गजेन्द्र सिंह
जब भी भारत में कश्मीर की चर्चा होती है, बहस प्रायः सीमा पार आतंकवाद, सुरक्षा, बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों के अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इर्द-गिर्द सिमट जाती है किंतु इस बार चर्चा का विषय इनमें से कोई नहीं है। इस बार केंद्र में हैं इस राज्य के अल्पसंख्यक कश्मीरी हिंदू जिनकी त्रासदी दशकों तक राष्ट्रीय और वैश्विक विमर्श के हाशिए पर रही, जिनके मानवाधिकारों की गूंज न संयुक्त राष्ट्र के मंचों तक पहुँचती है, न अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों तक और दुर्भाग्यवश देश का मानवाधिकार विमर्श भी उनकी पीड़ा के प्रति प्रायः मौन दिखाई देता है। क्या भारत में बहुसंख्यक होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक रहे कश्मीरी हिंदू दशकों से राजनीति के शिकार होते रहे हैं? क्या उनके मानवाधिकार, न्याय और सम्मानजनक एवं सुरक्षित पुनर्वास का अधिकार अन्य नागरिकों से भिन्न है? यदि नहीं, तो फिर उनके विस्थापन, उनकी पीड़ा और न्याय की मांग को राष्ट्रीय विमर्श में वह स्थान क्यों नहीं मिला, जिसकी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक गणराज्य से की जाती है?
न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है। यह कथन भारत में जम्मू-कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं, विशेषकर कश्मीरी पंडित समुदाय, की पीड़ा पर आज भी उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है। 29 जून को कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट की 1989 में हुई हत्या के मामले में लगभग 36 वर्ष बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आतंकवाद-निरोधी न्यायालय में 737 पृष्ठों की चार्जशीट दायर की है। चार्जशीट के अनुसार, सरला भट्ट का अपहरण प्रतिबंधित संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के उग्रवादियों द्वारा किया गया, उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं और बाद में उनकी हत्या कर दी गई।
चार्जशीट में तत्कालीन जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक सहित अन्य आरोपियों का उल्लेख है। पुलिस के अनुसार, खुर्शीद अहमद चालकू ने सरला भट्ट पर गोली चलाई और घटना के बाद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भाग गया। मामले में नामज़द अन्य तीन आरोपी अब्दुल हमीद शेख़, मोहम्मद यूसुफ़ सूफ़ी और गुलाम मोहम्मद टपलू अब जीवित नहीं हैं। जांच एजेंसी का आरोप है कि यह कोई सामान्य आपराधिक घटना नहीं थी बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय के विरुद्ध चलाए गए लक्षित आतंकी अभियान का हिस्सा थी जिसका उद्देश्य भय का वातावरण बनाकर उन्हें घाटी से पलायन के लिए विवश करना था।
27 वर्षीय सरला भट्ट श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान में स्टाफ नर्स के रूप में कार्यरत थीं। आरोप है कि उनका अपहरण किया गया, उन्हें गंभीर शारीरिक यातनाएँ दी गईं, उनके साथ यौन हिंसा की गई और बाद में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई । जम्मू-कश्मीर पुलिस का कहना है कि वर्षों तक आतंक और गवाहों के भय के कारण मामले की प्रभावी जांच आगे नहीं बढ़ सकी । 2024 में जांच दोबारा शुरू हुई और अब चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत की गई है लेकिन प्रश्न केवल यह नहीं है कि चार्जशीट दाखिल हो गई। प्रश्न यह है कि क्या 36 वर्षों की प्रतीक्षा को न्याय कहा जा सकता है?
1989–90 में जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद के उभार के साथ अनेक कश्मीरी हिंदू सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, न्यायाधीश, बुद्धिजीवी और आम नागरिक लक्षित हिंसा का शिकार बने। सरकारी अभिलेखों के अनुसार लगभग 44,000 से अधिक कश्मीरी पंडित परिवार राहत एवं पुनर्वास के लिए पंजीकृत हुए जबकि विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों और समुदाय के संगठनों के अनुसार वास्तविक विस्थापितों की संख्या 3 से 5 लाख लोगों के बीच रही, क्योंकि सभी विस्थापित परिवार सरकारी राहत व्यवस्था में पंजीकृत नहीं थे। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक विस्थापनों में से एक माना जाता है।
सरला भट्ट इस त्रासदी की अकेली पीड़िता नहीं थीं। सितंबर 1989 में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राजनीतिक नेता टीका लाल टपलू की हत्या ने इस दौर की शुरुआत का संकेत दिया। इसके बाद नवंबर 1989 में आतंकवादियों ने न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू की दिनदहाड़े हत्या कर दी जिन्होंने आतंकवादी मकबूल भट को मृत्युदंड सुनाया था। 1990 में अभियंता बी.के. गंजू की उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई, जबकि दूरदर्शन श्रीनगर के निदेशक लासा कौल को उनके कार्यालय के बाहर निशाना बनाया गया। इसी वर्ष गिरिजा टिक्कू की अपहरण के बाद हुई नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। ये घटनाएँ केवल अलग-अलग हत्याएँ नहीं थीं, बल्कि भय और असुरक्षा का ऐसा वातावरण बनाने का माध्यम थीं जिसने हजारों कश्मीरी हिंदू परिवारों को अपनी पुश्तैनी भूमि छोड़ने के लिए विवश कर दिया। इसीलिए अनेक सुरक्षा विशेषज्ञ और जांच एजेंसियाँ मानती हैं कि उस समय की लक्षित हिंसा का उद्देश्य केवल व्यक्तियों की हत्या नहीं बल्कि घाटी की सामाजिक और जनसांख्यिकीय संरचना को बदलना भी था।
