राजनीति

झारखंड का छात्र आंदोलन: सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, व्यवस्था के भरोसे का है

सौरभ वार्ष्णेय
दिल्ली के जंतर मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद अब झारखंड की राजधानी रांची इन दिनों केवल प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र नहीं दूसरा जंतर मंतर बनी हुई है। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में 25 जुलाई से चल रहा छात्र आंदोलन उस बेचैनी की आवाज बन गया है, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के मन में पल रही है। छात्रों का आरोप है कि झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी जेएसएससी की प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली, पेपर लीक और व्यापक अनियमितताओं ने उनकी मेहनत, समय और भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनकी मांग है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई से कराई जाए, संदिग्ध परीक्षाओं को रद्द किया जाए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। यह आंदोलन महज कुछ परीक्षाओं को लेकर छात्रों का आक्रोश नहीं है। इसके भीतर उस व्यवस्था के प्रति अविश्वास दिखाई देता है, जिसमें एक सामान्य मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार का युवा वर्षों तक किताबों के बीच अपना जीवन खपा देता है। वह सरकारी नौकरी को केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, परिवार के भविष्य और अपनी मेहनत की सफलता का माध्यम मानता है। ऐसे में यदि उसे यह महसूस होने लगे कि परीक्षा में उसकी मेहनत से ज्यादा प्रभाव किसी लीक, सिफारिश, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक लापरवाही का है, तो समस्या केवल एक परीक्षा की नहीं रहती; वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाती है।
छात्रों की प्रमुख मांगों में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच, प्रभावित परीक्षाओं—जिनमें 14वीं जेपीएससी और जेएसएससी-सीजीएल जैसी परीक्षाओं का उल्लेख किया जा रहा है—की निष्पक्ष समीक्षा तथा आवश्यकता पडऩे पर उन्हें रद्द कर दोबारा आयोजित करना शामिल है। छात्र यह भी चाहते हैं कि परीक्षा संचालन प्रणाली को पारदर्शी बनाया जाए और जिन लोगों की भूमिका अनियमितताओं में सामने आती है, उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई हो। सवाल यह है कि सरकार इस आक्रोश को केवल आंदोलन मानकर देखेगी या इसे व्यवस्था में सुधार का अवसर बनाएगी? प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने वाला छात्र यदि एक उत्तर गलत लिख देता है तो उसका परिणाम बदल सकता है। लेकिन जब परीक्षा व्यवस्था में ही गंभीर त्रुटि हो जाए तो हजारों छात्रों के परिणाम बदल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि छात्र की गलती के लिए कोई माफी नहीं होती, जबकि व्यवस्था की गलती का खामियाजा वर्षों तक छात्रों को भुगतना पड़ता है।
एक छात्र परीक्षा के लिए वर्षों तैयारी करता है। महंगी कोचिंग लेने की क्षमता न हो तो वह पुस्तकालय, हॉस्टल, किराए के कमरे या घर के एक छोटे से हिस्से में बैठकर तैयारी करता है। कई छात्र उम्र की सीमा के कारण अंतिम अवसर पर परीक्षा देते हैं। ऐसे में परीक्षा के बाद यदि पेपर लीक, प्रश्नपत्र की गोपनीयता, उत्तर पुस्तिका, परिणाम या चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते हैं तो उस छात्र की स्थिति को समझना आवश्यक है।उसके लिए यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। उसके पीछे उसके माता-पिता की उम्मीदें, परिवार की आर्थिक परिस्थितियां और उसके जीवन के कई वर्ष जुड़े होते हैं। यही कारण है कि सरकार को छात्रों के आक्रोश को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय प्रशासनिक और मानवीय दृष्टि से देखना चाहिए।
छात्रों की सबसे प्रमुख मांग सीबीआई जांच की है। यहां सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। पहली चुनौती यह तय करना कि क्या मौजूदा जांच व्यवस्था छात्रों का विश्वास हासिल करने में सक्षम है। दूसरी चुनौती यह है कि यदि सरकार को अपनी जांच पर पूरा भरोसा है तो उसे जांच की पारदर्शिता को लेकर छात्रों की आशंकाओं का समाधान कैसे करना है। बताया गया है कि झारखंड सीआईडी कथित अनियमितताओं की जांच कर रही है। जांच के दौरान जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते से पूछताछ की गई है और अब तक 19 लोगों की गिरफ्तारी की बात सामने आई है। यदि जांच में गिरफ्तारियां हुई हैं तो यह संकेत है कि मामला प्रशासन के लिए गंभीर है। लेकिन गिरफ्तारी अपने आप में अंतिम निष्कर्ष नहीं होती। असली सवाल यह है कि कथित अनियमितताओं का पूरा नेटवर्क क्या था? प्रश्नपत्र या परीक्षा प्रक्रिया से छेड़छाड़ किस स्तर पर हुई? किसे लाभ मिला? किसने आर्थिक या प्रशासनिक लाभ उठाया? और क्या इसमें कोई संगठित गिरोह शामिल था? सीबीआई जांच की मांग को केवल राजनीतिक दबाव या प्रशासन पर अविश्वास के रूप में खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा। यदि छात्रों का एक बड़ा वर्ग किसी जांच एजेंसी पर भरोसा नहीं कर रहा है तो सरकार को उस अविश्वास के कारणों को समझना चाहिए।