पक्ष इन आपत्तियों को खारिज कर रहा है। सरकार का कहना है कि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा है। यदि कोई वंदे मातरम् गाने में अपमान महसूस करता है, तो उसकी राष्ट्रनिष्ठा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। भाजपा प्रवक्ताओं का तर्क है कि वन्दे मातरम् कोई धार्मिक भजन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रतीक है। इसे केवल सांप्रदायिक चश्मे से देखना गलत है।
वन्दे मातरम् से जुड़ी कानूनी चुनौतियों में सर्वोच्च न्यायालय के तीन ऐतिहासिक फैसले सबसे महत्वपूर्ण नजीर माने जाते हैं। बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) का मामला, जिसे जेहोवा विटनेस केस के नाम से जाना जाता है, में न्यायालय ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान (या गीत) के सम्मान में चुपचाप खड़ा रहता है लेकिन उसे गाता नहीं है, तो इसे अपमान नहीं माना जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौन रहने का अधिकार भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। तिरंगे के मान-सम्मान से जुड़े नवीन जिंदल बनाम भारत संघ (2004) में भी न्यायालय ने माना कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना एक नागरिक का मौलिक अधिकार और कर्तव्य दोनों है। इस फैसले का उपयोग करते हुए सरकार के समर्थक यह तर्क दे रहे हैं कि राष्ट्रगीत का गायन संवैधानिक देशभक्ति का हिस्सा है। एक याचिका अश्विनी उपाध्याय बनाम भारत संघ (2017) में याचिकाकर्ता द्वारा वन्दे मातरम् को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने और विद्यालयों में अनिवार्य करने की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनिवार्य करने से इन्कार कर दिया था। जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 51A में केवल राष्ट्रगान और ध्वज का जिक्र है, राष्ट्रगीत का नहीं। कोर्ट ने तब स्पष्ट किया था कि राष्ट्रगीत को लेकर कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। लेकिन अब गृह मंत्रालय ने 2026 के नए दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं, इसलिए पिछली नजीरों और नए सरकारी आदेशों के बीच संवैधानिक टकराव होना तय है। सरकार इसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण अधिनियम के दायरे में लाकर पुरानी नजीरों को बेअसर करने की कोशिश कर सकती है।
यद्यपि फिलहाल, गृह मंत्रालय के निर्देश पूरे देश में सरकारी संस्थानों के लिए प्रभावी हैं। तथापि कई राज्यों, विशेषकर विपक्ष शासित राज्यों में इसे लागू करने को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव की स्थिति बन रही है। फरवरी 2026 में जारी केंद्र सरकार के नए प्रोटोकॉल के बाद भारत के विभिन्न राज्यों में एक स्पष्ट विभाजन देखा जा रहा है। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन शासित राज्यों ने जहां केंद्र के निर्देशों को तुरंत प्रभावी कर दिया है, वहीं गैरभाजपा शासित राज्यों ने इसे राज्यों के अधिकारों और विविधता पर हमला बताया है। अब देखना है कि यह मामला अंततः क्या नया गुल खिलाता है?