मप्र में कमलनाथ, सिंधिया या फिर तीसरा चेहरा ?

विवेक कुमार पाठक
स्वतंत्र पत्रकार
कांग्रेस अभी तक मप्र चुनाव जीती नहीं है। 15 साल बाद उसका वनवास खत्म होगा है या नहीं अभी तय नहीं हुआ है जनता ने शिवराज से हाथ जोड़े हैं या नहीं ये ईवीएम ने उगला नहीं है फिर भी कांग्रेस में ये बेकरारी क्यों। जीहां सवाल जायज है मगर सब तरफ से आ रही चर्चाओं और एंटी इनकमबैंसी फेक्टर ने मप्र में कांग्रेस के सपनों को हवा दी है। कांग्रेस 28 को मतदान के बाद से बारात सजाए बैठी है बस 11 के नगाड़ों की कमी पड़ रही है। कांग्रेस के दिग्गज दूल्हे भी झट से घोड़ी पर बैठकर अगले 5 साल के लिए श्यामला हिल्स को जीतना चाहते हैं।
तो आइए कांग्रेस की बारात और उसके दूल्हों की बात कर लें। मप्र विधानसभा चुनाव में जिस कदर शिवराज सिंह चौहान ने 13 साल से अंगद की तरह भाजपा के लिए पैर जमा रखा है उसे हटाने कांग्रेस पिछले तीन विधानसभा चुनावों से कभी आधी अधूरी तो कभी अपने बस तक पूरी दम भर रही है। इनके नतीजे सबने देखे हैं। शिवराज की आंधी ऐसी चली है पिछले 13 सालों में कि कांग्रेस अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। 2018 चुनाव भी कांग्रेस से गया तो माना जा रहा है कि मप्र से कांग्रेस का कार्यकर्ता और बचा हुआ संगठन भी गया।
बीजेपी ने अपने राज में कांग्रेस को मप्र में ऐसा बांधे रखा है कि क्षेत्रीय क्षत्रप का उलाहना पाने वाले कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिधिंया भी अमित शाह के निशाने पर आ गए। दोनों नेताओं को पता है कि कांग्रेस इस बार नहीं जीती तो लोकसभा में मोदी और अमित शाह कई गुना ताकत से गुना और छिंदवाड़ा भी जीतने चुनावी आक्रमण करेंगे। गौरतलब है कि दो साल से इन सीटों पर अभियान मोदी अपने खास और यूपी के कबीना मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह के जरिए लगा भी रहे हैं।
मोदी और शाह की इस घेराबंदी ने मप्र में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को कॉमन एजेंडे पर मजबूर किया था। राहुल गांधी के पास भी शायद ये दो चेहरे ही मप्र की चुनावी लड़ाई के लिए मुफीद थे। इन दोनों कांग्रेसी नेताओं ने अपने बस तक पूरी दम लगाई और आखिरकार मई से नवंबर तक कांग्रेस को जैसे तैसे मुख्य मुकाबले में ले आए। मप्र विधानसभा का ये 15 साल में पहला चुनाव है जिसमें भाजपा पहली बार जीत के प्रति आस्वस्त नहीं है। इसमें ज्योतिरादित्य कमलनाथ के की जुगलबंदी और सवर्ण आंदोलन से परिपक्व हुई सत्ता विरोधी लहर का बड़ा योगदान है।
आखिर संसाधानों में पिछड़े कांग्रेसी किला लड़ा गए और अब जीत से पहले जीत का जोरदार दावा कर रहे हैं। मप्र कांग्रेस का हर बड़ा नेता मप्र में फतह बताकर अब सीएम कुर्सी के गुणाभाग में जुटा हुआ है। कमलनाथ प्रबंधन के मास्टर हैं और पुराने दिग्गज होने से दिग्विजय सिंह, अजय सिंह, अरुण यादव, विवेक तन्खा आदि के करीबी और अधिक मुफीद हैं। उधर ज्योतिरादित्य के लिए खुलकर लॉबिंग करने वाले छतरपुर के सत्यव्रत चतुर्वेदी कांग्रेस से खफा हैं तो अन्य कोई गुट इस वक्त सिंधिया के नाम पर मुखर नहीं है। आम जनता, मीडिया से लेकर कांग्रेस का कार्यकर्ता भी कमलनाथ का वजन ज्यादा मान रहा है। इसके बाबजूद कमलनाथ पर अघोषित राजी ये सारे नेता सीएम के फैसले का हक राहुल गांधी पर छोड़ रहे हैं।