लोकतंत्र में जांच की निष्पक्षता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है उसका निष्पक्ष दिखाई देना। छात्रों की मांगों में संदिग्ध अथवा प्रभावित परीक्षाओं को रद्द करने की बात भी है। यह मांग भावनात्मक रूप से समझ में आती है, लेकिन इसके साथ एक कठिन प्रशासनिक प्रश्न जुड़ा है। यदि परीक्षा में व्यापक स्तर पर गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो परीक्षा को रद्द करना आवश्यक हो सकता है। लेकिन यदि केवल कुछ केंद्रों या कुछ अभ्यर्थियों तक अनियमितता सीमित है तो क्या लाखों अभ्यर्थियों की पूरी परीक्षा रद्द कर दी जाए? यह फैसला केवल राजनीतिक दबाव में नहीं, ठोस जांच और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।क्योंकि परीक्षा रद्द होने का अर्थ केवल प्रश्नपत्र दोबारा छपना नहीं है। इसका अर्थ है हजारों छात्रों के कई महीने या कई वर्ष फिर से परीक्षा की तैयारी में लगना। उम्र सीमा के करीब पहुंच चुके अभ्यर्थियों के लिए यह फैसला और भी गंभीर हो सकता है।इसलिए सरकार को एक स्पष्ट, वैज्ञानिक और पारदर्शी मानक बनाना चाहिए—किस परिस्थिति में परीक्षा रद्द होगी, किस स्थिति में प्रभावित केंद्रों की परीक्षा दोबारा होगी और किस स्थिति में केवल दोषी अभ्यर्थियों या अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। नियम स्पष्ट होंगे तो विवाद कम होंगे।
छात्रों से बातचीत के लिए झारखंड सरकार द्वारा चार सदस्यीय दल गठित किया जाना सकारात्मक कदम माना जा सकता है। इससे कम से कम संवाद का रास्ता खुला है। छात्रों ने भी बातचीत के लिए तैयार होने की बात कही है। यही वह अवसर है जहां सरकार को अपनी संवेदनशीलता और प्रशासनिक क्षमता दोनों दिखानी होंगी। छात्रों को बुलाकर उनकी बातें सुन लेना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी बताना होगा कि सरकार उनकी किन मांगों को मानने को तैयार है, किन पर जांच के बाद निर्णय लिया जाएगा और किन मांगों को किन कानूनी या प्रशासनिक कारणों से स्वीकार नहीं किया जा सकता।सबसे खतरनाक स्थिति वह होगी जिसमें बैठक हो, तस्वीरें खिंचें, बयान जारी हों और फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहे। छात्रों को आश्वासन नहीं, समयबद्ध रोडमैप चाहिए।
झारखंड की घटना को केवल राज्य की स्थानीय समस्या मानना भूल होगी। देश के अनेक राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। कभी प्रश्नपत्र की गोपनीयता पर प्रश्न उठते हैं, कभी परिणामों पर, कभी परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था पर तो कभी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर।इसका सबसे बड़ा नुकसान उस युवा को होता है जो सरकारी नौकरी के लिए अपना भविष्य दांव पर लगाता है।भारत युवा देश है। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। निजी क्षेत्र में अवसरों की अपनी सीमाएं हैं और सरकारी नौकरी अब भी बड़ी संख्या में परिवारों के लिए स्थिर करियर का आकर्षण रखती है। इसलिए सरकारी भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता राष्ट्रीय महत्व का विषय है।
यदि प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था पर भरोसा टूटता है तो युवा व्यवस्था से विमुख हो सकता है। और जिस देश की युवा शक्ति व्यवस्था से निराश होने लगे, उसके लिए यह केवल रोजगार का संकट नहीं, सामाजिक स्थिरता का भी प्रश्न बन सकता है।
