फांसी पर मानवाधिकार संगठनों के विलाप का औचित्य ?

0
210

निर्मल रानी
जब भी हमारे देश भारतवर्ष में अथवा मृत्यु दंड देने वाले किसी भी देश में किसी व्यक्तिअपराधी को मृत्यु दंड दिए जाने की ख़बर सुनाई देती है उसी ख़बर के सामानांतर प्रायः ऐसी ख़बर कि मानवाधिकारों की रक्षा  ज़िम्मा उठाने वाले अनेक संगठन उस फांसी अथवा मृत्युदंड का विरोध भी कर रहे हैं। आम तौर पर इनका कहना यह है कि किसी व्यक्ति को उसके गुनाहों की अधिकतम सज़ा तो दी जा सकती है परन्तु किसी व्यक्ति की जान ले लेना या उसे योजनाबद्ध तरीक़े से क़ानून के नाम पर फँसी पर लटका देना मानवाधिकारों के हनन के सिवा कुछ भी नहीं। ऐसे में यह बहस भी काफ़ी पुरानी हो चली है कि मृत्युदण्ड देना कितना सही है और कितना ग़लत। मानवाधिकारों की दृष्टि से यदि देखा जाए तो निश्चित रूप से यह प्रश्न बिल्कुल सही है कि किसी भी व्यक्ति की सुनियोजित तरीक़े से जान लेने का अधिकार किसी को भी नहीं।यहाँ तक कि मृत्युदण्ड देने जैसा मानव निर्मित क़ानून बनाने वालों को भी नहीं। परन्तु इसके बावजूद एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के मुताबिक़ इस समय में दुनिया के 58 देशों में अभी भी मृत्युदंड देना जारी है। परन्तु दुनिया अधिकांश देशों में या तो मृत्युदंड पर रोक लगा दी गई है, या फिर कई देशों में गत दस वर्षो से किसी भी व्यक्ति को को मृत्युदंड या फांसी नहीं दी गई है। यूरोपियाई संघ के देशों में,चार्टर ऑफ फ़्ण्डामेण्टल राइट्स ऑफ द यूरोपियन यूनियन की धारा-2 है जोकि मृत्युदण्ड को निषेध करती है।                परन्तु फांसी या मृत्यु दण्ड देने का समर्थन करने वालों के सवालों का भी जवाब दिया जाना ज़रूरी है। जिन परिवारों के सदस्य मरे जाते हैं या जिनके साथ बर्बरतापूर्ण अमानुषिक व्यवहार किया जाता है अर्थात हत्या व बलात्कार के बाद हत्या या फिर नृशंस हत्या का भुक्तभोगी परिवार के लोगों की आवाज़ की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। मृत्युदंड दिए जाने के पक्षकारों का यह सवाल है जैसे कि उदाहरणार्थ कोलकाता में धनंजय चटर्जी नामक एक सोसाइटी के गॉर्ड ने अपनी ही सोसाइटी की रहने वाली 15 वर्षीय एक छात्रा के साथ बलात्कार किया फिर उसकी हत्या कर डाली। नृशंस अपराधी धनंजय को कोलकाता की अलीपुर जेल में 14 अगस्त 2004 को फांसीदे दी गई थी।क्या एक ऐसा व्यक्ति जिसपर उस बच्ची की सुरक्षा का ज़िम्मा हो और वही उसका बलात्कारी व हत्यारा भी बन जाए फिर आख़िर ऐसे में किसके मानवधिकारों की रक्षा करनी ज़रूरी है। न्याय की डर किसे है,पीड़ित परिवार को या उस पिशाच रुपी मानव को जिसने किसी का घर ही उजाड़ दिया हो। जिसने एक पूरे परिवार को ऐसा ज़ख़्म दे दिया जिसे पीड़ित परिवार सारी उम्र नहीं भर सकेगा ?                 