यहां जाकर ही सीएम के लिए कमलनाथ से आगे देखने की भी बात बनती है।
 सबने देखा है कि मप्र में राहुल गांधी ने केवल कमलनाथ और सिंधिया दोनों को बराबरी से वजन दिया और आगे रखा। पूरे अभियान में मप्र के तीसरे नेता को भूलकर भी चेहरा नहीं बनाया गया। ऐसे में साफ उम्मीद है कि राहुल कमलनाथ या सिंधिया में से किसी एक के नाम पर हां कह दें। सिर्फ दो नाम होने के बाबजूद राहुल के लिए ये फैसला बहुत आसान नहीं है। राहुल अगर दिग्विजय सिंह और उनके पाले में दशकों से खड़े मप्र कांग्रेस नेताओं की बात पर निर्णय लेते हैं तो कोई शक नहीं कि अगले मुख्यमंत्री कमलनाथ होंगे मगर क्या सिर्फ मप्र के पुराने नेताओं की मंशा सुनकर राहुल फैसला ले पाएंगे। क्या टीवी चैनलों, अखबारों और मप्र की चुनावी सभाओं में कांग्रेस ने युवाओं के जिस कदर कांग्रेस ने वोट मांगे हैं ऐसे में 73 साल के बुजुर्ग कमलनाथ को नेतृत्व देना इतना ज्यादा आसान होगा। वो भी ऐसे में जब कांग्रेस को मई में ही हो रहे लोकसभा चुनाव में मप्र के 7.5 करोड़ मतदाताओं में से 1.5 करोड युवा मतदाताओं का वोट रुपी भरोसा चाहिए। मप्र में व्यापम, रोजगार जैसे मु्द्दे उठाकर कांग्रेस ने युवाओं का निर्णायक वोट मांगा है ऐसे में युवा मुख्यमंत्री की मांग राहुल सिरे से खारिज नहीं कर सकते। खास बात ये है कि कांग्रेस के लिए चुनाव अभियान समिति प्रमुख के नाते युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ही गांव गांव और शहर शहर आमसभाएं और रोड शो करके परिवर्तन के लिए वोट मांगे हैं। इन दो बड़े दावेदारों के कारण राहुल गांधी के लिए 11 तारीख को कांग्रेस की मप्र में संभावित जीत आत्मविश्वास के साथ निर्णय का तनाव भी देने वाली होगी। राहुल को फैसला करते समय ये भी देखना होगा कि अपने दोनों चेहरों में से किसी एक को सीएम बनाने पर उन्हें छिंदवाड़ा,गुना में से किसी एक सीट के लिए फिर जीतने नया चेहरा तलाशना होगा। ये तलाश सिर्फ अगले चार महीनों के बीच करना है और मप्र में लोकसभा सीट बढ़ाना कांग्रेस की बहुत बड़ी जरुरत है। ऐसे में कांग्रेसियों के बीच से ये बात ये भी उठती है कि राहुल कहीं दो चेहरों की लामबंदी में तीसरे चेहरे पर मुहर लगाने के लिए विवश न हो जाएं।
मप्र कांग्रेस ने दो सामने रखे चेहरों की जगह तीसरे को मुख्यमंत्री बनते कई बार देखा है। खास बात है कि तीसरे का निर्णय कांग्रेस आलाकमान की जगह परोक्ष रुप से मप्र का तीसरा बड़ा चेहरा करता आया है। पहले ये किरदार तब के चाणक्य कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के हाथ में रहा तो इस बार हर तरफ से किरदार आज के कांग्रेसी चाणक्य पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के लिए तय माना जा रहा है। बहुत हद तक दिग्गी राजा इसमें सक्षम भी हैं और उनके कुनबे में चेहरों की कमी भी कतई नहीं है। ऐसे में सारे गणित इसी सवाल पर अटकते हैं कि मप्र में कमलनाथ, सिंधिया या फिर दिग्विजय सिंह का तीसरा चेहरा ?

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