एक प्रश्नपत्र लीक होने का मतलब है हजारों ईमानदार छात्रों के अधिकारों की चोरी। इसका अर्थ है किसी दूसरे व्यक्ति को अनुचित लाभ देना। इसका अर्थ है मेहनत और योग्यता की जगह पैसा, संपर्क या आपराधिक नेटवर्क को बढ़ावा देना।अगर परीक्षा व्यवस्था में कोई व्यक्ति प्रश्नपत्र बेचता है तो वह केवल कानून नहीं तोड़ता, बल्कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करता है। इसलिए पेपर लीक के मामलों में कार्रवाई भी उसी गंभीरता से होनी चाहिए। केवल छोटे कर्मचारियों या बिचौलियों को पकड़कर जांच समाप्त नहीं होनी चाहिए। यदि किसी बड़े अधिकारी, परीक्षा संचालक, निजी संस्था या संगठित गिरोह की भूमिका सामने आती है तो उसकी तह तक जाना होगा। आज तकनीक के दौर में परीक्षा व्यवस्था को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है। प्रश्नपत्रों की डिजिटल एन्क्रिप्शन व्यवस्था, सुरक्षित प्रिंटिंग, ट्रैकिंग सिस्टम, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, सीसीटीवी, बायोमेट्रिक सत्यापन और डेटा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं पारदर्शिता बढ़ा सकती हैं। तकनीक के पीछे बैठे व्यक्ति की नीयत और संस्थागत जवाबदेही अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए हर परीक्षा के बाद एक स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था होनी चाहिए। परीक्षा से जुड़े अधिकारियों और निजी एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी शिकायत के लिए समयबद्ध शिकायत निवारण तंत्र होना चाहिए।सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि परीक्षा संस्था को राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से मुक्त पेशेवर वातावरण मिलना चाहिए।
सरकार की जवाबदेही जितनी जरूरी है, छात्रों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र का मजबूत हथियार है। छात्रों द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जाना स्वागतयोग्य है।लेकिन आंदोलन हिंसा, तोडफ़ोड़ या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की दिशा में नहीं जाना चाहिए। किसी भी आंदोलन की नैतिक ताकत उसकी शांतिपूर्ण प्रकृति में होती है।सरकार को भी छात्रों को अपराधी या विरोधी राजनीतिक समूह के रूप में देखने से बचना चाहिए। छात्र सवाल पूछ रहे हैं तो लोकतंत्र में सवाल का जवाब देना सरकार का दायित्व है। झारखंड सरकार के सामने इस समय सबसे जरूरी काम विश्वास बहाली का है। इसके लिए कुछ स्पष्ट कदम उठाए जा सकते हैं।पहला, जांच की प्रगति सार्वजनिक रूप से बताई जाए।दूसरा, जिन परीक्षाओं पर गंभीर आरोप हैं, उनके संबंध में स्वतंत्र तकनीकी और कानूनी समीक्षा कराई जाए।तीसरा, यदि व्यापक गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो परीक्षा रद्द करने अथवा पुनर्परीक्षा का स्पष्ट निर्णय समयबद्ध तरीके से लिया जाए।चौथा, छात्रों की शिकायतों के लिए स्वतंत्र हेल्पलाइन और पोर्टल बनाया जाए।पांचवां, परीक्षा प्रक्रिया में शामिल सभी अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही तय हो।छठा, भविष्य की परीक्षाओं के लिए ऐसी सुरक्षा व्यवस्था बनाई जाए जिसमें प्रश्नपत्र की गोपनीयता से लेकर परिणाम तक प्रत्येक चरण का डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद हो।और सबसे महत्वपूर्ण—सरकार को छात्रों के साथ लगातार संवाद बनाए रखना चाहिए।
आज का छात्र केवल नौकरी नहीं मांग रहा। वह यह भरोसा मांग रहा है कि यदि वह ईमानदारी से मेहनत करेगा तो उसके साथ न्याय होगा। यह भरोसा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है।झारखंड का छात्र यदि यह विश्वास खो देता है कि परीक्षा में मेहनत का मूल्य है, तो यह पूरे समाज के लिए चिंताजनक स्थिति होगी। क्योंकि जिस व्यवस्था में योग्यता पर संदेह पैदा हो जाए, वहां प्रतिभा धीरे-धीरे व्यवस्था से बाहर जाने लगती है।आज रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में बैठे छात्रों की आवाज को इसलिए केवल धरना-प्रदर्शन की आवाज नहीं समझना चाहिए। यह उस पीढ़ी का सवाल है जो अपने भविष्य का रास्ता तलाश रही है।
संकट इसलिए कि परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे हैं।अवसर इसलिए कि इसी बहाने झारखंड अपनी भर्ती प्रणाली को देश की सबसे पारदर्शी और विश्वसनीय प्रणालियों में बदल सकता है। सरकार चाहे तो इस आंदोलन को बातचीत, जांच और सुधार के जरिए समाप्त कर सकती है। लेकिन यदि छात्रों को केवल आश्वासन देकर टालने की कोशिश हुई, तो यह आंदोलन किसी एक परीक्षा का आंदोलन नहीं रहेगा। इसलिए झारखंड सरकार को यह समझना होगा कि छात्र आंदोलन को दबाने से समस्या समाप्त नहीं होगी। समस्या का समाधान केवल सत्य, पारदर्शिता और न्याय से होगा। और जिस दिन सरकार यह संदेश देने में सफल हो जाएगी कि झारखंड में नौकरी योग्यता से मिलेगी, प्रश्नपत्र पैसे से नहीं बिकेगा और परीक्षा व्यवस्था किसी दबाव के आगे नहीं झुकेगी, उसी दिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी मांग पूरी हो जाएगी।