कश्मीरी हिन्दुओं के प्रति बर्बरता यहीं नहीं रुकी। कश्मीरी पंडितों के जातीय सफाए और नरसंहार की प्रक्रिया का यह अंतिम और निर्णायक प्रहार था। इसके बाद संग्रामपोरा नरसंहार (1997), उधमपुर हत्याकांड (1997), प्राणकोट नरसंहार (1998), वंधामा नरसंहार (1998) और नदीमार्ग नरसंहार (2003) जैसे सामूहिक नरसंहार इस जातीय सफाए की अगली कड़ियाँ बने। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की आबादी 1947 में लगभग 10 प्रतिशत थी जो 1989 तक घटकर 5 प्रतिशत से भी कम रह गई और आज 0.2 प्रतिशत से भी नीचे सिमट चुकी है। यह मृत्यु का नृत्य आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। जहाँ तत्कालीन सरकारे आतंकवादियों, उग्रवादियों और स्वयंभू अलगाववादी नेताओं को “हीलिंग टच” देने के प्रति तो उत्सुक दिखाई देती है किंतु कश्मीर के मूल निवासी हिंदू जिन्हें उनकी अपनी मातृभूमि से लगभग समाप्त कर दिया गया और जो अपने ही देश में आंतरिक रूप से विस्थापित बनकर जीने को विवश हुए, आज भी न्याय और सम्मानजनक पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
केंद्र सरकार ने समय-समय पर विशेष पुनर्वास पैकेजों के अंतर्गत हजारों सरकारी नौकरियों, सुरक्षित आवासों और वित्तीय सहायता की योजनाएँ शुरू कीं किंतु तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी सुरक्षा की गारंटी के बिना बड़ी संख्या में परिवार जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में विस्थापित जीवन जी रहे हैं। जो कश्मीरी हिंदू कभी घाटी की सांस्कृतिक, बौद्धिक और प्रशासनिक पहचान का अभिन्न हिस्सा थे, उनकी उपस्थिति आज अत्यंत सीमित रह गई है। यह केवल जनसंख्या का परिवर्तन नहीं बल्कि भारत की एक प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक विविधता को हुई गहरी क्षति का भी प्रतीक है। पिछले वर्षों में सरकार ने पुनर्वास, रोजगार पैकेज, सुरक्षित आवास और मंदिरों के संरक्षण जैसे अनेक कदम उठाए हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह अपेक्षा भी बढ़ी कि दशकों पुराने आतंकवाद से जुड़े मामलों में तेजी आएगी। सरला भट्ट मामले में चार्जशीट इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है किंतु न्याय तभी सार्थक होगा जब ऐसे सभी लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण हो और पीड़ित परिवारों को न्याय का वास्तविक अनुभव मिले।
इस बीच, विस्थापन के वर्षों में भूमि और संपत्ति से जुड़े अनेक विवाद भी सामने आए । 2001 में तत्कालीन मुख्यमत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य वेस्टिंग ऑफ ओनरशिप टू ऑक्यूपेंट्स अधिनियम जिसे प्रचलित रूप से रोशनी अधिनियम कहा लाया गया। कहने को तो ये अधिनियम भूमि पर कब्जाधारियों को स्वामित्व देकर विद्युत परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाना था परन्तु इसका उदेश्य विस्तापित हिन्दू आबादी की भूमि , भवन और सम्पति पर बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के कब्जे को क़ानूनी मान्यता देनी थी । किंतु 2014 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट ने इसके क्रियान्वयन में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत किया। बाद में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने 2020 में इस अधिनियम को असंवैधानिक और शून्य घोषित करते हुए सभी आवंटनों को निरस्त करने तथा मामले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जांच के निर्देश दिए।
ऐसे अनेक कारणों से विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के मन में अपनी पुश्तैनी भूमि, घरों और संपत्तियों की सुरक्षा तथा स्वामित्व को लेकर आज भी गहरी आशंकाएँ बनी हुई हैं। यदि एक कश्मीरी हिंदू महिला पीड़िता सरला भट्ट के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने में ही 36 वर्ष लग जाते हैं तो क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि विस्थापित लाखों कश्मीरी हिंदू परिवार भयमुक्त होकर अपनी जन्मभूमि लौटने का साहस जुटा पाएँगे? लौटने का विश्वास केवल पुनर्वास पैकेजों से नहीं बनता; वह तब बनता है, जब राज्य सुरक्षा, न्याय, संपत्ति के अधिकार और गरिमापूर्ण पुनर्वास चारों का भरोसा व्यवहार में स्थापित कर सके।
भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और समान न्याय का अधिकार देता है। न्याय की विश्वसनीयता तभी स्थापित होती है जब वह समुदाय-निरपेक्ष हो। यदि सरला भट्ट जैसे मामलों में 36 वर्ष बाद भी न्यायिक प्रक्रिया प्रारंभिक अवस्था में हो, तो यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की चुनौती है। आतंकवाद का कोई भी अपराध समय बीत जाने से समाप्त नहीं हो जाता। अपराध का समय पुराना हो सकता है लेकिन पीड़ितों का दर्द नहीं। हिन्दू विस्थापन, परिवार से लूट, महिला और बच्चियों से बलात्कार और हिन्दुओं की हत्या के संगठित आपराधिक मामले भारत के लोकतंत्र के सामने एक नैतिक प्रश्न भी खड़ा करता है क्या हम आतंकवाद के सभी पीड़ितों को समान रूप से याद रखते हैं? क्या सभी पीड़ितों को समान न्याय मिलता है? और क्या न्याय में तीन दशक की देरी वास्तव में न्याय कहलाएगी?