फांसी पर लटकाए जाने वालों की एक दूसरी श्रेणी है मिलावटख़ोरों की। विशेष रूप से खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों की। आम तौर से हत्या जैसे अपराधों में किसी एक व्यक्ति व उसका परिवार प्रभावित होता है। परन्तु आज जो लोग दूध घी  खोया मक्खन रासायनिक वस्तुओं व दवाइयों द्वारा तैय्यार फल व सब्ज़ियों का व्यापर कर रहे हैं। सड़ी गली चीज़ें आम लोगों को सरेआम खिला रहे हैं,ये सभी तो दरअसल सामूहिक हत्या के प्रयास जैसे अपराधों की श्रेणी में आने वाले अपराधी हैं। अपनी अधिकतम आय की लालच में ये लोग आम लोगों को जान बूझकर ज़हर परोस रहे हैं। यह तक कि ज़हरीले रसायनों से तैय्यार की गयी अनेक सब्ज़ियों व फलों को उनकी सुंदरता बढ़ने के लिए कई ज़हरीली द्रव्य पोलिश या स्प्रे का भी सहारा लिया जाता है। देश में हज़ारों जगहें ऐसी हैं जहाँ औद्योगिक कचरा बहाने वाले नालों से जिनमें बदबूदार रासायनिक द्रव्य मिले होते हैं,ऐसे गंदे व ज़हरीले पानी से खेतों में सब्ज़ियां उगाई जाती हैं। महानगरों में विशेषकर औद्योगिक क्षेत्रों के नालों के किनारे बसे अनेक खेतों में इस अति प्रदूषित जल का प्रयोग होते देखा जा सकता है।
                                               इसी प्रकार फांसी का अधिकारी एक वर्ग वह भी है जो जीवन रक्षक दवाइयों में मिलावटख़ोरी करता है या नक़ली दवाइयां बेचता है। कई समाचार ऐसे सुनाई दिए हैं जिनसे पता चलता है कि कैंसर व एड्स जैसे मर्ज़ों की मंहगी दवाइयों को भी असली पैकिंग से ग़ाएब कर उसकी जगह पानी भर कर बेच दिया जाता है। दवा माफ़िया की करामात तो आजकल कोरोना वायरस से फैली दहशत के बीच भी जारी है। कितनी ख़बरें आ रही हैं कि मास्क व सिनेटाइज़र जैसी साधारण चीज़ों पर भी इन हरामख़ोरों ने जम कर कालाबाज़ारी की है। कई जगह राज्य सरकारों ने इनके विरुद्ध सख़्त कार्रवाई भी की है। सोचिये जिस करुणा प्रधान देश में लाखों धर्मार्थ अस्पताल खुले हों,जहाँ मरीज़ों व उनके तीमारदारों को मुफ़्त खाना खिलाने व दवाइयां बाँटने के लिए रोज़ लाखों देशवासी आगे आते हों उस देश में ऐसे कलंकी लोग,मानवता पर एक बदनुमा दाग़ हैं। इनकी वजह से रोज़ाना हज़ारों लोग मौत की आग़ोश में समां जाते होंगे। इन्हें भी फांसी से कम की सज़ा बिल्कुल नहीं मिलनी चहाइए।
               इसी प्रकार की एक और श्रेणी दंगा भड़काने वालों व दंगाइयों की भी है। दंगों की साज़िश रचने वाले व उनके इशारों पर दंगों में बेगुनाह लोगों का घर,उनकी संपत्ति उनका व्यवसाय लूटने व उसे आग के हवाले करने वाले भी फांसी पर लटकाए जाने से कम के हक़दार नहीं हैं। जब किसी दंगे की भयावहता को ग़ौर से देखिये तो पता चलेगा कि वो दंगाई या दंगों के साज़िशकर्ता इंसानों के ख़ून के कितने प्यासे हो जाते हैं। ये असमाजिक तत्व केवल जान व माल का ही नुक़्सान मात्र नहीं करते बल्कि ये शातिर मानवताविरोधी भारतीय संयुक्त समाज में भी ऐसी दरार डालते हैं जो हमारे देश के विकास व प्रगति में बाधक होती है। इनके ऐसे कुत्सित प्रयासों से मानवता तो आहत होती ही है साथ साथ देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। इतना ही नहीं विश्व में भारत की बदनामी भी होती है। लिहाज़ा जो लोग चाहे वे दंगों के साज़िशकर्ता हों या दंगाई जिनके द्वारा लोगों को ज़िंदा जलाया जाता है,जिनकी सारे उम्र की कमाई बिना किसी कारन के रख के ढेर में बदल दी जाती है। और दुनिया भारत में हो रही ऐसी घटनाओं पर संज्ञान लेने लगती है,क्या ऐसे लोग फांसी के हक़दार नहीं?
निर्मल रानी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,162 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress