अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

पित्तरों अर्थात पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक श्राद्ध

-अशोक “प्रवृद्ध” भारतीय परम्परा में प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ करने के पूर्व परमात्मा, माता-पिता,

मनोवांछित फल प्रदाता और समस्त कामना पूर्ण करने वाली कामदा एकादशी

मान्यतानुसार मनोवांछित फल प्रदाता और समस्त कामना पूर्ण करने वाली कामदा एकादशी व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन किया जाता है। पौराणिक कथानुसार धर्मावतार महाराज युधिष्ठिर के द्वारा पूछे जाने पर वसुदेव-देवकी नंदन भगवान श्री कृष्ण ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में स्थित कामदा एकादशी का विधान व माहात्म्य बतलाते हुए कहा कि एक समय यही प्रश्न राजा दिलीप ने अपने गुरुदेव वशिष्ठ जी से किया था। तब उन्होंने जो उत्तर दिया था वही मैं आपकी जिज्ञासा शांत करने हेतु श्रवण कराता हूं, आप एकाग्रचित्त से श्रवण करें। र

समस्त पापनाशक व सुख -समृद्धि प्रदायक पापमोचनी एकादशी

पापमोचनी एकादशी के सन्दर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है । कथा के अनुसार महाराज युधिष्ठिर के द्वारा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के सम्बन्ध में पूछे जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने चैत्र मास के कृष्णपक्ष की एकादशी के नाम , व्रत विधि व महिमा के बारे में जानकारी देते हुए चक्रवर्ती नरेश मान्धाता के पूछने पर महर्षि लोमश के द्वारा बताई गई पापनाशक उपाख्यान सुनाई ।

रोग, राग, दुःख और दरिद्रता के निवारणार्थ स्कन्द षष्ठी व्रत

अशोक “प्रवृद्ध” भारतीय सांस्कृतिक चिन्तन में जहाँ भगवान शिव आत्मा तत्त्व या सृष्टि के केंद्र